महामारी की चेतावनी

डा. सुनील दीपक, २७ नवम्बर 2020

टिप्पणीः यह आलेख समाजवादी पत्रिका सामयिक वार्ता के अक्टूबर २०२० अंक में "चेतावनी की तरह है महामारी" शीर्षक से छपा था। उस छपे हुए आलेख में पिछले दो महीनों में इस महामारी से जुड़ी नयी जानकारी को मैंने यहाँ इस आलेख में जोड़ा है।

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प्राचीन काल से मानव इतिहास में महामारियों ने इतिहास का रुख मोड़ने व बदलने में महत्वपूर्ण भाग निभाया है। पिछले सौ वर्षों में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ लगने लगा था कि शायद हम विश्व भर में फ़ैलने वाली महामारियों पर विजय पाने में सफ़ल हो गये हैं। इस वर्ष की कोविड-१९ की महामारी, जो चीन में वुहान शहर से निकली और थोड़े समय में ही सारे विश्व में फ़ैल गयी, ने ऐसी सभी आशाओं के सामने प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिये हैं। यही नहीं, महामारी ने पिछले कुछ दशकों के निर्न्कुश वैश्वीकरण के भविष्य के बारे में सन्देह बढ़ाये हैं।

Covid19 graphic

ऐसा नहीं कि पिछले दशकों में महामारियाँ नहीं हो रहीं थीं, लेकिन कोविड-१९ का सामान्य जीवन पर जो प्रभाव पड़ा है, वह उन सबसे भिन्न है। अंतरिक्ष यात्रा में जाने वाले लोग जैसे वस्त्र पहनते हैं, वैसे वस्त्र पहने हुए स्वास्थ्य कर्मचारियों से घिरे गहन चिकित्सा केन्द्रों में महामारी से मरने वालों को अपने अंतिम समय में परिवार का सामिप्य नहीं मिलता और वैसे ही अकेले में उनकी अंतिम क्रिया की जाती है। शहरों की तालाबन्दी से लाखों प्रवासी मज़दूर अपने गाँवों की ओर कई सौ किलोमीटर के रास्ते पैदल ही पार करते हैं। छुटमुटा काम से जीवन यापन करने वाले, बिना काम के कैसे खाना खायेंगे, उनकी अपनी चिन्ताएँ हैं। विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ने वाले छात्रों को पढ़ने के लिए इंटरनेट की तकनीकी का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उन सब गरीब छात्रों की समस्या उभरी है, जिनके पास इस तकनीकी के साधन नहीं हैं। इन सब विपदाओं के बीच में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिनका महामारी में विश्वास नहीं, जो कहते हैं कि यह सब बड़ी कम्पनियों के द्वारा रचा एक षडयंत्र है।

इस आलेख में महामारियाँ क्या होती हैं, क्यों और कैसे फ़ैलती हैं, और उनका क्या निदान हो सकता है, इसकी चर्चा है। साथ ही इसमें भारत की आजकल की कोविड १९ की स्थिति का कुछ विवरण भी है।

इससे पहले की महामारियाँ

इतिहास में हर चार-पाँच वर्षों में विश्व के किसी न किसी कोने में कोई न कोई महामारी उठती ही रही है, लेकिन वह सब बीमारियाँ कुछ देशों में सीमित रही थीं। इसका एक ताज़ा उदाहरण है ईबोला वायरस (Ebola) की बीमारी जो कि सन् २०१४ की गर्मियों में उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में गिनी कोनक्री में उभरी और थोड़े समय में पास के देशों में (सिएरा लिओन, लाईबेरिया, सेनेगल, नाईजीरिया और माली) फ़ैल गयी। इस बीमारी से सँक्रमित लोगों में से करीब पचास प्रतिशत की मृत्य हो रही थी। यह रोग बीमार व्यक्तियों के रक्त, वीर्य तथा थूक से फ़ैलता है, साँस के द्वारा नहीं फ़ैलता, इसलिए इसे रोकना उतना कठिन नहीं था, फ़िर भी उसे पूरी तरह से रोकने में करीब दो वर्ष लगे। इस महामारी का उन देशों में, जहाँ रोगियों की संख्या अधिक थी, उनके आर्थिक व सामाजिक जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। जैसे कि लाईबेरिया में सन् २०१३ में वार्षिक आर्थिक विकास दर (GDP) आठ प्रतिशत से अधिक थी, जोकि २०१५ में शन्य से भी नीचे चली गयी और आज, महामारी के समाप्त होने के चार वर्ष के बाद भी, अभी तक पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई है। पिछले दो दशकों में ईबोला की महामारी अफ्रीका में पहले भी कई बार हो चुकी थी, फ़िर भी इसे रोकने वाली पहली वेक्सीन को बनने में समय लगा। २०१९ में वह वेक्सीन बनी।

