सिँधू घाटी की सभ्यता और शिव

इटली में बोलोनिया विश्वविद्यालय के पुरातत्व विषेशज्ञ डेनीज़ फ्रेन्ज़ से कई वर्षों से फेसबुक के माध्यम से बातचीत होती है. उनसे मेरा परिचय पुरात्तव विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर तोज़ी के माध्यम से हुआ था. डेनीज़ ने गुजरात में सिँधु घाटी सभ्यता से जुड़ी लोथल की बन्दरगाह की खुदाई और अध्ययन का काम किया था और पिछले कुछ वर्षों से मध्यपूर्व में, विषेशकर उम्मान में, प्राचीन भारत के व्यापार से जुड़े पुरात्तव शोध में व्यस्त हैं. मध्यपूर्व का पुरात्तव भी भारत की सिँधु सभ्यता से जुड़ा है, क्योंकि तब भी भारत और मध्यपूर्व के देशों में व्यवसायिक सम्बंध थे. मध्यपूर्व की सुमेरी मोहरें सिंधू घाटी के शहरों में मिली हैं और सिंधू घाटी की मोहरें मध्यपूर्व में मिलती हैं.

Indus valley seals with animal motives

डेनीज़ के शोध से सम्बंधित कुछ भी छपने की सूचना मिले तो उसे पढ़ने की कोशिश करता हूँ. आज उनका सिँधू घाटी की मोहरों से सम्बंधित एक आलेख पढ़ा तो उसमें सिंधू घाटी की बहुत सी मोहरों को ध्यान से देखा, बाद में अन्य मोहरों को इन्टरनेट पर खोजा. उनको देखते हुए मन में सिंधू घाटी में शिव पूजा का क्या स्थान था, इसके बारे में मन में प्रश्न उठे. वही इस आलेख का विषय है.

उत्तर पश्चिमी भारत में, विषेशकर गुजरात तथा हरियाणा में, सिंधू घाटी की सभ्यता के कई प्राचीन शहरों के अवशेष मिले हैं, जैसे कि राखीगढ़ी, धौलावीरा, कालीबंगन और लोथल. यह शहर अधिकतर घग्घर नदी के पास बसे हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि प्राचीन समय में घग्घर ही सरस्वती थी, पर सूखे की वजह से यह विशाल नदी से छोटा सा नाला जैसा रह गयी. सेटेलाईट की तस्वीरों से यह दिखता है कि घग्घर नदी करीब दो हज़ार वर्ष पहले तक बहुत बड़ी नदी होती थी. मुझे विश्वास नहीं होता कि घग्घर ही सरस्वती थी. मेरे विचार में भारत में इतिहास लिखने की परम्परा कमज़ोर थी, लेकिन हमारी कथा कहानियों में हमारी सभी महत्वपूर्ण बातें संरक्षित रखी जाती थीं. इसलिए मेरे मन में प्रश्न उठता है कि सरस्वती के सूख कर घग्घर बनने के बारे में क्यों हमारे पुराणों ने कोई कहानी नहीं बना कर रखी? बल्कि हमारी कथाओं ने सरस्वती को धरती के भीतर गुम करके प्रयाग के संगम से क्यों जोड़ दिया?

खैर सरस्वती की बात को छोड़ें, यह आलेख सिंधू घाटी की मोहरों के बारे में है. भारत में मिली मोहरें अधिकतर दो जगहों से मिली हैं, लोथल और कालीबंगन. हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी को सिंधू घाटी से जुड़े प्राचीन शहरों में सबसे बड़ा माना जाता है, लेकिन वहाँ पर अभी तक कोई विषेश मोहरें नहीं मिली हैं.

सिंधू घाटी की मोहरें

अधिकतर मोहरें चौकार हैं, उनकी लम्बाई और चौड़ाई बराबर है, और दो से पाँच सेंटीमीटर की है. अधिकतर मोहरें साबून पत्थर (steatite) की बनी हैं, जिन्हें आग में पका कर कड़ा किया गया था. जिन मोहरों को चार सौ डिग्री सेंटीग्रेड से कम तापमान पर पकाया गया था, उनका रंग गहरा या भूरा सा है, जबकि आठ सौ डिग्री से अधिक तापमान पर पकाने से उनका रंग अधिक सफेद हो जाता है. सफेद रंग वाली ऊँचे तापमान पर पकायी गयी मोहरें कम मिलती हैं.

