बदलता समय, बदलते हम

डॉ. सुनील दीपक, 31 मई 2020

इस आलेख का विचार मुझे भारतीय मूल के अमरीकी न्यूरोसर्जन डा. राहुल जान्दयाल (Rahul Jindial) की पुस्तक "न्युरोफिटनेस" (Neurofitness) से मिला। इस पु्स्तक में उन्होंने 1984 में न्यूज़ीलैंड के शौधकर्ता जेम्स फ्लिन (James Flynn) के एक शौध के बारे में बताया है। फ्लिन ने 1920 से हर वर्ष स्कूल जाने वाले बच्चों की बुद्धि क्षमता (Intelligence Quotient or IQ) के माप के आँकणे देखे और पाया कि हर दस वर्षों में बच्चों की मानसिक क्षमता में तीन अंकों की वृद्धि होती थी। 1920 में बच्चों की औसत मानसिक क्षमता 70 होती थी, जिसे आज के बच्चों में दिमागी कमज़ोरी माना जाता है. अगर आज के बच्चों की औसत मानसिक क्षमता को देखें और उसे 1920 के मापदँड से मापें तो सबको जीनियस माना जाता।

भारतीय बच्चे, तस्वीर डा. सुनील दीपक की

यानि 1920 से आज तक, पिछले सौ सालों में बच्चों की औसत मानसिक क्षमता करीब करीब दुगनी हो गयी है।

बदलाव के कारण

यह बात पढ़ी तो मन में प्रश्न उठा कि यह कैसे हुआ और क्यों हुआ? बहुत से लोग मानते हैं कि हमारी मानसिक क्षमता हमें अपने माता पिता से जन्म के साथ ही विरासत में मिलती है, तो इस सौ वर्षों में ऐसे क्या परिवर्तन आये जिनसे यह बदलाव आया?

मेरे विचार में सबसे पहली बात तो यह है कि यह बदलाव जो फ्लिन को न्यूज़ीलैंड में किये शौध में मिला, वह भारत में नहीं मिलता। शायद भारत में इसका असर 30‍ या 40 वर्ष के बाद आया जब भारत स्वतंत्र हुआ, और विषेशकर पिछले पच्चीस तीस वर्षों में अधिक हुआ।

एक महत्वपूर्ण बदलाव हमारे रहने, खाने पीने और चिकित्सा सँभावनाओं आदि के स्तर में आया है, जिसका असर हमारी मानसिक क्षमताओं पर भी पड़ा होगा। 1920 में बच्चों को बिमारियों से बचाने के टीके आदि नहीं होते थे, उन्हें कोई बीमारी हो तो उसके इलाज के लिए एन्टीबायटिक तथा अन्य दवाईयाँ नहीं होती थीं। न पीने के लिए स्वच्छ पानी आसानी से मिलता था, न शौच जाने के लिए सामान्य घरों में शौचालय होते थे। गरीबी अधिक होती थी, अच्छा खाना पीना कम लोगों को मिलता था। जैसे समय के साथ इन सब स्थितियों में बदलाव आया, बच्चे अधिक स्वस्थ्य होने लगे, बाल मृत्यु दर में कमी आयी और परिवारों में औसत बच्चों की संख्या कम हुई, जिनसे बच्चों को बेहतर देखरेख व पौषण मिलने लगा। बड़े हो कर वह बच्चे अधिक स्वस्थ्य पुरुष व नारी बने, जिसका प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ा। गर्भावस्था में माँ को अधिक पौषण वाला खाना मिलेगा तो उसका अच्छा असर होने वाले बच्चे पर भी पड़ेगा।

एक अन्य शौध ने दिखाया था कि दुनिया के बहुत से देशों में बच्चों की औसत लम्बाई अपने माता पिता से अधिक हो रही है, उसका कारण भी यही माना गया है कि आज के माता पिता स्वयं अधिक स्वस्थ्य हैं और बच्चों को जन्म से ही बेहतर पौषण मिलता है जिनसे वह अधिक लम्बें हो रहे हैं। उस बदलाव का सम्बंध मानसिक क्षमता के बदलाव से जुड़ा है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव आया है वह है, लड़कियों तथा युवतियों का पढ़ा लिखा होना। दुनियाँ के विभिन्न देशों में बहुत से शौध कार्यों ने यह दिखाया है कि बच्चों की माँ जितनी पढ़ी लिखी होगी, उसके बच्चे उतने ही स्वस्थ्य तथा मानसिक रूप से सक्षम होंगे। माँ की पढ़ायी का असर परिवार के आर्थिक स्तर के सुधार से भी अधिक पाया गया है, यानि अमीर घर की कम पढ़ीलिखी माँ के बच्चों का औसत स्वास्थ्य और मानसिक क्षमता, कम पैसे वाले घर की अधिक पढ़ीलिखी माँ के बच्चों के औसत स्वास्थ्य तथा मानसिक क्षमता से कम पाये गये हैं।

