यौनिक हिँसा विमर्श

डॉ. सुनील दीपक, 8 मार्च 2020

कुछ दिन पहले यूट्यूब (Youtube) पर एक छोटी सी फ़िल्म देखी थी, "देवी"। यह फ़िल्म ब्लात्कार की शिकार हुई औरतों के बारे में है। फ़िर फेसबुक पर इस फ़िल्म के बारे में कुछ महिला मित्रों से बहस हुई, जिन्हें यह फ़िल्म पसंद नहीं आयी थी, क्योंकि उनके विचार में इसमें ब्लात्कार से पीड़ित औरतों में विद्रोह नहीं था, बल्कि ब्लात्कार की स्वीकृति थी। मैं उनके विचारों से सहमत नहीं था, और मैंने लिखा कि मुझे यह फ़िल्म क्यों पसंद आयी थी।

इस बात से, ब्लात्कार से सम्बंधित कुछ अन्य बातें थीं, उनके बारे में सोचने लगा। भारतीय मीडिया तथा स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े लोगों में जिस तरह से ब्लात्कार के विषय में बात होती है, मुझे उससे कुछ उलझन सी होती है। तो सोचा क्यों नहीं इस बारे में, मैं अपने मन की बातें आप के सामने रखने की कोशिश करूँ।

भारत में नारी परिकल्पना के रूप

सबसे पहले मैं "देवी" फ़िल्म से ही अपनी बात प्रारम्भ करना चाहूँगा।

प्रियंका बैनर्जी की लघुफ़िल्म, देवी

यह फ़िल्म छोटी सी है, करीब तेरह मिनट की, अगर आप ने अब तक नहीं देखी तो अवश्य देखिये। इसमें बहुत से जानी मानी अभिनेत्रियाँ हैं, काजल, श्रुती हसन, नेहा धूपिया, मुक्ता बर्वे, संध्या म्हत्रे, नीना कुलकर्णी, आदि।

फ़िल्म की कहानी एक छोटे से कमरे में सीमित है, जो औरतों से भरा है। अचानक घँटी बजती है, और कमरे में बैठी औरतों में बहस शुरु हो जाती है। तब समझ में आता है कि सभी औरतें ब्लात्कार का शिकार हैं, और उनकी बहस का विषय है कि किसी अन्य ब्लात्कार पीड़ित औरत को कमरे में आश्रय दिया जाये या नहीं, क्योंकि कमरा पहले से भरा हुआ है। जब समझ में आता है कि घँटी कौन बजा रहा था, वहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है।

फेसबुक पर जो बहस हुई, उसमें एक बात यह भी थी कि जिसके साथ ब्लात्कार हुआ है, उस स्त्री को किस नाम से पुकारा जाये? कुछ लोगोँ का कहना था कि उसे शिकार कहना या पीड़िता कहना, उसे कमज़ोर दिखाता है, उसमें इतना साहस होना चाहिये कि वह समाज से आत्मसम्मान के लिए लड़ सके। मेरे विचार में उन स्त्रियों को शिकार या पीड़िता मानना वह पहला कदम है जिसमें यह स्वीकार किया जाये कि उनके साथ अन्याय हुआ है, हिँसा हुई है। अगर वह इस हिँसा और अन्याय को स्वीकृत नहीं करेंगी, तो उससे कैसे लड़ेंगी? वह ब्लात्कार की पीड़िता नहीं, उससे लड़ सकती हैं, यह भावना उनके अपने भीतर से आनी चाहिये। इस दृष्टि से देखें तो ब्लात्कार के बाद आश्रय लेने के लिए जब वह उस कमरे में पहुँचती हैं, उस समय वह ब्लात्कार की पीड़िता हैं और उन्हें अन्याय से लड़ने वाली नारी बनने की यात्रा करने का साहस जुटाना है।

फ़िल्म में बहुत सी बातों को शब्दों में नहीं अभिव्यक्त किया गया है, आप उन्हें देखते हैं और बाद में सोचने से उनका महत्व समझते हैं, मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी। जैसे कि फ़िल्म के प्रारम्भ में, कमरे में बैठी औरतें अलग अलग बातों में व्यस्त हैं। एक युवती टीवी चलाने की कोशिश कर रही है, एक महिला पूजा की थाली ले कर खड़ी है, एक ओर तीन पचास-साठ साल की मराठी "मौसियाँ" ताश खेलने में लगी हैं, एक बुर्का पहनी युवती पैर के नाखूँनों पर नेल पॉलिश लगा रही है। मुझे लगा कि यह दिखाना महत्वपूर्ण था कि ब्लात्कार से औरत बदल नहीं जाती, उसका जीवन, उसकी पसंद नापसंद, मित्रता, झगड़े, आदि सब वही रहते हैं, वह तब भी वही औरत है जो पहले थी।

