कोरोना वायरस का समय

डॉ. सुनील दीपक, 12 मार्च 2020

करीब दो माह पहले चीन से आने वाले कोरोना वायरस के समाचारों ने विश्व भर में डर पैदा किया था। पिछले दो सप्ताह से इटली भी इसकी लपेट में आ गया। इटली में इसके अधिकतर रोगी देश के उत्तर पूर्वी भाग में हैं, जहाँ मैं रहता हूँ। इस आलेख में इटली में व यूरोप में यह रोग कैसे बढ़ रहा है, इसका आम जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और क्या भय फैला रहा है, इस सब का विवरण है।

कोरोना वायरस रोग का प्रारम्भ

कोरोना वायरस के पहले समाचार चीन से दिसम्बर 2019 के अन्त में आने शुरु हुए थे। उस समय वायरस का नाम नहीं दिया गया था, बस यह कहा गया था कि एक नया वायरस है जो फेफड़ों पर हमला करता है और जिससे निमोनिया जैसी बीमारी हो रही है। उस समय मैं भारत जाने के लिए तैयार हो रहा था, तब मैंने उस समाचार को गम्भीरता से नहीं लिया था।

अफ्रीका के गिनेआ बिसाउ देश का एक अस्पताल

फरवरी के प्रारम्भ में जब भारत से इटली लौटा, तब तक चीन में वायरस फ़ैलने के समाचार आने लगे थे और वूहान शहर को बन्द कर दिया गया था। उस समय, यूरोप में एशिया से आने वाले यात्रियों के प्रति भय का वातावरण बन गया था। अगर किसी यात्री को बुखार होता था और विषेशकर खाँसी या ज़ुकाम होता तो उसका हवाई अड्डे पर ही वायरस के लिए टेस्ट किया जाता। मैं दिल्ली से चला था और इस्तामबूल से हो कर आ रहा था, पर तुर्की में किसी ने हमारा कोई टेस्ट नहीं किया। बोलोनिया पहुँचा तो वहाँ स्वास्थ्य कर्मियों ने माथे के सामने थर्मामीटर रख कर सभी यात्रियों की जाँच की और जिनको बुखार था, उन्हें रोक लिया। बाकी सब यात्रियों से कहा गया कि अगर आप को अगले सप्ताह में खाँसी व बुखार हो जाये तो तुरंत डॉक्टर के पास जाईये और उन्हें बताईये कि आप विदेश से लौटे हैं।

उस दिन से आज तक, पिछले एक महीने में इटली में कोरोना वायरस की स्थिति बिल्कुल पलट गयी है। यहाँ सबसे पहले, जनवरी के अंत में, चीन से रोम घूमने आये दो पर्यटकों में वायरस मिला। तुरंत लोगों में डर फ़ैल गया और लोग इटली में रहने वाले चीनी दिखने वाले लोगों से भेदभाव करने लगे। गत 30 जनवरी को इटली ने चीन से आने वाले सब विमानों पर रोक लगा दी। कई शहरों से समाचार मिला कि लोगों ने चीनी दिखने वाले लोगों का अपमान किया, उन्हें रेस्टोरेन्ट से निकाल दिया या दुकानवालों ने उन्हें बाहर जाने को कहा। कुछ छिटपुट मार पीट के समाचार भी सुने।

पहले इतालवी मरीज़ मिलान शहर के पास लोदी में 18 फरवरी को पाये गये। दो दिन बाद, मरीज़ों की संख्या 30 हो गयी थी, चार दिन बाद 133 नये मरीज़ हो गये थे। तीन प्रमुख जगहों से रोगी मिले थे, तीनों शहरों को बन्द कर दिया गया, कि कोई वहाँ से आ जा नहीं सके। शुरु के कुछ दिन तो लगा कि नये मरीज़ों की संख्या की बढ़ोतरी में कमी हुई है, लेकिन करीब दस दिन बाद, रोगियों का नम्बर फ़िर से बढ़ने लगा। 1 मार्च को 329 रोगी थी और एक सप्ताह बाद, नये रोगियों की संख्या एक हज़ार से भी अधिक हो चुकी थी। पिछले दस दिनों में यह संख्या बढ़ती जा रही है, दुगनी तुगनी हो चुकी है। कल 11 मार्च की शाम को बारह हज़ार से अधिक रोगी थे, जिनमें से 631 रोगी अस्पतालों में भर्ती थे। इनमें से अधिकतर रोगी लोम्बारदी राज्य में है जिसकी राजधानी मिलान शहर है। दूसरे नम्बर पर है वेनेतो राज्य, जिसकी राजधानी वेनिस शहर है, जहाँ मैं रहता हूँ।