Indus valley seals with animal motives

जाँच से पता चला है कि यह मोहरें करीब एक हज़ार वर्षों तक बनायी जाती रहीं और इनका प्रयोग होता रहा. उन एक हज़ार वर्षों में इन पर बनायी जाने वाली आकृतियों और लिखे हुए शब्दों में अधिक बदलाव नहीं आया. मोहर के केवल एक ओर ही लिखा जाता था, उसकी दूसरी ओर, उसे पकड़ने या धागे से बाँधने के लिए छेद वाली उठी हुई ठूँठ बनी होती थी, जैसे कि आप ऊपर वाली तस्वीर में देख सकते हैं.

एक शोध के अनुसार ६६ प्रतिशत मोहरों पर कुछ शब्द लिखे मिले हैं, ३५ प्रतिशत मोहरों पर पशुओं की आकृतियाँ बनी हैं और २२ प्रतिशत मोहरों पर एक कोने में, पशु के मुँह के पास, एक सजा हुआ स्तम्भ जैसा बना है. जिन मोहरों पर यह तीनों तत्व मिलते हैं उनकी बनावट एक जैसी होती है - मोहर के ऊपरी हिस्से में आकृतियों से बने शब्द, नीचे बीच में पशु जिसका मुँह बाँयी ओर होता है, और उसके मुख के सामने ही एक सजे हुए डँडे पर बनी आकृति, जो शायद देव पूजा के लिए बनी है.

कुछ मोहरों पर पशु का मुँह दायीं ओर होता है, लेकिन उनके सामने वह सजा हुआ डँडा नहीं दिखता.

मोहरों पर बने पशुओं में सबसे अधिक दिखता है एक सींग वाला काल्पनिक पशु जिसे एकसिंगा कहते हैं. यह एक सींग वाले गैंडे से भिन्न है, जोकि कुछ मोहरों पर मिला है. मोहरों पर बने अन्य पशुओं में बैल, भैंसा, लम्बे बालों वाला जँगली बकरा, लम्बें सींगो वाला हिरण, आदि हैं. यह सभी नर पशु बने हैं, कोई मादा पशु नहीं है. उनके अतिरिक्त कुछ मोहरों पर काल्पनिक पशु भी दिखते हैं, जैसे कि आधा बैल, आधा बकरा, या तीन सिर वाले पशु.

कुछ थोड़ी सी, एक या दो प्रतिशत, मोहरों पर पेड़, पत्ते, या मानव आकृतियाँ भी दिखती हैं. जिन मोहरों पर मानव आकृतियाँ हैं, उनमें मुझे शिव जी से जुड़ी कुछ पौराणिक कहानियाँ दिखीं.

सिंधू घाटी में शिव पूजा

इस वर्ष फरवरी में दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में सिंधू घाटी की जगहों पर की गयी खुदाई में बहुत से शिवलिंग देखे थे. पहली बार मालूम चला कि सिंधू घाटी के रहने वाले लिंग पूजा करते थे.

Indus valley Shivalinga, National Museum, Delhi, India - Images by S. Deepak

तभी वहाँ वह मोहर भी देखी थी जिसपर योग मुद्रा में बैठी मानव आकृति है और उसके आसपास विभिन्न पशु हैं. इस आकृति को शिव का पशुपतिनाथ रूप माना गया है.

Indus valley Pashupatinath seal, National Museum, Delhi, India - Images by S. Deepak

चूँकि अभी तक कोई भी सिंधू घाटी की भाषा को नहीं समझ पाया है, हम यह नहीं जानते कि उस समय के लोग सचमुच शिव को मानते थे या हम लोग अपनी आज की समझ से अपने विचार उन पर थोप रहे हैं.

आज जब मैंने सिंधू घाटी की दो ऐसी मोहरें देखीं जिनकी आकृतियों में मुझे शिव जी जुड़ी पौराणिक कहानियों की झलक दिखी, तो मन में इस आलेख को लिखने का विचार आया.

Indus valley seal with mythology storiesपहली मोहर में ऊपर का लिपि वाला हिस्सा नहीं है. इसमें दायीं ओर योगमुद्रा में एक आकृति बैठी है, जो कि पशुपतिनाथ वाली मोहर से मिलती है. आकृति के सिर पर दो सींग वाला मुकुट या पगड़ी है, जिसपर चंद्राकार जैसा कुछ बना है, मुझे लगा कि यह शिव हो सकते हैं. इसमें दायीं और लम्बे सींगों वाला एक भैंसा है और उससे लड़ने वाली एक दूसरी मानव आकृति है, जिसे मैं दुर्गा कह रहा हूँ, हालाँकि आकृति से यह कहना कठिन है कि यह पुरुष है या स्त्री. दुर्गा ने एक हाथ से भैंसे के सींग को पकड़ा है और उसके दूसरे हाथ में एक भाला है जिससे वह भैंसे की पीठ पर वार कर रही है. भैंसे के ऊपर चार पैर वाला एक जन्तू है जो गिरगिट या छिपकली जैसा लगता है.

