लड़का, लड़की या ...

डा. सुनील दीपक, 24 जुलाई 2020

जब शरीर का लिंग एक हो और मन का लिंग दूसरा, यानि शरीर और मन में तालमेल न हो तो इसका क्या उपाय है? और जब यह कठिनाई एक छोटा बच्चा महसूस करे तो क्या किया जाये?

Boy or Girl - Image & Art by Sunil Deepak

आज से करीब एक दशक पहले मैंने न्यू यार्क टाईमस मेगज़ीन पत्रिका में एक अमरीकी प्रोफेसर रुथ पाडावर का लिखा एक आलेख पढ़ा था, जिसकी प्रतिक्रिया में मैंने अपने पुराने ब्लाग पर एक आलेख लिखा था, "फ्राक पहनने वाले लड़के"। आज के इस आलेख में उसी विषय पर लौट रहा हूँ।

बच्चों में अंतरलैंगिकता

अपने पुराने आलेख के प्रारम्भ में मैंने लिखा थाः

आप का दो या तीन साल का बेटा फ्राक पहनने या नेल पालिश लगाने की ज़िद करे या खेलने के लिए गुड़िया चाहे, तो आप क्या करेंगे? और आप कुछ न भी कहें, आप के मन में क्या विचार आयेंगे? अगर पाँच-छहः साल का होने पर भी आप का बच्चा इसी तरह की ज़िद करता रहे तो आप क्या करेंगे? अगर आप की उसी उम्र की बेटी इसी तरह से पैंट या निकर पहनने की ज़िद करे, लड़कों के साथ मार धाड़ के खेलों में मस्त रहे तो आप क्या सोचेंगे? आज के समाज में लड़कियाँ का पैंट या जीन्स पहनना आसानी से स्वीकारा जाने लगा है। शायद ही ऐसा कोई काम बचा हो जिसे केवल लड़कों का काम कहा जाता हो। डाक्टर, वकील से ले कर पुलिस और मिलेट्री तक हर जगह अब लड़कियाँ मिलती हैं। कोई युवती पुलिस में हो या मिलेट्री में, यह भी स्वीकारा जाता है कि उस युवती का विवाह होगा, बच्चें होगें और परिवार होगा, यह आवश्यक नहीं कि उस युवती को लोग समलैंगिक या अंतरलैंगिक ही माने। लेकिन शायद लड़कों के लिए समाज के स्थापित लिंग मूल्यों की परिधि से बाहर निकलना, अभी भी आसान नहीं है। पति घर में झाड़ू या सफ़ाई करे, खाना बनाये या बच्चे का ध्यान रखे, तो अक्सर लोग सोचते हैं कि "बेचारे को कैसी पत्नी मिली!" या फ़िर सोचते हैं कि उसमें पुरुषार्थ की कमी है। लड़के फ्राक पहनना चाहें, मेकअप करना चाहें या गुड़िया से खेलना चाहें, तो तुरंत ही माता पिता दोनो बिगड़ जाते हैं। खेल के मैदान में साथ खेलने वाले साथी और विद्यालय में साथ पढ़ने वाले उसका जीवन दूभर कर देते हैं।

पिछले दस वर्षों में इस विषय पर बहुत कुछ पढ़ा है। मेरे कुछ मित्र भी हैं जोकि हमारी मान्य लिंग व्यवस्था, जो समाज को पुरुष तथा स्त्री में बाँटती है, उस व्यवस्था को नहीं स्वीकार कर पाते और स्वयं को उससे बाहर महसूस करते हैं। उनसे कई बार इस बारे में बात करके उन्हें समझने की कोशिश भी की है।

बच्चों के लिंग भाव

कई बार देखा गया है कि कुछ बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही समझ जाते हैं कि उनके शरीरों में और उनकी अपनी मानसिक छवि में अंतर है। उनमें से कुछ बच्चे अपने परिवार में यह स्पष्ट कहते हैं कि वह लड़का नहीं लड़की हैं या लड़की नहीं लड़का हैं। इससे जुड़ा प्रश्न है कि किस उम्र में बच्चा अपने लिंग के बारे में अपना स्वतंत्र निर्णय ले सकता है? किस आयू में बच्चों को लिंग परिवर्तन की अनुमति होनी चाहिये? अधिकतर देशों के कानून कहते हैं कि यह निर्णय केवल व्यस्क होने के बाद लिया जाना चाहिये, यानि 18 वर्ष की आयु के बाद। लेकिन बहुत से किशोर कहते हैं कि अठारह वर्ष बहुत अधिक है, निर्णय लेने वाली इस आयु को घटाना चाहिये।