रोग का संक्रमण

जिस तरह से यह रोग इटली में फैला है, उससे स्पष्ट है कि शुरु में लगता है कि थोड़े से रोगी हैं। उस समय लोग इसके बारे में हँसी मज़ाक करते हैं, अगर नागरिकों के घर से बाहर जाने या त्योहारों पर रोक लगाई जाये तो उसकी शिकायत करते हैं। हर दिन रोगियों के संख्या दुगनी बढ़ती है, दूसरे सप्ताह में एक हज़ार रोगी से अधिक हो जाते हैं, तीसरे सप्ताह में रोगी दस हज़ार से अधिक हो जाते हैं। तब तक रोगियों के मरने के समाचार आने लगते हैं तो जनता में डर फ़ैल जाता है।

जिस तरह से चीन में वूहान तथा उत्तरी इटली में रोगियों की संख्या थोड़े ही दिनों में दुगनी, तिगुनी, चौगुनी बढ़ी, उसके अध्ययन से लगता है कि फ्राँस, जर्मनी, स्पेन, अमरीका आदि में रोग का संक्रमण इटली से करीब दस दिन पीछे है। संक्रामक रोगों के विषेशज्ञों का कहना है कि अगर सभी देश इसका ठीक से नियंत्रण नहीं करेंगे तो उनकी जनता में रोग का फ़ैलना निश्चित है और खतरा है कि यह रोग पूरी दुनिया में फैल कर लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बनेगा। इस तरह का अंतिम विश्व स्तर पर फैलने वाला घातक संक्रामक रोग सन् 1918 में स्पैनिश फ्लू था जिसमें दुनिया के करीब पच्चीस से पचास करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, जिनमें से करीब दस प्रतिशत की मृत्यु हुई थी।

कुछ लोगों का कहना है कि इटली में थोड़े समय में इतने अधिक रोगी इस लिए हो गये क्योंकि यहाँ पर प्रभावित क्षेत्रों में सारी जनता पर कोरोना वायरस का टेस्ट किया गया, चाहे उनमें बीमारी का कोई लक्षण था या नहीं था, जबकि बाकि देशों में केवल उनको टेस्ट किया जा रहा है जिनमें रोग के लक्षण हैं। टेस्ट करने के लिए जो रसायन आदि चाहिये, वह सीमित हैं, इसलिए इटली में भी अब केवल उन्हीं लोगों को टेस्ट किया जा रहा है। यानि जो आँकणे सरकारें दे रहीं हैं, असली रोगियों की संख्या उससे अधिक हो सकती है।

