सृजनकार और उसकी कृति

डा. सुनील दीपक, 14 सितम्बर 2020

पिछले कुछ समय से कई बार कुछ जाने माने कलाकारों, लेखकों, पत्रकारों आदि के बारे में सुना और पढ़ा कि उन्होंने अपने करीब के लोगों की कमज़ोरी का गलत लाभ उठाया, उनके साथ गलत व्यवहार किया। किसी ने फ़िल्मों में साथ में काम करने वाली या काम चाहने वाली अभिनेत्री के साथ जबरदस्ती की, किसी ने जवान पत्रकार की मजबूरी का फायदा उठाया। सब कहानियों में यह बात भी निकलती है कि घटना के बाद, उनके शिकारित व्यक्ति बहुत समय तक इस बात को किसी से नहीं कह पाये, कहा भी तो किसी ने विश्वास नहीं किया। अब सालों के बाद जब यह बातें बाहर निकलती हैं, तो सोशल मीडिया में हल्ला मचता है जिसका असर उन पर व्यक्तिगत रूप से तो पड़ता ही है, जो किया उसकी कुछ सज़ा भी मिलती है।

Creater or Creativity - Image & Art by Sunil Deepak

लेकिन इसके साथ में एक यह प्रश्न भी उठता है कि इस तरह से बहीष्कृत कलाकारों, लेखको, निर्देशकों की पुरानी कलाकृतियों के साथ क्या किया जाना चाहिये? कलाकार के साथ उनके सारे काम को भी कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिये? क्या उनकी कलाकृतियों का भी बहिष्कार होना चाहिये? इस आलेख में इसी विषय की चर्चा है।

कैन्सिल कल्चर का ध्वंसवाद

कोई भी विषय हो, आजकल लोगों के व्यक्तिगत विचार केवल उन तक या उनके परिवार तथा मित्रों के दायरे में सीमित नहीं रहते। सोशल मीडिया के माध्यम से लोग तुंरत मैदान में युद्ध में कूद पड़ते हैं और ट्विटर या फेसबुक के द्वारा इतना हल्ला मचाते हैं कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगा हो, कभी कभी उसका जीना और काम करना कठिन हो जाता है। कई बार यह हमला इतने सारे लोग मिल कर करते हैं कि ऐसे व्यक्तियों को नौकरी से निकाल देते हैं, उन्हें काम मिलना बन्द हो जाता है। इसे "कैन्सिल कल्चर" (Cancel culture) यानि "नष्टवादी संस्कृति" का नाम दिया गया है।

नष्टवादी संस्कृति का प्रभाव केवल कलाकारों, लेखकों, अभिनेता, निर्देशक आदि प्रसिद्ध लोगों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि आम व्यक्तियों पर भी पड़ा है। विषेशकर अमरीका और यूरोप में आजकल लिंगभेद, रंगभेद, जातिभेद, धर्मभेद, जैसे विषयों पर कट्टरवादी लोगों का प्रभाव सोशल मीडिया पर बहुत गहरा है और कभी कभी मज़ाक में कही बातों पर भी वह व्यक्ति नाराज़ हो जाते हैं और सोशल मीडिया का हमला कर देते हैं। हर देश में कई हाशियाबन्द लोगों के गुट होते हैं जिनके प्रति वहाँ मज़ाक बनते हैं, जो सामाजिक दृष्टि से सही नहीं माने जा सकते, जैसे कि उत्तर भारत में सिख लोग, सास बहु के रिश्ते के प्रति, स्त्रियों के प्रति, गँजे व्यक्तियों और विकलांग लोगों के प्रति, मानसिक रोगों के पीड़ित व्यक्तियों के प्रति, जैसे कई गुट हैं जिनके बारे में अक्सर इस तरह के मज़ाक किये जाते है़।