पिछले कुछ वर्षों में यूरोप, अमरीका आदि विकसित देशों में किशोरावस्था में बच्चों में लिंग-बदलाव की सर्जरी कराने चाहने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है।

2019 में इस विषय पर अमरीका में टेक्सास राज्य में एक माता पिता में झगड़ा हुआ जोकि कचहरी तक पहुँच गया, जिसकी समाचारों में बहुत चर्चा हुई। वह माता पिता अलग हो गये थे और उनका सात वर्षीय पुत्र माँ के साथ रहता था। उस बालक को लगता था कि वह बालिका है और वह बालिका की तरह ही रहना चाहता था। उसकी माँ उसके पक्ष में थी लेकिन पिता का कहना था कि वह बच्चा है, उसे इस बात की समझ नहीं है और हो सकता है कि थोड़ा बड़ा होकर वह अपना विचार बदल दे, इसलिए वह इसके विरुद्ध थे। पिता के अनुसार, बच्चे की माँ उसे दवाईयाँ दे रही थीं जिससे बच्चे का शरीर बदल रहा था, जो उचित नहीं था। वह कहते थे कि भविष्य में अगर वह बच्चा अपना निर्णय बदलना चाहेगा तो वह आसान नहीं होगा। माँ ने कहा कि बच्चे को कोई दवा नहीं दी जा रही थी, ऐसा कुछ नहीं किया जा रहा था जिसे बच्चा स्वयं न बदल सके। केवल बच्चे की इच्छा को माना जा रहा कि उसे लड़कियों के कपड़े पहनने, और उनकी तरह रहने का मौका मिले और उससे लड़कियों की तरह व्यवहार किया जाये। अंत में न्यायाधीश ने इस मुकदमें में माँ की बात को माना।

बहुत से अंतरलैंगिक लोग (transgender persons) आपरेशन करा कर लिंग बदलते हैं. नारियाँ जो पुरुष बनना चाहती हैं, अपनी नारी ग्रंथियों (ovaries) को निकलवा देती हैं, वक्ष की सर्जरी करवाती हैं, प्रजननाँगों की सर्जरी करवाती हैं और पुरुष हॉरमोन लेती हैं। पुरुष जो नारी बनना चाहते हैं, वह आपरेशन से वक्ष का निर्माण करवाते हैं, प्रजनानाँगों की सर्जरी करवाते हैं और नारी हॉरमोन लेते हैं। बहुत से लोग इनमें कुछ चीज़ों को ही बदलाते हैं, सारे आपरेशन नहीं कराते। कुछ अन्य लोग केवल हॉरमोन लेते हैं, कोई भी आपरेशन नहीं कराते। कुछ लोग हॉरमोन भी नहीं लेते, केवल वस्त्र और व्यवहार बदलते हैं। यह सभी लोग अंतरलैंगिकता की परिभाषा में आते हैं।

कई देशों में ऐसे व्यक्ति अगर कानूनी स्तर पर लिंग का बदलाव चाहते हैं, यानि चाहते हैं कि कानून की दृष्टि में उन्हें पुरुष की जगह नारी माने जाये, या नारी की जगह पुरुष माने जाये, तो उनके लिए अपने गर्भ-अंगों का आपरेशन कराना आवश्यक है। इन देशों का कहना है कि कानूनी लिंग परिवर्तन के बाद यह व्यक्ति अपने मूल लिंग के अनुसार बच्चा नहीं पैदा कर सकते क्योंकि उससे अन्य कानूनी विवाद बन जायेंगे।

इस तरह के शरीर के बदलाव के आपरेशन करवाने से पहले उन्हें कई माह या वर्षों तक मनोवैज्ञानिक विषेशज्ञ की निगरानी में रहना होता है ताकि वे अपने शरीर में होने वाले बदलावोँ की गम्भीरता को समझ सकें और यह निर्णय बहुत सोच समझ कर लें, क्योंकि कई बार लोग आपरेशन कराने के कुछ वर्ष के बाद कहते हैं कि उनसे गलती हो गयी, वह अपना शरीर नहीं बदलना चाहते थे।