फ़िल्म की दूसरी अनकही बात जो मुझे अच्छी लगी और जो फ़िल्म देखने के बाद में सोचने पर समझ आयी वह यह थी कि ब्लात्कार इस लिए नहीं होते क्योंकि युवती ने शरीर दिखाने वाले कपड़े पहने हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ब्लात्कार पश्चिमी पौशाक पहनने से होते हैं या इस लिए होते हैं कि लड़की ने बियर पी या उसका व्यवहार गलत था। पर फ़िल्म में देखिये कि उस कमरे में हर तरह की औरतें व युवतियाँ बन्द हैं. पश्चिमी पौशाक वाली भी, साड़ी वाली भी, बुर्के वाली भी। उनमें विकलाँग युवती है, चालिस साल की धार्मिक औरत भी है, साठ साल की औरतें भी और छोटी सी बच्ची भी। यानि यह कहना कि ब्लात्कार ऐसे कपड़ों से हुआ या वैसे व्यवहार की वजह से हुआ, केवल ब्लात्कारियों को बहाना देना है। ब्लात्कार मर्द की सोच से होता है जिसमें नारी की इच्छा या अनिच्छा का कोई महत्व नहीं, जिसमें हिँसा और जबरदस्ती मान्य हैं, वह नारी की पौशाक या व्यवहार पर निर्भर नहीं है।

भारत ब्लात्कारों की राजधानी?

पिछले दशक में, विषेशकर ज्योति/निर्भया ब्लात्कार काँड के बाद, भारतीय मीडिया तथा स्वंयसेवी संस्थाओं के एक्टिविस्टों ने ब्लात्कारों के बारे में जिस तरह से आवाज उठायी है, उनका ध्येय है कि भारत में बढ़ते ब्लात्कारों के बारे में जनसामान्य में जानकारी बढ़ायी जाये और इसके विरुद्ध कदम उठायें जायें। "देवी" फिल्म का नाम भी इसीलिए रखा गया है, यह कहने के लिए कि वैसे तो हिन्दू लोग विभिन्न देवियों की पूजा करते हें और स्त्री को देवी का रूप बताते हैं, लेकिन सच में देवी से गलत व्यवहार करते हैं।

लेकिन मेरे विचार में भारतीय मीडिया तथा स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस विषय में "ब्लात्कार का खतरा" चिल्ला कर और भारत को ब्लात्कारों का देश कह कर जनसामान्य में गलत संदेश दिया है। बड़े शहरों में होने वाले कुछ अधिक वहशी तथा क्रूर ब्लात्कारों के बारे में टीवी के एँकर और एक्टिविस्ट इतना चिल्लाते हैं और क्रूरता की सब बातें इस तरह से चटकारे ले कर विस्तार से बताते हैं, जिससे लगता है कि भारत में ब्लात्कारों का यही प्रचलित रूप है। लेकिन क्या यह सच में भारत में होने वाले अधिकतर ब्लात्कारों के बारे में समझने का सही तरीका है?

पिछले दशक में ब्लात्कारों की सँख्या में थोड़ी बढ़ोतरी हुई तो टीवी, अखबार आदि ने शोर मचाना शुरु कर दिया कि पुलिस अपना काम ठीक से नहीं कर रही, देश में ब्लात्कार बढ़ रहे हैं, इत्यादि। मेरे विचार में यह बिल्कुल गलत किया गया। अपनी बात को समझने के लिए, मैं आप को भारत में तथा दुनिया के अन्य देशों में ब्लात्कार के आँकणें बताना चाहूँगा.

"देवी" फ़िल्म के अंत में भारत के आँकणें दिखाये गये हैं, कि भारत में हर दिन 90 ब्लात्कार होते हैं, यानि एक वर्ष में करीब 24 हज़ार ब्लात्कार, जिनमें से केवल 32 प्रतिशत को सजा मिलती है।

अगर हम दुनिया में किसी भी बीमारी या समस्या से प्रभावित कुल संख्या की बात करें तो अधिकाँश में भारत का स्थान चोटी पर होता है। पाँच साल की आयु से पहले मरने वाले बच्चों के आँकणे देखिये, डायबिटीज़ से प्रभावित लोग गिनिये, टीबी या कुष्ठ रोग से पीड़ितों की संख्या देखिये, सबमें भारत चोटी में मिलेगा। लेकिन क्या इसका यह अर्थ है कि भारत उस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित देश है? किसी भी समस्या से जुड़ी संख्या को देशों की जनसंख्या के अनुपात में मापिये, तब मालूम चलेगा कि सच में उस समस्या से कौन से देश अधिक प्रभावित हैं। जैसे कि अगर कुल संख्या को देखा जाये तो भारत में बच्चों की मृत्यु सबसे अधिक है, लेकिन अनुपात की दृष्टि से देखें तो यह समस्या कुछ अफ्रीकी देशों में अधिक गम्भीर है।