लक्षण तथा इलाज

कोरोना वायरस का रोग संक्रमण होने के पाँच से पंद्रह दिन के भीतर उसके लक्षण करीब 40 प्रतिशत लोगों में दिखते हैं, जबकि बाकी 60 प्रतिशत में रोग का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। जिनमें रोग का लक्षण न हो, वह भी बीमारी फैला सकते हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि बीमारी फैलने से रोकने के लिए लोग घरों से बाहर न जायें। जिनको रोग के लक्षण होते हैं, उनमें बुखार और सूखी खाँसी सबसे अधिक दिखते हैं। करीब दस प्रतिशत लोगों में लक्षण तीव्र होते हैं, उन्हें सूखी खाँसी के साथ साथ साँस लेने में कठिनायी होने लगती है, क्योंकि वायरस फेफड़ों में न्योमोनिया जैसी बीमारी बनाता है। ऐसे रोगियों को अस्पताल में दाखिल करना आवश्यक है क्योंकि अगर उनके रक्त में आक्सीजन की मात्रा कम हो तो उन्हें आक्सीजन देने की आवश्यकता पड़ सकती है। करीब तीन प्रतिशत लोगों में, अधिकतर साठ साल से अधिक आयु वाले लोगों में, साँस लेने की कठिनाई इतनी अधिक होती है कि उन्हें कृत्रिम साँस दिलाने वाले रेस्पिरेटर की आवश्यकता होती है और गहन परिचर्या विभाग (इन्टैंन्सिव कैयर विभाग) में दाखिल करना पड़ता है और उनमें से अधिकतर लोगों की मृत्यु हो रही है।

इससे आप समझ सकते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं पर कितना काम का दबाव पड़ सकता है। इसको बेहतर समझने के लिए मैं अपने शहर का उदाहरण देता हूँ। हमारे शहर के आसपास के क्षेत्र को मिला कर कुल जनसंख्या करीब 40 हज़ार है। हमारे शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर एक अन्य शहर है तिऐने, जिसकी जनसंख्या करीब साठ हज़ार है। दोनों शहरों की कुल जनसंख्या करीब एक लाख है। हमारे दोनों शहर के लिए एक अस्पताल है जिसमें कुल मिला कर करीब 400 बिस्तर हैं, जिनमें से इन्टेन्सिव केयर के 14 बिस्तर हैं। अगर हमारे शहर में कोरोनावायरस को रोकने के लिए कुछ न किया जाये तो थोड़े समय में सब लोगों में रोग फ़ैल जायेगा और दस प्रतिशत यानि 10,000 लोगों को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता पड़ेगी, जिनमें से 3 प्रतिशत यानि, 3000 लोगों को रेस्पीरेटर की आवश्यकता होगी। तो आप सोचिये कि दस हज़ार रोगियों को कौन से अस्पताल में रखा जायेगा और 14 बिस्तरों में कैसे 3000 लोगों की रेस्पीरेटर से देखभाल की जायेगी?

द.अमरीका के ब्राज़ील का एक अस्पताल

इलाज की कठिनाईयाँ

उत्तरी इटली में अस्पतालों, डाक्टरों तथा नर्सों की संख्या अच्छी है, और यहाँ के रहने वालों के लिए करीब करीब मुफ्त है, 65 साल से बड़ी आयु वाले लोगों के लिए सौ प्रतिशत मुफ्त है। सामान्य समय में यह स्वास्थ्य सेवा बहुत बढ़िया काम करती है। लेकिन अगर रोग पूरी तरह से फ़ैल जाये तो यह बहुत से लोगों के लिए कुछ नहीं कर पायेगी, और बहुत लोग मरेंगे। यह हाल मिलान शहर के पास कुछ जगह हुआ है। जब अस्पताल में बिस्तर नहीं बचें तो डॉक्टरों को निर्णय लेना पड़ता है कि किसको अस्पताल में जगह दी जाये और किसे नहीं। मैंने कुछ लोगों को कहते सुना है कि 65 साल से अधिक आयु वाले लोगों को बचाने की कोशिश न की जाये, जवान लोगों को बचाने की कोशिश करें। कुछ अन्य कहते हैं कि अगर फ़िर भी बात न बने, तो पचास साल के ऊपर वालों को मरने दिया जाये। डॉक्टरों और नर्सों को रोगी होने का खतरा अधिक है और वह स्वंय भी इस तरह से सही चिकित्सा नहीं पा सकेंगे।

