तैमूर या नाथूराम, नाम में क्या?

सुनील दीपक, ९ जून २०१८

पिछले सप्ताह मैं मँगोलिया की राजधानी उलानबातोर में कुछ विकलाँग युवकों के लिए आयोजित एक ट्रेनिन्ग कोर्स में पढ़ा रहा था. मेरे विद्यार्थियों में दो छात्रों का नाम तैमूर था, एक का तैमूरलान और दूसरे का तैमूरखी. पढ़ाते समय जब भी उन दोनों को पुकारता तो मन में सैफ़ और करीना के पुत्र के नाम तैमूर पर उठे बवाल का ध्यान आ जाता.

तुम्हारा साहसी योद्धा, हमारा निर्दयी कसाई

मेरे मन में भी तैमूर का नाम भारत के उस आक्रमणकारी मँगोल राजा से जुड़ा था जिसने निर्दयता से लाखों लोगों को मारा था. जब मैंने सैफ़ और करीना के पुत्र के नाम के बारे में सुना था तो थोड़ा सा अचरज हुआ था कि कोई अपने बच्चे को ऐसा नाम कैसे दे सकता है.

अपने बच्चे का नाम चुनते समय माता पिता अक्सर यह नहीं सोचते कि उसे बच्चे के हमउम्र साथी उस नाम को बिगाड़ कर उसे कितना सतायेंगे. मेरे बचपन के एक मित्र की बहन का नाम था कामिनी जिसे उसकी कक्षा की साथी बच्चियों ने "कमीनी" बना दिया था. बेचारी अपने नाम से बहुत परेशान थी. अन्त में घर वालों से लड़ लड़ कर उसने अपना नाम बदलवाया था. शायद तैमूर को इसकी चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि वह विदेश में पढ़ सकता है.

लेकिन जो तैमूर हमारे लिये निर्दयी आक्रामक था, वही तैमूर मँगोलियों के लिए पराक्रमी योद्धा था जिसने आधी दुनियाँ को जीत कर मँगोल सम्राज्य और सभ्यता को प्रतिष्ठा दी थी. तैमूरलान और चँगेज़ खान दोनो को मँगीली साहस का प्रतीक माना जाता है और मँगोलिया में इन दोनो की मूर्तियाँ जगह जगह मिलती हैं और यहाँ यह नाम प्रचलित भी है.

Gengis khan statue, Ulaanbaatar, Mongolia, image by Sunil Deepak

जब समय बीत जाता है

आज के हीरो कल क्या होंगें यह तो केवल समय ही बता सकता है. जब तक आप के हाथ में शासन की ताकत है, आप अपनी मूर्तियाँ और स्मारक बनवा सकते हैं, लेकिन जब आप का समय बदलेगा तो लोग उनका क्या हाल करेंगे यह कौन जान सकता है? पूर्वी यूरोप में विभिन्न देशों में जगह जगह लेनिन की मूर्तियाँ लगीं थीं, वैसे ही इराक में सद्दाम हुसैन की भी मूर्तियाँ थीं, लेकिन जब समय बदला तो लोगों ने उन सब मूर्तियों को तोड़ कर गिरा दिया था.

दिल्ली के इंडिया गेट पर रानी विक्टोरिया की मूर्ति भी लगी थी, जिसे तोड़ा नहीं गया था लेकिन स्वतंत्रता के बाद वहाँ से हटा दिया गया था. भारत में अतीत के चिन्हों को हटाने की दौड़ लगी है, हर वर्ष कुछ शहरों के और सड़कों के नाम बदले जाते हैं.

यूरोप में कहते हैं कि पुरानी मूर्तियों और जगहों को तोड़ना या उनके नाम बदलना ठीक नहीं, बल्कि जिन जगहों पर दुखद घटनाएँ हुईं या जिन्होंने अत्याचार किये, उनके स्मारकों और मूर्तियों को संभाल कर रखना चाहिये और इतिहास की उन दुखद घटनाओं की यादों को न भुलाने के लिए उनका उपयोग किया जाना चाहिये. इसलिए दूसरे विश्व युद्ध के यहूदियों को बन्दी बनाने वाले और मारने वाले कन्सनट्रेशन कैम्पों को सभाल कर रखा गया है और वहाँ नरसंहार स्मारक बनाये गये हैं.

नाहक ही बदनाम हुए

रोमन साम्राज्य के बादशाह नीरो को भी बुरा और निर्दयी बादशाह बताया जाता है. कहते हैं कि जब प्राचीन रोम में आग लगी तो वह अपने महल में जश्न मना रहे थे, रोम जलता रहा और वह बाँसुरी बजाते रहे.

पर कुछ इतिहासकारों ने इस इतिहास को गलत बताया है, उनका कहना है कि नीरो बहुत अच्छे बादशाह थे. उनके समय में राजसी घरानों की काँउसिल होती थी जिसकी अनुमति के बिना बादशाह कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकता था. नीरो चाहते थे कि सामान्य जनता की काँउसिल बनायी जाये जिससे जनहित के निर्णय लेना आसान बने. जब रोम में आग लगी तो नीरो ने जनता को अपने बाग में शरणार्थी कैम्प बना कर वहाँ जगह थी. उनकी लोकप्रियता से डर कर राजसी घरानों ने उन्हें पागल घोषित कर दिया और उनके बारे में झूठ फ़ैलाये. उनकी मृत्यू के बाद उनकी मूर्तियों से सिर तोड़ दिये गये.

तो नीरो के बारे में इन दो परस्पर विरोधी इतिहासों में किसे सही माना जाये?

कुछ ऐसी ही बहस दिल्ली में औरंगज़ेब रोड का नाम बदलने पर हुई थी जब जब एक ओर के लोग कहते थे कि वह अत्याचारी और कट्टर थे जबकि कुछ लोगों ने कहा था कि औरंगज़ेब बहुत भले बादशाह थे और उन्होंने विधर्मियों पर कुछ ज़ुल्म नहीं किये थे.

उसी तरह वह लोग भी हैं जो कहते हैं कि नाथूराम जी भले आदमी थे और गाँधी जी को गोली मार कर उन्होंने देशभक्ति दिखायी थी. वे नाथूराम गोडसे के मन्दिर बनाना चाहते हैं

अंत में

कोई हीरो है या ज़ीरो शायद यह तो देखने वाले की दृष्टि में है. जो आप के लिए खलनायक है, वह किसी अन्य के लिए नायक है. आप किस राजनीतिक दल के समर्थक हैं, इस पर निर्भर करता है कि आपको कौन भला दिखेगा और कौन बुरा. वरना नाम में क्या, गुलाब को कुछ भी कह लो, वह रहेगा तो गुलाब ही, उसकी खुशबू नहीं बदलेगी.

Statue with blackened face, Rome, Italy - image by Sunil Deepak

जब तक किसी के पास ताकत रहती है, वह अपनी मूर्तियाँ और स्मारक बनवाता है. जब उसका समय निकल जाता है तो पता नहीं चलता कि इतिहास उसकी किन बातों को याद रखेगा. चाहे उनके पास कितनी भी ताकत हो, मूर्तियों को तो कव्वों और कबूतरों की बीठ ही मिलती है, किसी किसी मूर्ति के मुख पर लोग कालिख भी लगा देते हैं.

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