व्यक्तिगत स्तर पर अगर कोई इस तरह के मज़ाक करे तो मुझे बुरा लगता है और ऐसे व्यक्तियों से किसी तरह की घनिष्ठता नहीं बना पाता। लेकिन मेरी समझ में जो लोग इस तरह की बाते करते हैं, उसकी प्रमुख वजह है कि हमारे समाजों में इस तरह की सोच गहरी है और इस सँस्कृति को बदलना आसान नहीं है। लेकिन कोई इस तरह की बातें करता है तो उसके पीछे सोशल मीडिया के भेड़िये छोड़ दिये जायें जो उन्हें नौकरी से निकलवा दें या उनका बिज़नस बन्द करवा दे, मुझे अतिश्योक्ति लगता है।

विचारधारा से असहमति

अगर बात केवल मज़ाक की नहीं बल्कि विषेश राजनीतिक सोच की है तो? अगर कोई व्यक्ति नक्सलवादी है, या दकियानूसी और रूढ़िवादी है, या वह हिन्दुत्ववादी है, तो क्या उसका सोशल मीडिया के माध्यम से बहिष्कार कराना सही है? मेरी दृष्टि में यह सही नहीं है। मैं सोचता हूँ कि जिनके विचारों से हमें मतभेद है, अगर वह हिँसा का संदेश नहीं दे रहे, मरने मारने की बातें नहीं कर रहे, तो विचारों का विरोध विचारों से ही होना चाहिये, चाहे हम उनके विचारों से कितना भी असहमत हों, किसी को बोलने ही नहीं देना गलत बात है।

अगर जो गलत बात कह रहें हैं, उनको बात कहने ही नहीं देंगे, तो यह खतरा बन जाता है कि हम सोचने लग जाते हैं कि समस्या समाप्त हो गयी।

पिछले वर्ष "कबीर सिंह" फ़िल्म आयी थी, मैंने नहीं देखी लेकिन उसके बारे में पढ़ा। जो पढ़ा है, उससे लगता है कि इस फ़िल्म में लड़कों को शराबी, नशेड़ू और हिँसक बनने का सबक मिलता है और लड़कियों को ऐसे लड़कों को प्यार करने की सीख मिलती है। जब यह फ़िल्म निकली थी तो बहुत आलेख पढ़े थे कि ऐसी फ़िल्मों को बनने ही नहीं देना चाहिये, यह समाज में गलत संदेश देती हैं। साथ में यह पढ़ा कि फ़िल्म बहुत हिट हुई थी, विषेशकर युवावर्ग में। यह नहीं मालूम कि इस फ़िल्म को अधिकतर लड़कों ने देख कर हिट बनाया या फ़िर इसे देखने वालों में लड़कियाँ भी आगे थीं। मेरे विचार में इस तरह की फ़िल्म की लोकप्रियता से सब समझदार लोगों को सोचना चाहिये कि समाज में क्या बदला है, क्या नहीं बदला और क्यूँ? इस फ़िल्म पर घरों, विद्यालयों और कॉलिजों में चर्चा होना चाहिये, यह कहने के लिए नहीं कि फ़िल्म कितनी गलत बात दिखा रही है, बल्कि युवाओं का दृष्टिकोण समझने के लिए कि उन्होंने इस फ़िल्म में क्या पाया और वह उन्हें क्यों सही लगा?

मेरी दृष्टि में भिन्न विचारों और सोच वालों को बैन करना, उन्हें बोलने का मौका नहीं देना, इस बात का सूचक है कि आप को अपने विचारों और अपनी सोच पर पूरा भरोसा नहीं, बल्कि आपके मन में कुछ असुरक्षा की भावना है। जब बातचीत नहीं करेंगे, दूसरे पक्ष की सोच को समझगें ही नहीं तो उसे कैसे बदलेंगे?

जब बात विचारों तक सीमित न हो

लेकिन अगर बात केवल मज़ाक की, या किसी विषेश सोच तक सीमित नहीं हो, बल्कि उसका अन्य व्यक्तियों के शरीर और मानसिक संतुलन पर प्रभाव पड़े, तब उन्हें रोकना आवश्यक है, लेकिन किस तरह से? जब एक ओर जाने माने व्यक्ति हों, राजनेतिक नेता हों, बड़े अफसर हों, प्रसिद्ध कलाकार या अभिनेता हों और दूसरी ओर, उनके मुकाबले में कमज़ोर लोग हों जैसे काम खोजने वाले नये युवा अभिनेता, नीचे काम करने वाले लोग, छोटे बच्चे, आदि, और ताकतवर लोग उनके शरीरों और भावनाओं के साथ खेलें, तो क्या इस स्थिति में उन पर सोशल मीडिया के माध्यम से उन पर हमला करना सही होगा?