इस बदलाव से यह समझ में आता है कि मानसिक क्षमता हमें केवल अपने माता पिता से जन्म में विरासत में नहीं मिलती बल्कि उस पर परिवार का, विषेशकर माँ का, बहुत असर पड़ता है। इन शौधों में पाया गया कि पिता के शिक्षा स्तर का बच्चों पर उतना असर नहीं पड़ता, जितना माँ की शिक्षा का पड़ता है।

तकनीकी बदलाव

पिछले बीस सालों में विश्व में जो तकनीकी बदलाव आये हैं, उनका बच्चों की मानसिक क्षमता पर क्या असर पड़ेगा, इस विषय पर बहुत से शौध प्रारम्भ हो चुके हैं। पहले छोटे बच्चों को माता पिता या दादी नानी कहानियाँ सुनाते थे, जिनसे उनका मानसिक विकास मज़बूत होता था, और थोड़ा बड़े हो कर, अन्य बच्चों के साथ खेल कूद में वही विकास अधिक बढ़ता था। जब हम छोटे थे तो चन्दामामा और पराग जैसी बच्चों की पत्रिकाएँ आने लगी थीं और रेडियो के कार्यक्रम होते थे, जिन्हें सुन कर हमें बाहर की दुनिया कैसी है, यह समझ मिलती थी। अस्सी नब्बे के दशकों में टेलीविज़न आने लगा तो उस पर दुनिया के बारे में देखने को मिलने लगा।

पिछले बीस वर्षों में मोबाईल फ़ोन तथा इंटरनेट के साथ साथ, तरह तरह के खेल, वीडियो, गीत संगीत, सब मिलता है। साल भर का होते होते, बच्चे अपनी पसंद के टेलीविज़न कार्यक्रमों को पहचानने लगते हैं, और दो साल के होने तक, उन्हें मोबाईल फ़ोन को उँगली लगा कर चलाना, कार्यक्रम खोलना समझ आ जाता है। इस तरह से आज के छोटे बच्चों को दो तीन वर्ष की आयु से पहले ही दुनिया के बारे में इतनी तरह की जानकारी और उनकी मानसिक क्षमता को प्रोत्साहित करने वाले तरीके मिल जाते हैं, जिनसे उनका मानसिक विकास बहुत तेज़ी से होता है। कल जब यही बच्चे बड़े होंगे तो किस तरह की पुरुष व नारी बनेंगे, किस तरह का विश्व बनायेंगे?

अंत में

इस बदलाव में केवल अच्छा ही होगा, यह तो कठिन है। अकेले बच्चे तो तकनीकी साधनों के बीच में अकेले ही बड़े होते हैं, उससे उनकी सामाजिक क्षमताओं पर क्या असर पड़ेगा, यह तो समय ही बतायेगा। पर कुछ लोगों का सोचना है कि इससे मानसिक रोग बढ़ रहे हैं और पारिवारिक रिश्तों में कमज़ोरियाँ आ रही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बच्चों का एक तरफ़ा मानसिक विकास हो रहा है, उनका तार्किक ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन मानव को कैसे समाज में रहना चाहिये, वह मानवता का ज्ञान कम हो रहा है।

भारतीय बच्चे, तस्वीर डा. सुनील दीपक की

मैं आशावादी हूँ, मुझे लगता है हमारे जैसे लोग जिनके लिए यह तकनीकी दुनिया नयी है, हम उसमें खोये रहते हैं। फेसबुक, ट्विटर या टिकटोक में दिन निकाल देते हैं। जबकि नयी पीढ़ी ने इस तकनीकी दुनिया को बचपन से देखा है, वह बड़ी होगी तो उसके लिए इस तकनीकी को अपने जीवन में सही स्थान देना अधिक सरल होगा।

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