भाषिक आतंक से जूझने के औजार

अर्चना वर्मा, 14 अगस्त 2017

विनम्र आवेदनः 16 फरवरी 2019 को हमारी बड़ी दीदी अचर्ना वर्मा का अचानक देहावसान हुआ. दीदी दिल्ली के मिराण्डा कालेज में हिन्दी की प्रध्यापिका रही थीं और कई साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादन से जुड़ी थीं जिनमें हँस तथा कथादेश प्रमुख थीं. दीदी को स्नेहपूर्ण याद करते हुए आज अपने ब्लाग पर उनका 2017 का एक आलेख प्रस्तुत है - सुनील दीपक

सूचनाः इस आलेख की ऊपर की तस्वीर दिल्ली के आरबिन्दो कालेज के छात्रों के नाटक दल "मोक्ष" के नुक्कड़ नाटक "ज़ुबान सम्भाल के" से है.

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पिछले महीने भर मेरा खाली वक्त पैराबल इण्टरनेशनल अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश को उलटते पलटते बीता है। इस शब्दकोश के निर्माता अभय मोर्य हैं, कृपया इसे वर्तनी की भूल न समझें, उनका सरनाम मोर्य ही है, मौर्य नहीं। अभय मोर्य ने बताया कि इसके पीछे एक दिलचस्प वृत्तान्त है जो यहाँ तो यद्यपि अवान्तर है, लेकिन फिर भी सुना देती हूँ क्योंकि दिलचस्प से किसी को भला क्या आपत्ति हो सकती है ? उनका सरनाम दरअस्ल मोर्य भी नहीं, मोर है। हरयाना में गाँव के स्कूल मेँ शुरुआती किसी कक्षा मेँ उनके शिक्षक को यह नाम अपरिचित अत: ग़लत लगा। मोर भी भला कोई नाम होता है? मौर्य होते हैँ। तो अभय जी ने बताया कि है तो मोर ही पर दूसरा भी एक नाम है, नाड़ू, जो उनकी जाति में लगाया जा सकता है। गुरू जी को यह नाम और भी अपरिचित लगा। नाड़ू भला क्या होता है? नायडू तो होते भी हैं। लेकिन नायडू तो अभय जी बिल्कुल ही नहीं थे, और नाड़ू से तो मोर ही अच्छा था लेकिन गुरू जी को वह भी पूरा सन्तुष्ट नहीं कर रहा था। तो आखिर उन्होंने मोर्य पर वे राज़ी होने का फ़ैसला किया और यूँ अभय जी मोर्य बने।

तो यह शब्दकोश जिसे मैं पिछले महीने भर से उलट पलट कर देखती और खुश होती रही हूँ वह अभय मोर्य की तकरीबन दस सालों की अकेले दम मेहनत का नतीजा है। यह जानकारी खुशी में थोड़ा विस्मय भी घोलती है। विस्मय इसलिये कि ऐसे कठिन संकल्प और उसके निर्वाह के उदाहरण और भी होंगे लेकिन वे बहुत ही विरल होते हैँ और जहाँ भी होते हैँ, विस्मय के पात्र होते हैं। खुशी इसलिये कि वैसे तो अंग्रेज़ी-हिन्दी-शब्दकोश और भी हैँ अनेक, इनमें फ़ादर बुल्के और अपने गुरू डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दकोशों का इस्तेमाल मैं बहुतायत से करती भी रही हूँ, लेकिन अभय मोर्य का शब्दकोश पहली बार प्रयोक्ता की ऐसी बहुत सी ज़रूरतों को पूरा करता है जिनकी तरफ़ इसके पहले किसी शब्दकोश में ध्यान नहीं दिया गया है। अभय मोर्य चूँकि रूसी के विद्वान हैँ और रूसी का शब्दकोश-विज्ञान बहुत विकसित तथा समृद्ध है लिहाज़ा उस ज्ञान का पूरा लाभ इस शब्दकोश को प्राप्त हुआ है।