यह तो हमारे छोटे से शहर की बात है। दिल्ली जैसे शहर की जनसंख्या 160 से 190 लाख के करीब है, वहाँ यह रोग पहुँच गया तो क्या हाल होगा? भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा की पहुँच बहुत कम है। विषेशकर शहरों में, अगर सरकारी कर्मचारियों और कुछ बड़े अस्पतालों को छोड़ दिया जाये, तो अधिकाँश स्वास्थ्य सेवा प्राईवेट कलिनिक तथा अस्पतालों में ही मिलती है, जहां आप को बीमारी के इलाज के लिए बिना फीस दिये, न टेस्ट करते हैं, न डॉक्टर मिलते हैं। संक्रामक रोगों को रोकने के लिए प्रिवैंन्टव चिकित्सा का बहुत महत्व है लेकिन रोग होने से पहले उसे रोकने में प्राईवेट अस्पतालों व डॉक्टरों को कोई फायदा नहीं होता, वे प्रिवैन्टिव चिकित्सा में कमज़ोर होते हैं। यही हाल अमरीका और अन्य बहुत से देशों का भी है जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ प्राईवेट इन्श्योरैंस कम्पनियों के हाथ में हैं और प्राईवेट अस्पताल आप से कोरोना वायरस का टेस्ट करने के पैसे माँगते हैं। ऐसे में रोग का संक्रमण रोकना बहुत कठिन होगा। इसीलिए देश भयभीत हो रहें हैं कि अगर उनके यहाँ यह रोग फैला तो बहुत से लोग मर जायेंगे।

हमें टीवी में कहा गया कि अगर हम लोग रोग से बचने के लिए अपना व्यवहार नहीं बदलेंगे, तो इटली के इस भाग में कम से कम बीस लाख लोग रोगी हो जायेंगे। उस समय लोगों को समझ में आया कि यह कितनी गम्भीर समस्या बन सकती है। इटली में अभी तक करीब 7 प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हुई है, जोकि अन्य देशों के अनुपात में दुगना है। इसका प्रमुख कारण है कि इटली में करीब तीस प्रतिशत जनसंख्या की आयु 60 वर्ष से अधिक है जिनमें इस रोग की मृत्यु की दर अधिक है। मरने वालों में जवान लोग कम हैं, करीब पाँच प्रतिशत।

रोग का संक्रमण रोकने के लिए सलाह दी जा रही है कि जहाँ तक हो सके - घर में बन्द रहिये, दिन में कई बार हाथों को साबुन से धोईये, अगर घर से बाहर निकलते हैं तो अन्य व्यक्तियों से कम से कम एक मीटर की दूरी रखिये, अगर खाँसी जुकाम है तो रुमाल का प्रयोग कीजिये और मुँह और नाक को मास्क से ढकिये।

रोग के डर का प्रभाव

हमारा शहर वेनेतो राज्य में है, लेकिन अब तक यहाँ रोगियों की संख्या सीमित है। पूरे इटली देश में एक शहर से दूसरे शहर जाने की सामान्य यात्राएँ करने की मनाही कर दी गयी है। सब हवाई उड़ाने बन्द कर दी गयी हैं। केवल काम की विषेश आवश्यकता में आप अपने शहर से बाहर जा सकते हैं। शहर की भीतर भी, अधिकतर दुकानें, साथ ही सभी थियेटर, स्टेडियम, आदि बन्द कर दिये हैं और लोगों से घर से बाहर न निकलने के लिए कहा जा रहा है। हमने सुना कि कुछ शहरों में लोगों ने सुपरमार्किटों पर सामान जमा करने के लिए धावा बोल दिया, लेकिन हमारे शहर में अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ, यहाँ सुपरमार्किट खुली हैं और सब सामान उपलब्ध है। अभी तक हमारे अस्पताल में इस वायरस से ग्रस्त केवल तीन रोगी हैं। अगले दिनों में क्या होगा, कोई यह नहीं कह सकता।

