गन्दी और दिलचस्प बातें

डा. सुनील दीपक, 25 सितम्बर 2020

कुछ दिन पहले एक अंग्रेज़ी की किताब देखी थी, "जँगल में कैसे पाखाना किया जाये" (How to shit in the woods)। इस किताब की लेखिका हैं कैथलीन मेयर (Kathleen Meyer)। यह किताब पढ़ी तो मन में इस विषय से जुड़ी कई बातें याद आ गयीं। मेरे इस आलेख में मेयर की किताब और मेरी कुछ यात्राओं से जुड़ी हुई मल मूत्र की ही बातें हैं।

इन्हें गन्दी बातें कहा जाता है और इसके बारे में बात करना व लिखना अभद्रता समझी जाती है। लेकिन मेरे अनुभव में, अगर मौका मिले तो लोग इसके बारे में बहुत दिलचस्पी से पढ़ते हैं। जैसे कि इस विषय पर दो फ़िल्में बनी हैं जिन्हें बहुत सफलता मिली थी। कुछ वर्ष पहले मेरे भाँजे अक्षत की लिखी फ़िल्म "दिल्ली बैली" में और 1987 की फ़िल्म "पुष्पक" में पाखाने का बहुत महत्व था और दोनो फ़िल्में हिट हुई थीं।

अगर ऐसी बातों से आप की तबियत खराब हो जाती है, या जी मिचलाता है, तो यह आलेख आप के लिए नहीं है। आप चाहें तो चार्ली चेपलिन 1936 की फ़िल्म "मॉडर्न टाईमज़" (Modern Times) का वह दृश्य देखिये जिसे "स्वर्ग जैसा घर" कहा जाता है, जिसे जितनी बार देखता हूँ, हँसी आती है। आप भी मुस्कराईये और इस आलेख को छोड़ कर कुछ और पढ़िये।

कैथलीन मेयर की पुस्तक

कैथलीन मेयर की किताबअंग्रेज़ी में "शिट" (shit) यानि पाखाना शब्द के विभिन्न प्रयोग होते हैं। अक्सर इसका प्रयोग लोग गुस्से में मन की भड़ास निकालने, गाली देने की परिस्थितियों में करते हैं। मैंने कैथलीन मेयर की किताब का शीषर्क पढ़ा कि जँगल में पाखाना कैसे किया जाये तो सोचा कि अवश्य यह पाखाना शब्द का संकेतात्मक उपयोग किया होगा, क्योंकि पाखाना करने के लिए भी सीखना पड़ेगा, यह बात मुझे समझ नहीं आयी थी।

लेकिन एक बार उसे पढ़ना शुरु किया तो समझ में आया कि किताब में सचमुच यही सिखाया गया है कि खुले में कैसे बैठा जाये, कैसे स्थान का चयन किया जाये, कैसे सफाई के लिए पानी, पत्तों,आदि का उपयोग किया जाये। इसमें बहुत सी रोचक जानकारी है जैसे कि नदी के किनारे क्यों पाखाना नहीं करना चाहिये या फ़िर, जँगल में पाखाना करने के लिए, ज़मीन में खड्डा खोदना चाहिये या नहीं, और वह खड्डा पाखाना करने से पहले खोदना चाहिये या बाद में।

सुश्री मेयर का कहना है कि आजकल बहुत से लोग प्रकृति से जुड़ना चाहते हैं और जँगल पहाड़ों पर ट्रेकिन्ग के लिए जाते हैं, जहाँ बहुत से लोगों को शौच जाने की आवश्यकता पड़ती है। इतने लोग इस तरह से प्रकृति प्रेम दिखाने निकलने लगे हैं कि जाने माने जँगलों के रास्तों पर पाखाने के ढेर मिल जाते हैं और प्रकृति का प्रदूषण होता है।

मैंने यह पुस्तक थोड़ी सी ही पढ़ी, मुझे लगा कि इस विषय में मेरी प्रेकटिकल जानकारी बहुत थी और मुझे इस शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी। मेरे विचार में इस विषय पर यह अनूठी पुस्तक होगी। शायद इसी लिए इसकी बिक्री भी बहुत हुई है क्योंकि पुस्तक में लिखा है कि इस किताब के पिछले बीस वर्षों में कई संस्करण छप चुके हैं।

मेरी यादें

बचपन में जब छोटा था तो नाना नानी के पास गाँव में रहने जाता था। नाना के खेत दिल्ली के पास नजफ़गढ़ की ओर जाते हुए रास्ते में पड़ते थे जिसे ककरौला मार्ग कहा जाता था। आजकल वहाँ द्वारका मोड़ का मैट्रो स्टेशन बना है, और नाना की बची खुची ज़मीन पर मेरे मामा का स्कूल बना है। वहाँ भी उस समय टॉयलेट नहीं होते थे, और सुबह अँधेरे में सब बच्चे लोटा ले कर खुले में ही शौच करने जाते थे। यानि ऐसा नहीं था कि मैं पहले कभी खुले में शौच पर नहीं गया था।

भारत में रेल से यात्रा कीजिये तो अक्सर गाँवों के आसपास, सुबह सुबह रेल लाईन के पास ही कतार में लोग शौच के लिए बैठे होते हैं। सुबह की रोशनी में उन्हें देख कर मुझे थोड़ी सी शर्म आती है, पर शायद उन लोगों को रेल में बैठे लोगों को देखने की आदत हो गयी होती है? पिछले कुछ वर्षों से मोदी जी ने टॉयलेट बनवाने का अभियान चलाया है, शायद उससे रेल की पटरियों के पास शौच करने वालों में कुछ कमी हुई हो!