भारत में नारी परिकल्पना के रूप

भारत के एक एक राज्य की जनसंख्या, कई छोटे बड़े देशों की जनसंख्या से अधिक है। अकेला उत्तरप्रदेश, अगर स्वतंत्र देश होता तो जनसंख्या के हिसाब से दुनिया का पाँचवा सबसे बड़ा देश होता। हमारे यहाँ कोई भी बात हो, उससे प्रभावित लोगों की कुल संख्या तो दुनिया के अन्य देशों से अधिक हो, यह आसानी से हो जाता है।

दुनिया के अन्य देशों में होने वाले ब्लात्कारों के आँकड़ों को देखिये, तब समझ में आता है कि भारत में यह समस्या कितनी छुपी हुई है। मेरे विचार में भारत के पुरुष बाकी दुनिया के पुरुषों जैसे हैं, न उनसे कम न अधिक ब्लात्कारी। इस दृष्टि से देखें तो पायेंगे कि भारत में बहुत कम ब्लात्कारों की रिपोर्ट पुलिस में होती है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमारे यहाँ बहुत ब्लात्कार हो रहे हैं, बल्कि हमारी समस्या है देश में अधिकतर ब्लात्कार छुपे रह जाते हैं। अगर हमारे आँकणों में ब्लात्कारों की संख्या बढ़ने लगेगी तो वह अच्छा संकेत होगा कि भारतीय औरतों का पुलिस में व न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ रहा है, वह अधिक संख्या में इसकी रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए आगे आ रही हैं।

अन्य देशों में ब्लात्कार के आँकणे

कुछ वर्ष पहले यूरोपीय अपराध संस्थान की रिपोर्ट आयी थी कि यूरोप में दो देश हैं जो यौनिक हिँसा के विषय पर सही तरीके से जानकारी एकत्रित कर रहे हैं, ईंग्लैंड तथा इटली। ईंग्लैंड की कुल जनसंख्या है करीब 7 करोड़ और 2018 में वहाँ 90 हज़ार ब्लात्कार रिपोर्ट किये गये, यानि जनसंख्या का 0.13 प्रतिशत। इटली में इस विषय पर अंतिम अनुसंधान 2014 में किया गया था जिसके हिसाब से यहाँ कि जनसंख्या है 5.8 करोड़ और यहाँ एक वर्ष में करीब 75 हज़ार ब्लात्कार रिपोर्ट होते हैं यानि जनसंख्या का 0.13 प्रतिशत।

एक अन्य रिपोर्ट में पढ़ा कि दक्षिण अफ्रीका में अनुमान लगाया गया कि वहाँ वर्ष में 5 लाख ब्लात्कार होते हैं जबकि उनकी जनसंख्या केवल 5.6 करोड़ है. एक ऐसी ही रिपोर्ट ब्राज़ील के बारे में भी पढ़ी थी. वहाँ पर भी, यह सब अनुमान ही है, पुलिस में रिपोर्ट होने वाले केस इसका दस प्रतिशत भी नहीं हैं।

तो आप बताईये, उनके अनुपात में भारत की 120 करोड़ जनसंख्या में एक वर्ष में कितने ब्लात्कार होते होंगे? क्या साल में केवल 24 हज़ार का आँकणा विश्वासनीय हो सकता है, जो जनसंख्या का 0.002 प्रतिशत है? तो क्या हम लोग खुशियाँ मनायें कि भारत में अन्य बड़े देशों के मुकाबले में कम ब्लात्कार होते हैं?

अंत में

अगर भारत में ब्लात्कारों के प्रति प्रचलित सोच को बदलना है तो इसके लिए मीडिया और एक्टिविस्ट को अपनी भाषा बदलनी चाहिये. लोगों की सोच बदलने के लिए और ब्लात्कार की समस्या के बारे में समझ बढ़ाने के लिए "देवी" या "पिंक" जैसी फिल्में वह कर सकती हैं जो कई सौ आलेख या भाषण नहीं कर सकते। केवल कानून बनाने से समाज नहीं बदलते, कानूनों को समाज से स्वीकृत तथा जनसाधारण की सोच में आत्मसात होने में बहुत समय लगता है।

भारत में नारी परिकल्पना के रूप

यह बदलाव आ रहा है, इसका एक महत्वपूर्ण संकेत होगा कि भारत की पुलिस में रिपोर्ट होने वाले ब्लात्कारों की संख्या बढ़े। जब ऐसा होगा तो चिल्लाईयेगा नहीं कि पुलिस काम नहीं कर रही, पुलिस की सराहना कीजियेगा।

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सूचना: इस आलेख में जिन तस्वीरों का प्रयोग किया गया है वह कर्णाटक तथा केरल से है, लेकिन उनका ब्लात्कार के विषय से कोई सम्बंध नहीं है।

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