प्रत्येक प्रविष्टि वस्तुत: अपने शब्द के समूचे अर्थ-संभार का उन्मोचन करती है। शब्द भी कोई एक अकेला शब्द नहीं अपने अनेक रूपों रूपान्तरों के साथ दर्ज होता है। तो हर प्रविष्टि शीर्ष शब्द के साथ अन्तर्राष्ट्रीय उच्चारण वर्णमाला के अनुसार उसके उच्चारण को और उसकी व्याकरणिक कोटि को दर्ज करती है - संज्ञा, विशेषण, निर्धारक, सर्वनाम, क्रिया विशेषण, समुच्चयबोधक, पूर्वसर्ग, विस्मयबोधक, क्रिया तथा क्रियारूप संयोजन आदि। शीर्ष शब्द से व्युत्पन्न तथा सम्बन्धित अन्य शब्द, उससे निसृत , अलग अलग परिच्छेद में प्रत्येक का अर्थ, मुहावरे और लोकोक्तियाँ तथा न केवल उनका अर्थ बल्कि यथासंभव उनका स्थानापन्न भी। वैचारिक अवधारणाओँ का न केवल नाम बल्कि संक्षिप्त परिचय भी, ‘पोस्ट ट्रुथ’ जैसे नवीनतम प्रचलित प्रयोग – कुल मिलाकर इस शब्दकोश मेँ प्रविष्टि के दायरों के भीतर विश्वगकोश जैसी व्यापकता का समावेश है।

अभय मोर्य के बचपन के बारे में यह व्यक्तिगत सूचना जारी करने का एक उद्देश्य यह बताना है कि एक गाँव के स्कूल से उठ कर अंग्रेजी-हिन्दी कोश निर्माता की हैसियत को पहुँचा हुआ व्यक्ति भुक्तभोगी होने के कारण अपनी व्यक्तिगत प्रामाणिक जानकारी से यह बात जानता होगा कि ज़मीनी यथार्थ से जुड़े हुए और हिन्दी (या और भी किसी देशी भाषा ) माध्यम की शिक्षा-व्यवस्था से निकले हुए लोग किस पैमाने पर उपयुक्त सामग्री के अभाव से पीड़ित होते हैं और किस तरह एक शब्दकोश भी उस अभाव को दूर करने के साधनों में से एक बनाया जा सकता है। दूसरा उद्देश्य इस बात की तरफ़ इशारा करना भी है कि भाषा पर शब्द-कोश निर्माता बनने लायक अधिकार अर्जित कर पाना और दस साल लगाकर उसे अकेले-दम कार्यान्वित कर डालना उसे भाषा के एक आम विद्यार्थी के लिये एक प्रेरणा-स्रोत भी साबित करता है।

इस शब्दकोश को देखते हुए मैने इसे ‘प्रसंगवश का अगला विषय बनाना तय किया तो मन में अपने आप ही उसका शीर्षक चुन गया, ‘ भाषिक आतंक से जूझने के औजार।‘

भाषिक आतंक। लगभग सारी दुनिया में किसी अदृश्य समझावन के तहत इसका मतलब अंग्रेजी का आतंक बन चुका है। जितने चुटकुले ससुराली रिश्तेतदारों, पत्नी के अत्याचारों, बारह बजे के सरदारों को लेकर सुनाये जाते हैं, अगर उतने ही नहीं तो उससे बस कुछ ही कम चुटकुले “देशी जनता “ के अंग्रेजीज्ञान के नमूनों से रचे गये होंगे। ज्ञानी जैल सिंह और बूटा सिंह के अंग्रेजी सीखने के प्रयासों के बारे में मशहूर हास-परिहास, लाइट-वेव्ज़ का हिन्दी अनुवाद ‘प्रकाश-तरंगों’ की बजाय हल्की लहरें, या ‘वॉल-स्ट्रीट (अमरीकी शेयर-मार्केट) क्रैश्ड’ का अनुवाद ‘दीवार सड़क पर टूट पड़ी’या ‘हाउ डू यू डू’ का जवाब ‘आई ऐम वेल टु डू, सर,’ या ‘ हाउ इज़ योर वाइफ़’ के जवाब में ‘अब पहले से कुछ कुछ ठीक है’ बताने के लिये ‘समथिंग इस बेटर दैन नथिंग’ कहना – हम सुनते हैँ, सुनाते हैँ और ठहाका लगाते हैँ और सारी स्थिति में निहित अवमानना, उपहास, संवेदनहीनता और निष्ठुरता की तरफ़ भूले से भी हमारा ध्यान नहीं जाता जो “देशी जनता” के प्रति इस तरह अभिव्यक्त होती है। अंग्रेजी सामाजिक धौंस की भाषा तो बन ही चुकी है, बुद्धिमत्ता की निशानी भी मान ली गयी है।