भारत में इस तरह की कुछ चर्चाएँ जाने माने लेखकों, पत्रकारों, अभिनेताओं, निर्देशकों आदि के बारे में निकली थीं। कुछ लोगों पर इसकी वजह से सोशल मीडिया पर अभियान चले थे, लेकिन उनका असर, इक्का दुक्का लोगों को छोड़ कर, अधिक नहीं हुआ। अमरीका और यूरोप में इन सोशल मीडिया अभियानों का अधिक असर हुआ है।

सच कहूँ तो यह प्रश्न मुझे दुविधा में डाल देता है। एक ओर मुझे लगता है सोशल मीडिया की जन अदालत में हमला करने से हम ही आरोपी, हम ही वकील और हम ही न्यायाधीश बन जाते हैं और भावनाओं से प्रभावित हो कर जल्दबाजी में निर्णय ले लेते हैं। किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना आसान है, हाँ जब आरोप एक नहीं अनेक लोग लगायें तो उन पर विश्वास करना आसान हो जाता है। दूसरी ओर मैं यह भी समझता हूँ कि पुलिस और न्यायालय के द्वार खटखटाओ तो न्याय में वर्षों लग सकते हैं और ताकतवर व्यक्तियों को सज़ा दिलाना आसान नहीं है। न्याय व्यवस्था की सभी कमियों को देख कर भी मेरी सोच में बेहतर होगा कि अगर जिसने गलत कर्म किया उसे न्याय व्यवस्था के माध्य से उसकी सज़ा मिले। हालाँकि मैं मानता हूँ कि मेरे अपने किसी प्रिय जन के साथ ऐसा हो तो बदला लेने की जलन में मैं स्वयं अपनी इस सीख को भूल जाऊँ।

पर अगर उस अन्याय की बात पुरानी हो, अब उसे न्याय मिलना संभव नहीं हो, तो क्या सोशल मीडिया से ऐसे व्यक्तियों पर अभियान चलने चाहिये? एक ओर से मुझे लगता है कि जिसके साथ अन्याय हुआ हो, अक्सर वह इसकी शर्म का बोझा मन में छुपा कर जी रहा होता है और ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से उसे सबको कह पाना उस शर्म पर विजय पाना है। दूसरी ओर से मुझे लगता है कि आरोप लगाना और जीवन नष्ट करना बहुत आसान है, विषेशकर जब कोई सबूत न देना पड़े। इस दुविधा का क्या उत्तर होना चाहिये, मैं निर्धारित नहीं कर पाता।

बदनाम कलाकार की कृति

दूसरी बात है कि बदनाम होने के बाद इन महानुभावों की कलाकृतियों के साथ क्या व्यवहार किया जाये? जिस लेखक की पुस्तकों को आप ने बार बार पढ़ा हो, जिनसे आप को प्रेरणा मिली हो, और जिस लेखक को आप ने मन में ऊँचा स्थान दिया हो, अगर यह बात सामने आये कि वह भ्रष्टाचारी है, या उसने बलात्कार किया है, या वह नशेबाज और हिँसक व्यक्ति है, तो क्या हम उसकी किताबें पढ़ना छोड़ दें? इतना ही नहीं, सभी पुस्तकालयों से उसकी किताबें हटा देनी चाहिये? उसे किसी सभा समारोह में बोलने की अनुमति नहीं देनी चाहिये? यहाँ लेखक की जगह पर चित्रकार, गीतकार, गायक, नेता, वैज्ञानिक, प्रोफेसर और उनकी कृतियाँ, कोई भी हो सकता है।