मुझे यह महिषासुर मर्दनी दुर्गा की कहानी लगी, जिसमें दुर्गा के साथ शिव को तपस्या करते हुए योगी की तरह दिखाया गया है.

दूसरी मोहर देखने में आसान नहीं, कयोंकि इसकी आकृतियाँ उभरी हुई नहीं हैं, बल्कि पत्थर में खुरेदी गयीं हैं. इसके निचले हिस्से में सात मानव आकृतियाँ एक पंक्ति में दायीं ओर मुख करके खड़ी हैं, उनके सिर पर लम्बी कल्गी या पँख है और पीठ पर बालों की चोटी है या पगड़ी का साफ़ा जैसा कुछ है.

Indus valley seal with mythology storiesइसके ऊपर वाले हिस्से में बायीं ओर एक गिलास जैसा कुछ है जिसके भीतर एक मानव आकृति है, जिसके सिर पर दो सींगो वाला मुकुट या चंद्राकार कुछ लगा है. इसके भी सिर से कँधे के पीछे लम्बे बालों की चोटी या पगड़ी का साफ़ा जैसा कुछ लटका है. ऊपर वाले दायें हिस्से में बैल की गर्दन वाला पशु है जिसके सिर पर हिरण के लम्बे सींगों वाला सिर है. इस पशु के ऊपर एक मछली बनी है. पशु और गिलास के बीच में, एक दूसरी बैठी हुई मानव आकृति है जिसके दोनो हाथ प्रार्थना के लिए या कुछ माँगने के लिए गिलास की भीतर की मानव आकृति के सामने उठे हैं.

मुझे लगा कि यह भागीरथ की कहानी है जो अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए शिव से प्रार्थना कर रहा है. जिसे मैं गिलास कह रहा हूँ वह आकाश से उतरती गँगा है और गँगा के बीच की आकृति शिव है. नीचे पंक्ति में खड़ी आकृतियाँ भागीरथ के पूर्वज हैं.

पुरात्तव विषेशज्ञों ने इन दोनो मोहरों के अन्य अर्थ लगाये हैं, कभी किसी ने इन्हें शिव जी से जुड़ी कथाओं का प्रतीक नहीं सोचा.

सिंधू घाटी की मोहरों में भारत

सिंधू घाटी की मोहरों में एक अन्य मानव आकृति वाली मोहर है जिसमें दोनो ओर शेर हैं और बीच में एक मानव है. दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय के अनुसार यह गिलगिमेश की कहानी है और इस मोहर को "गिलगिमेश की मोहर" कहा जाता है.

Indus valley seal with mythology stories

मैंने जब इस मोहर को देखा तो मन में शकुँतला और राजा दुष्यंत की कहानी का वह हिस्सा याद आ गया जिसमें खोयी हुई अंगूठी मिलने से जब दुष्यंत की याद लौट आती है और वह शकुँतला को खोजते हुए पहाड़ों में पहुँचता हैं वहाँ उसे शेरों से खेलता हुआ अपना बेटा भरत देखता है, जो बाद में बहुत चर्कवर्ती राजा हुआ और जिसके नाम से भारत को अपना नाम मिला.

अंत में

सच में सिंधू घाटी की मोहरें क्या कहती हैं, यह मुझे नहीं मालूम. पर जब कुछ मोहरों को देख कर मन में बचपन की सुनी पुरानी कहानियाँ याद आयीं तो लगा कि इनके वह अर्थ भी तो हो सकते हैं.

भारत की सभ्यता में हमारे आदि इतिहास को कहाँनियों, लोककथाओं और किवदंतियों के माध्यम से ही बाँचा गया है. उनके बारे में दस्तावेज़ या पुरात्तव विज्ञान से मान्य सामग्री मिलना कठिन रहा है. जब कुछ मिलता भी है तो हमारी पुरानी कालचक्र वाली सोच की वजह से उनके अर्थ समझना आसान नहीं होता. इसलिए यह सब बातें कहानियाँ ही मानी जाती हैं, उन्हें इतिहास नहीं कह सकते.

जिन मोहरों में मुझे यह भारत की प्राचीन कहानियाँ दिखीं, उनमें आप को क्या दिखता है? आप भी इंटरनेट पर सिंधु घाटी की अन्य मानव आकृतियों वाली मोहरें खोजिये और बताईये कि क्या उनमें आप को कोई जानी पहचानी कहानियाँ दिखती हैं!

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नोटः इस आलेख की अधिकतर तस्वीरें जिनमें सिंधू घाटी की मोहरें हैं, वे "Corpus of Indus seals and inscriptions" किताब से ली गयीं हैं (Memoires of the Archaeological Survey of India, n. 86).

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