रोग फैलने से रोकने में, जैसे कि इटली व यूरोप के अन्य देशों में हो रहा है, बहुत से आर्थिक प्रभाव पड़ रहे हैं जिनकी पूरी कीमत तो बाद में ही समझ आयेगी। दुकानें, रेस्टोरैंट बन्द करने से, दुकानदारों की आमदनी कैसे होगी? हवाई उड़ाने बन्द कर दी जायेंगी, देशों की सीमाओं पर रोक लगा दी जायेगी, तो पर्यटकों के साथ साथ, आयात नियात करने वाले ट्रक और कारगो कहाँ से आयेंगे? कई हवाई उड़ान की कम्पनियों ने अपने सभी कर्मचारियों को बिना तनख्वाह के छुट्टी पर जाने के लिए कहा है। स्कूल कॉलिज बन्द हैं, बच्चे घर में हैं, वह अगर छोटे हैं, तो माता पिता में किसी को घर पर बच्चे देखने के लिए रुकना पड़ेगा। लाखों लोगों की फैक्टरियाँ आफिस बन्द हो जायेगे, तो वह खायेंगे कहाँ से?

आप के देश में कितने रोगी

अमरीका के जोह्न होपकिन्स विश्वविद्यालय ने वेबसाईट बनाया है जहाँ आप दुनिया के विभिन्न देशों में कोरोना वायरस की क्या स्थिति है, आप यह आसानी से देख सकते हैं। इस लिन्क पर बटन दबायेंगे तो आप को नक्क्षा दिखेगा, उसके ऊपर बटन दबायेंगे, तो वहाँ से दुनिया में कोरोना वायरस रोग की क्या स्थिति है, कैसे बदल रही है, आप यह सब देख सकते हैं। इसके अनुसार इस समय दुनिया में करीब एक लाख बीस हज़ार रोगी हैं, जिनमें से अस्सी हज़ार चीन में हैं। नक्क्षे में केवल अफ्रीका के कुछ देश दिखते हैं जिनमें कोई रोगी नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि वहाँ पर इस रोग के लिए टेस्ट नहीं किये गये हैं।

एक अन्य वेबसाईट है "अवर वर्ल्ड इन डाटा" जहाँ आप दुनिया के किस देश में कितने रोगी है और बीमारी कितनी तेज़ी से फ़ैल रही, के बारे में जानकारी पा सकते हैं।

अंत में

कोरोना वायरस का क्या अन्त होगा, यह हमें मालूम है। कुछ महीनों में, या अगले वर्ष तक वेक्सीन बन जायेगी और यह रोग थामना आसान हो जायेगा। लेकिन, जैसे पूरा विश्व वैश्वीकरण की जकड़ में बँधा हुआ है, वह कैसे कम होगा? बायोतकनीकी में, जेनेटिकस में, जो तरक्कियाँ हो रही हैं, उनसे इस तरह के रोग तो भविष्य में भी दोबारा होंगे ही, यह निश्चित है। भविष्य में इस तरह के संक्रामक रोगों से पूरी तरह से बचा नहीं जा सकता, इसलिए, मेरे विचार में अगले वर्षों में बहुत से विषयों पर हमारी सोच और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों पर इस वायरस का असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, चिकित्सा सेवा का निजिकरण किया जाये या उसे हर मानव का अधिकार मान कर हर देश में सब तक पहुँचाया जाये, इस विषय में अभी तक तो अधिकतर देश निजिकरण की ओर अग्रसर हो रहे थे, शायद उनको थमना पड़ेगा और दोबारा सोचना पड़ेगा कि यह सही निर्णय है या नहीं?

महाराष्ट्र, भारत से एक प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र

पिछली सदी की जितनी बड़ी घटनाएँ थीं जिन्होंने दुनिया के अनेक देशों के भविष्य को प्रभावित किया, उनमें प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध प्रमुख थे। क्या इस सदी की प्रमुख घटनाओं में मानवता कोरोना वायरस के वैश्वीकरण को गिनेगी? यह भविष्य ही बतायेगा कि हम इस रोग के संक्रमण को रोकने में कितना सफ़ल या विफ़ल हुए।

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सूचना: इस आलेख में जिन तस्वीरों का प्रयोग किया गया है वह दुनियाँ के विभिन्न देशों से हैं और वहाँ के स्वास्थ्य कर्मियों को दिखा रही हैं, उनका कोरोना वायरस की बीमारी से कोई सम्बंध नहीं है।

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