आज से पैंतीस-चालिस वर्ष पहले, जब मैंने विभिन्न देशों की यात्रा करनी शुरु की थी, उस समय की स्थिति आज से बहुत भिन्न थी। अक्सर उन यात्राओं में मैं गाँवों में जाता था और अक्सर मेरा पेट खराब हो जाता था। मेरी उस समय की बहुत सी यात्राओं में शौच जाने से सम्बंधित यादें जुड़ी हैं। जितनी यात्राएँ मैंने की हैं, उनको याद करना बहुत कठिन है, लेकिन उनके बारे में सोचूँ तो मुझे लगता है कि जिन यात्राओं में शौच जाने से सम्बंधित कुछ दुर्घटना हुई थी, वह स्मृतियाँ मन में अधिक गहरी बैठी हैं, उन्हें भूलना कठिन है।

अगर उन सब यात्राओं के बारे में लिखूँ तो एक नहीं कई सारे आलेख लिखने पड़ेंगे। इसलिए केवल नमूने के तौर पर आज के इस आलेख में एशिया की ऐसी ही दो यात्राओं की बातें हैं।

चीन यात्रा

चीन में पहली बार सन् 1988 में गया था और उसके बाद वहाँ कई बार लौटा था। तब के चीन में और आज के चीन में ज़मीन आसमान का अंतर है। जिस यात्रा की बात कर रहा हूँ वह शायद 1992 के आसपास की थी। हम लोग चीन के दक्षिण पश्चिमी भाग में युनान प्रदेश में कुष्ठ रोग निवारण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के सम्बंध में यात्रा कर रहे थे। एक दिन देर सुबह में छू शियांग नाम के शहर में पहुँचे थे जहाँ हमें वहाँ के स्वास्थ्य डायरेक्टर से मिलना था।

उस दिन मेरा पेट कुछ खराब था। डायरेक्टर से मिलने का जो एपाँयटमैंट मिला था उसमें कुछ समय था तो मैंने अपने साथी चीनी डॉक्टर से कहा कि मुझे टॉयलेट की आवश्यकता थी। सामने स्वास्थ्य विभाग का भवन था और उसके पीछे, थोड़ी सा दूर टॉयलेट बने थे।

टॉयलेट में अन्दर घुसा तो चकित रह गया, लाईन में एक के साथ एक पाखाने बने थे, जिनके बीच में कोई दीवारें नहीं थीं। वहाँ तीन व्यक्ति शौच के लिए बैठे थे, उनमें से एक व्यक्ति ने मुझे इशारा करके अपने साथ के पाखाने पर आने के लिए कहा। बहुत अजीब लगा, लेकिन आवश्यकता भी थी और उन लोगों को कुछ अजीब नहीं लग रहा था तो मैं ही क्यों झिझकता?

वहाँ उनके साथ शौच के लिए बैठा तो सही लेकिन शर्म के मारे कुछ नहीं कर पाया। पेट खराब था, इसके बावजूद उस समय शरीर से कुछ नहीं निकला।

वहाँ से बाहर आया तो बहुत हँसी आयी कि वह कैसा अनुभव हुआ था। लेकिन असली आनन्द तो अभी बाकी थी। जब डायरेक्टर साहब के आफिस में घुसे तो देखा कि वह तो वही सज्जन थे जिनसे पहले टॉयलेट में मिल चुका था, जिन्होंने इशारा करके मुझे पास में बैठने को कहा था।

कुछ वर्षों के बाद चीन में लौटा तो वही सज्जन पूरे राज्य के स्वास्थ्य विभाग के डॉयरेक्टर बन गये थे। उसके बाद विभिन्न यात्राओं में उनसे कई बार मिला, कुछ मित्रता सी हो गयी, लेकिन मैं उनसे वह अपनी पहली मुलाकात कभी नहीं भुला पाया।

मँगोलिया यात्रा

मँगोलिया मैं बहुत बार गया हूँ। जिस यात्रा की बात मैं कर रहा हूँ वह 1994 के आसपास थी। हम लोग राजधानी उलानबातार से चले थे और करीब चार या पाँच घँटों की यात्रा के बाद एक झील के पास रात के लिए ठहरे थे। वैसे तो पूरा मँगोलिया देश ही एक उच्च पठार क्षेत्र है, लेकिन जिस जगह पर हम लोग ठहरे थे, वह बिल्कुल समतल था जिस पर छोटी घास उगी थी। आसपास न कोई पत्थर, न चट्टाने, न पेड़ और पौधे। एक ओर झील थी और करीब छः या सात किलोमीटर दूर कुछ पहाड़ दिखते थे, बस और कुछ नहीं था।