वर्चस्व-विमर्श के विभिन्न पहलुओं में से एक पहलू भाषा का भी है। और उसका प्रसार अन्तर्राष्ट्रीय है। इस अन्तर्राष्ट्रीय पहलू की तरफ़ भाषाविदों ने 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों से ही विस्तार और गहराई के साथ ध्यान दिया है। अब तक ‘लिंग्वस्टिक इंपीरियलिज्म’ की एक पूरी अवधारणा और उससे जुड़े हुए सिद्धान्त और प्रति-सिद्धान्त विकसित हो चुके हैं। भाषा के जरिये फैलाया और कसा जाने वाला वर्चस्व का शिकंजा समूचे समुदाय की चेतना पर कब्जा करता है, इसलिये सबसे अधिक ख़तरनाक है। भाषा संस्कृति की वाहिका है अत: भाषिक साम्राज्यवाद प्राय: सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पर्याय बन जाता है। शासन व्यवस्था जब अन्य भाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी को प्रश्रय देती है और इस प्रश्रय को निरन्तर कायम रखती है तो अंग्रेजी के पक्ष में ऐसे पूर्वग्रह बल्कि दुरग्रह को बढ़ावा देती है जिससे उत्तरोत्तर एक सांस्कृतिक और संरचनात्मक गैर-बराबरी बढ़ती चली जाती है। स्थानीय भाषाओं के लिये यह एक संकट होता हैकि वे अंग्रेजी के उभार और प्रमुखता की होड़ की वजह से अपने ही इलाके मेँ अपना अस्तित्व खो बैठने के ख़तरे का सामना करने लगती हैँ। उसके पेंच कितने जटिल, पैँतरे कितने बारीक, चालें कितनी चतुर और जाल कितना व्यापक है इसका बहुत विस्तृत और पैना सोदाहरण विवेचन प्रभु जोशी ने अपने अनेक लेखों में किया है। उन लेखों को हिन्दी में व्यापक विमर्श का विषय बनना चाहिये। वे हमें भाषिक साम्राज्यवाद के संभावी ख़तरों से आगाह करते हैं।

असल मेँ ऐसा हुआ , केवल भारत मेँ ही नहीं, अन्य अनेक देशों में, खास तौर से उन इलाकों मेँ जो कभी औपनिवेशिक शासन के अधीन रहे चुके थे और जहाँ औपनिवेशिक अधीनता की बच रही निशानियाँ एक संवेदनशील विषय बन चुकी थीं वहाँ अंग्रेजी के भाषिक साम्राज्यवाद के लिये प्रतिक्रिया में अंग्रेजी से मुक्ति और छुटकारा राष्ट्रीय स्वाभिमान का मामला बन गया। अपने शिक्षाकाल में हमने वे आन्दोलन देखे, उनमें हिस्सेदार भी बने जिन्होंने अंग्रेजी को भारत से मिटा देने का संकल्प किया था और उसके नतीजे में उत्तरोत्तर जटिल से जटिलतर होती जाती भाषिक स्थिति और बद से बदतर होती जाती शिक्षा व्यवस्था के साक्षी बने। अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल बदस्तूर कायम रहे, संख्या में बढ़ते रहे, सरकारी शिक्षातंत्र में कहीं अंग्रेजी स्कूली स्तर पर पूरी गायब कर दी गयी, कहीं छँठी, कहीं आँठवी से शुरू की जाती रही, इस असमानता ने समाज को बहुत ही पेचीदा तरीके से तरह तरह की कोटियों में बाँटा और अक्षमताओं में बाँध भी दिया।