यह सच है कि किशोरावस्था में एक बार शरीर का विकास हो जाये तो दवाओं या आपरेशन से कुछ बदलाव लाये जा सकते हैं, लेकिन शरीर को पूरा बदलना आसान नहीं है। अगर यह सब इलाज किशोरावस्था से पहले किये जायें तो शरीर का बदलाव अधिक आसान है। यूरोप के कुछ देशों में ऐसे बच्चों को किशोरावस्था में पहँचने से पहले "प्यूबर्टी ब्लोकर" (puberty-blocker) दवाएँ दी जाती हैं ताकि उनका शरीर बच्चा ही रहे उसमें किशोरावस्था के बदलाव नहीं आयें। फ़िर सोलह या अठारह साल के होने पर वह चाहें तो उन्हें हॉरमोन देने लगते हैं, जिससे लिंग परिवर्तन का प्रारम्भ होता है, लेकिन शल्यचिकित्सा व्यस्क होने के बाद ही होती है। बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि किशोर शरीर के विकास को रोकने वाली दवा नुक्सान करती हैं, उन्हें देना गलत है।

कौन सा निर्णय सही?

तो ऐसे बच्चों को क्या दवा दी जाये या क्या इलाज किया जाये, इस दुविधा में कौन सही और कौन गलत, यह निर्णय आसान नहीं है। कुछ बच्चे लिंग परिवर्तन के निश्चय पर दृढ़ रहते हैं, और व्यस्क होने पर जब शल्यक्रिया के लिए जाते हैं तो कहते हैं कि यह सब किशोरावस्था से पहले होता तो कितना अच्छा होता। कुछ बच्चे बड़े होते होते, बदल जाते हैं और अपने लिंग को स्वीकारते हैं, वह कहते हैं कि अच्छा हुआ कि बचपन में कुछ नहीं करवाया वरना अब पछताते।

कुछ शोधों के अनुसार करीब साठ प्रतिशत बच्चे पंद्रह सोलह साल के होते होते लिंग परिवर्तन का निश्चय बदल लेते हैं, इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें जल्दबाज़ी ठीक नहीं। हालाँकि कुछ लोगों ने इन शोधों की विश्वासनीयता पर प्रश्न उठाये हैं लेकिन उनकी जगह अन्य नये शोध अभी तक नहीं छपे हैं, इसलिए इस विषय पर कुछ अन्य कहना कठिन है।

माता पिता क्या करें?

अगर कोई बच्चा अपने शारीरिक लिंग को गलत महसूस करता है, लड़का हो कर स्वयं को लड़की महसूस करता है, या लड़की हो कर स्वयं को लड़का महसूस करता है, तो उसके माता पिता को क्या करना चाहिये? मेरे विचार में सबसे अधिक आवश्यक है कि आप बच्चे को अपने मन की बातें खुल कर कहने का मौका दें और उसे गलत नहीं कहिये। बच्चे को भरोसा दीजिये कि चाहे कुछ भी हो, वह आप का बच्चा रहेगा और इस बात से आप का प्यार व स्नेह कम नहीं होंगे।

जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाये तो किसी मनोवैज्ञानिक से उसकी बात करवाईये लेकिन उस पर किसी तरह की जबरदस्ती करके उसकी सोच को या पहचान को बदलने की कोशिश नहीं की जानी चाहये। उम्र के साथ कुछ बच्चे बदल जाते हैं और अपने लिंग को स्वीकार कर लेते हैं, कुछ अन्य बड़े होने के बाद भी निर्णय नहीं बदलते। लेकिन यह निर्णय वह स्वयं लेते हैं, आप उन्हें मजबूर नहीं करें कि वह कौन सा निर्णय लें।

अंत में

अंतरलैंगिकता की बहुत सी बहसें हैं और उनके भिन्न पहलु भी हैं, उन सब पर एक ही बार में सब कुछ सोच व कह पाना संभव नहीं है, लेकिन यह आवश्यक है कि यह बहसें केवल अंग्रेज़ी बोलने वालों तक ही नहीं सीमित रहनी चाहिये। भारत में अंतरलैंगिक जनों में अवश्य यह सब विमर्श होते होंगे जिनकी मुझे जानकारी नहीं हो।

Boy or Girl - Image & Art by Sunil Deepak

बड़े हो कर आप का बच्चा कोई भी निर्णय ले, आप का कर्तव्य है कि उसको पढ़ने के और खेलने के सभी मौके मिलें और उसे भरोसा रहे कि आप को उसके सभी निर्णय स्वीकार होंगे। इन बच्चों को विद्यालय में, समाज में, मित्रों के साथ, जीवन में बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। अगर उन्हें घर में परिवार की स्वीकृति और प्यार मिलेगा तो उनके लिए बाकि की वह सब लड़ाईयाँ भी कुछ आसान हो जायेंगी।

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