हम लोग रात को एक पाराम्परिक गोल टैंट में ठहरे जिसे वहाँ की भाषा में "गेर" कहते हैं। सुबह उठे तो मालूम चला कि वहाँ कोई टॉयलेट नहीं था, अगर आप को आवश्यकता थी तो आसपास में कहीं पर भी शौच कर सकते थे। गर्मियों के दिन थे, सुबह चार बजे से ही सूर्योदय हो गया था, इसलिए उस समय तक रोशनी बहुत हो गयी थी, और आसपास देखना आसान था।

बड़े होने के बाद, मँगोलिया में वह पहली बार थी, जब मुझे रोशनी में खुले आम इस तरह शौच करना पड़ रहा था। हमारे दल में पुरुष व स्त्रियाँ दोनो थे, उनमें कई बड़े सरकारी अफसर थे। उनमें से कई लोग सुबह सुबह टैंट के बाहर खड़े थे, इधर उधर देख रहे थे।

मैं हाथ में पानी की बोतल ले कर बाहर निकला, तो चलता ही गया। पंद्रह या बीस मिनट तक चला। पर मुड़ कर देखा तो मुझे सब टैंट व लोग स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, यानि उनको भी मैं स्पष्ट दिख रहा था, तो समझ में नहीं आया कि क्या किया जाये। थोड़ी दूर देखा तो हमारे साथ आयी एक युवती भी वहाँ शौच के लिए बैठी थी।

तब समझ में आया कि ऐसे शरमाने से काम नहीं चलेगा। तो सोचा कि किस दिशा में बैठा जाये, यानि लोगों को शरीर का आगे का भाग दिखाना ठीक रहेगा, या पीछे का? मुझे नहीं मालूम कि मेयर की पुस्तक में इसके बारे में क्या सलाह दी गयी है। मुझसे लोगों को देखते हुए यह काम नहीं हो सकता, यह सोच कर मैंने अपना पिछला हिस्सा दिखाना ही सही समझा।

उस यात्रा में मुझे शरीर की लज्जा से मुक्त होने का पाठ सीखने को मिला। देखा कि बाकी के लोग बहुत दूर नहीं जाते थे, कोई भी यह परवाह नहीं करता था कि किसको क्या दिख रहा है। हम सब बाकी के लोग ही उस ओर से दृष्टि हटा लेते थे। चार पाँच दिनों तक सुबह शाम यही ड्रामा हुआ, तो आदत पड़ गयी।

अंत में

पिछले दस पंद्रह वर्षों में अधिकतर देशों में स्थिति बदल गयी है। गाँवों में भी जाना पड़े तो अक्सर आसपास के छोटे शहरों में रहने के लिए होटल आसानी से मिल जाते हैं। गाँवों में भी लोगों के घरों में टॉयलेट बने होते हैं, तो इस तरह के अनुभवों का मौका नहीं मिलता। लेकिन अपने उन पुराने अनुभवों के बारे में सोचता हूँ तो हँसी आती है, थोड़ी सी शर्म आती है और अच्छा भी लगता है। यह सच है कि उन यात्राओं की वह बातें भूलना आसान नहीं है।

जैसा कि मैंने लिखा, मेयर की पुस्तक को बहुत व्यवसायिक सफलता मिली है। मुझे आशा है कि हिन्दी के लेखक भी इस बात से प्रेरणा ले कर इस विषय पर पुस्तक लिखेंगे और पैसा कमायेंगे। ऐसे विषय पर जिसमें हम भारत में पी.एच.डी कर सकते हैं, कोई भारतीय लिखेगा तो अवश्य वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से मेयर की किताब से बढ़िया ही लिखेगा।

*****

सूचना: इस ब्लाग पर टिप्पणी देने की सुविधा नहीं है. इसका यह अर्थ नहीं कि मैं अपने पाठकों से बात नहीं करना चाहता, सच में आप कुछ कहें तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगर आप चाहें तो मुझे ईमेल (sunil.deepak@gmail.com) भेज सकते हैं या फ़िर इस ब्लाग के फेसबुक पृष्ठ पर अपनी टिप्पणी छोड़ सकते हैं.

*****

वापस होमपेज जाएँ

ब्लाग परिचय

मेरी लिन्क

आलेखों के वार्षिक पुरागार

मनपसंद हिन्दी चिट्ठे

कुल चिट्ठा पाठक

प्राईवेसी कुकीज़

तस्वीरों के कोपीराईट

हिन्दी पढ़ने के फोंट

सम्पर्क

Dr Sunil Deepak
Schio (VI)

Email: sunil.deepak(at)gmail.com