औपनिवेशीकरण के जरिये वर्चस्वी भाषा की तरह अंग्रेजी तीन चौथाई दुनिया पर हावी हुई थी। अब उपनिवेश भले समाप्त हो गये हों या अन्तिम उपनिवेश समाप्ति की कगार पर हों, भाषिक उपनिवेशीकरण से मुक्ति अभी आस-पास भी नहीं दिखती। क्या वह संभव भी है? खास तौर से जब आधुनिक जगत में अन्तर्राष्ट्रीय विकास के मोर्चे पर भी अंग्रेजी के साम्राज्य की ताकत पैमाइश के औजार के रूप में प्रकट होती हो। गूगल के अनुसार इण्टरनेशनल मनीटरी फ़ण्ड और वर्ल्ड बैँक जैसी संस्थाएँ जब विकास के लिये आवश्यक ढाँचागत ऋण प्रदान करने के लिये प्रदेय ऋण के मूल्य तथा ऋणप्रार्थी की विश्व सनीयता की पैमाइश करने चलती हैँ तो उसके लिये देश में अंग्रेजी की पैठ को मानक की तरह इस्तेमाल करती हैँ।

दुनिया जब ऐसे निकट संजाल में परस्पर गूंथी जा चुकी है जिसके एक कोने की जुम्बिश बाकी हर कोने तक किसी न किसी स्तर की हलचल का कारण बनती है, तब क्या इस भाषिक सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के चंगुल से छूटने के लिये अंग्रेजी की ओर से पीठ फेर लेना संभव है? संचार जगत की तरह परिभाषित आज की दुनिया में क्या वह अभीष्ट भी है?

अंग्रेजी जब शक्ति का स्रोत है तो सामान्य जन का उससे वंचित रखा जाना एक स्तर पर अन्याय और उत्पीड़न है। भाषिक साम्राज्यवाद के अध्येताओं ने विश्व भर की शिक्षा व्यवस्थाओं से उदाहरण एकत्रित किये हैँ। जैसे 1976 में सोवेतो (दक्षिण अफ़्रीका) के अश्वेत स्कूली छात्रों ने अपनी शिक्षा का माध्यम अफ़्रीकान्स बनाये रखने के फ़ैसले के विरुद्ध आन्दोलन किया था जिसे अलगाववादी अधिकरणों ने अश्वेत जनता द्वारा अफ़्रीकान्स को बोलने-बरतने से इंकार से चिन्तित होकर लागू करना चाहा था। उनका ख़याल था कि अगर अश्वेकतों की पहुँच अंग्रेजी जैसी वैश्विाक भाषा की बजाय केवल अफ़्रिकानर स्रोतों तक सीमित रकी जायेगी तो दक्षिण अफ़्रीका की सरकार उन पर अपना नियंत्रण ज़्यादा सख़्ती से कायम रख सकेगी। 176 बच्चों नें अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाये जाने के अधिकार के लिये इस आन्दोलन में जान गँवाई थी। असल में ख़तरा इस बात से नहीं कि अंग्रेजी भाषा के अर्जन से एक अतिरिक्त क्षमता प्राप्त की जाय। ख़तरा अपनी भाषा के साथ अपना रिश्ताक खो देने में है। दोनो दो अलग अलग चीज़ें हैँ। सच तो यह है कि आरोपित रूप से भी लागू की गयी अंग्रेजी भाषा का अधिकतम इस्तेमाल भी वस्तुत: स्थानीय, तात्कालिक और वैयक्तिक उद्देश्यों के लिये होता है।

ऐसे उदाहरणों से देखा और समझा जा सकता है कि स्थिति का एक दूसरा पहलू भी है। संभव है कि उपनिवेशित जन खुद ही अंग्रेजी को अगीकार करें और इस अंगीकार को कायम रखना चाहते हों? निर्विवाद रूप से ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे ऐसा नहीं चाहेंगे, नहीं चाह सकते। ऐसा केवल तब हो सकता है जब उन्हें उनके अपने प्रत्यक्ष हितों के विरुद्ध फुसलाया जा चुका हो।

आतंक से जूझने का कारगर तरीका आतंक के स्रोत पर कब्जा कर लेना ही हो सकता है। और यहाँ मैं आपके साथ इस आलेख के मूल विषय की ओर लौटना चाहूँगी। अभय मोर्य अपने अँग्रेजी हिन्दी के रूप में आतंक के स्रोत पर कब्जे का एक मज़बूत हथियार देते हैँ। ऐसा कब्जा हासिल करने के बाद अपनी देसी भाषा के इस्तेमाल मेँ भी एक अलग तरह का आत्मविश्वास और ठाठ लौट आता है।

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