बहुत से लोग कहते हैं कि कलाकार और कृति दो भिन्न बातें हैं और उन्हे भिन्न ही रखना चाहिये। अन्य लोग कहते हैं कि अगर कलाकार के कुकर्म सिद्ध हो चुके हैं, एक नहीं अनेक लोग इस बात की गवाही दे रहे हैं कि उस व्यक्ति ने वह कुकर्म किये थे, तो उसकी कृतियों को सम्मान देना, उस व्यक्ति को बढ़ावा देना है। वह मानते हैं कि गलत काम और व्यवहार करने वाले व्यक्ति की हर कृति को नक्कार देना चाहिये, उसे किसी मंच पर जगह नहीं मिलनी चाहिये।

मेरी सोच

मेरे विचार में कलाकार के निजि जीवन को उसकी हर कृति से जोड़ना सही बात नहीं है। मेरी इस सोच के कई कारण हैं - पहली बात तो यह है कि हर किसी के बुरे काम बाहर नहीं निकलते, बहुतों के कुकर्म छुपे रह जाते हैं। तो क्या जिनके विरुद्ध बातें निकली हैं, केवल उनको ही यह सज़ा मिलनी चाहिये?

बहुत से प्राचीन कलाकार, लेखक, गुरु आदि अपने जीवन में वह करते थे जो आज के मापदँडों से गलत माना जायेगा, लेकिन क्या यह सही है कि हम गुज़रे समय के जीवनों को आज के मापदँड से मापें? किसी ज़माने में लड़की का छोटी उम्र में विवाह करना, या पत्नि को घर में बन्द करके रखना, या गुलाम खरीदना व बेचना, या अन्य धर्म के लोगों को नीचा समझना, जैसी बातें सही मानी जाती थीं, जबकि आज की हमारी सोच इससे भिन्न है तो क्या हम उनकी कला, लेखन, दर्शन को गलत मान लें और उसे नक्कार दें? मुझे लगता है कि अतीत को आज के मापदँडों से माप कर देखने वाले लोग  जो कहते हैं कि इस बात में कट्टर होना चाहिये, ऐसे हर व्यक्ति का नाम इतिहास से काट देना चाहिये या उसकी मूर्तियों पर कालिख पोत देनी चाहिये, कई बार वह स्वयं भी कुछ न कुछ छुपा रहे होते हैं या किसी अपराधबोध से ग्रस्त होते हैं। दूसरी बात, अगर हम इस दृष्टि से देखें तो शायद ही हमारे पुस्कालयों में किसी प्राचीन दर्शनशास्त्री या विद्वान की पुस्तकें बचेंगी।

भारत के इतिहास में बहुत से ऐसे लोग हैं जो गलत राह पर चले, लेकिन फ़िर उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। इनमें वाल्मीकि, सम्राट अशोक और अँगुलीमाल जैसे लोग भी हैं। क्या आप अन्य लोगों को सुधरने और बदलने का मौका नहीं देंगे और उनकी कृतियों को नक्कार देंगे? यह कहना कि क्योंकि इसने पहले गलत काम किये हैं, यह भविष्य में भी केवल गलत काम करेगा, क्या सही सोच होगी? किसी व्यक्ति के आज के काम को नकारना क्योंकि अतीत में उसने विवादस्पद बात लिखी थी या कही थी, यह मानना है कि कोई सुधर ही नहीं सकता।

यह सच है कि कई लोग नहीं बदलते। उनका पछतावा सतही होता है, केवल बहाना होता है आप को और कानून को उल्लू बनाने के लिए, पर क्या इससे हम सारी मानवता को नकार देंगे और किसी को सुधरने का मौका नहीं देंगे? मेरे विचार में बीते अन्याय को न्याय चाहिये, एक नया अन्याय नहीं। बाईबल में येसू कहते हैं कि पहला पत्थर वह मारे जिसने स्वयं पाप नहीं किया हो। मेरे विचार में सोशल मीडिया पर बहुत से लोग जो पत्थर मारते हैं वह अपने कर्मों को छुपाना चाहते हैं।

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