जब इस तरह की कुछ देशों में सीमित रहने वाली महामारियाँ उभरती हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम करनी वाली संस्थाएँ तुरंत उसे रोकने में सक्रिय हो जाती हैं, और बाकी के देशों में उसका असर नहीं महसूस होता। ऐसी महामारी जो सारे विश्व भर में फ़ैली हो, यह अंतिम बार १९८० के दशक में एडस् (AIDS) की बीमारी के साथ हुआ था। ईबोला की तरह, एडस् का रोग भी रक्त, वीर्य तथा थूक से फ़ैलता है और अब तक इससे तीन करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं। चूँकि यह बीमारी साँस से नहीं फ़ैलती, इसलिए यह जन सामान्य में नहीं फ़ैली। अभी तक इसके निवारण के लिए वेक्सीन नहीं खोजी जा सकी, लेकिन इसकी चिकित्सा के लिए दवाईयाँ सारे विश्व में उपलब्ध हैं इसलिए अब इसका भय भी कम हो गया है।

जो रोग साँस के रास्ते से फ़ैलते हैं, उनको रोकना अधिक कठिन है। इसीलिए, हर वर्ष सर्दियों में फ्लू की बीमारी फ़ैलती है, जिससे सारा विश्व प्रभावित होता है। लेकिन सामान्य फ्लू अधिक गम्भीर रोग नहीं है, कुछ दिनों के बुखार के बाद ठीक हो जाता है, इसलिए इसे महामारी नहीं कहते। फ्लू भी एक वायरस से होता है, जोकि हर कुछ महीनों में बदलता रहता है, इसलिए इसके निवारण के लिए हर वर्ष नयी वेक्सीन बनायी जाती है। हर वर्ष यह खतरा होता है कि वायरस की घातकता में बदलाव आने से, फ्लू रोग बिगड़ कर जानलेवा न हो जाये, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएँ इसके वायरस में आये बदलावों की लगातार निगरानी करती हैं।

अंतिम बार जानलेवा फ्लू करीब सौ वर्ष पहले, प्रथम विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में १९१८ में फ़ैला था। यह महामारी वाला फ्लू करीब चार वर्षों तक चला था और सारे विश्व में करीब पचास करोड़ लोग इससे संक्रमित हुए थे, जिनमें से करीब ढाई करोड़ रोगियों की मृत्यु हो गई थी। इसे "स्पेनिश फ्लू की महामारी" के नाम से जाना जाता है। उस समय वेक्सीन बनाने की तकनीकी का विकास नहीं हुआ था और इसके संक्रमण से बचने के लिए वही किया गया था जैसे कि आज कोविड-१९ से बचने के लिए किया जा रहा है, यानि चेहरे को मास्क से ढकना, घर से न निकलना, और रोगियों को उनके परिवारों तथा जनसमान्य से अलग रखना। सौ वर्ष पहले एक देश से दूसरे देश जाना इतना आसान नहीं था, लेकिन स्टीम जहाज़ और युद्ध में सिपाही एक देश से दूसरे देश जा रहे थे, जिनसे बीमारी फ़ैली। सौ वर्ष पहले की उस फ्लू महामारी के मुकाबले में इस वर्ष की कोविड-१९ की बीमारी को फ़ैलाने में हवाई जहाज़ से यात्रा करने वालों की वजह से अपेक्षाकृत बहुत कम समय लगा।

संक्रामक रोग क्यों होते हैं?

मानव संक्रामक रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फ़ैलते हैं। कुछ रोग हैं जो पशुओं में छुपे रहते हैं और बीच बीच में मानव समुदायों में आ जाते हैं। संक्रामक रोगों को फ़ैलने के लिए मानव गुटों के बीच सम्पर्क चाहिये। कृषि की खोज से पहले, हज़ारों वर्षों तक मानव समाज छोटे छोटे गुटों में बँटा था, जोकि शिकार तथा जँगली कन्द मूल पर जीवित रहते थे। उस समय संक्रामक रोगों का फ़ैलना कठिन था। कृषि के साथ साथ मानवता ने पशुओं को पालतु बनाना भी सीखा, और मानव गुट उन पशुओं के समीप समय बिताने लगे। सोचा जाता है कि पहली संक्रामक बीमारियाँ इसी संदर्भ में उभरीं व फ़ैली।

डार्विन (Darwin) के सिद्धांत के अनुसार, बदलते समय और बदलते वातावरण के साथ सभी जीव भी बदलते रहते हैं। कुछ जीव जातियाँ नये वातावरण में बढ़ती और पनपती हैं,अन्य जीव जातियाँ उस वातावरण में लुप्त हो जाती हैं। संक्रामक रोग भी उस बदलते वातावरण का हिस्सा होते हैं। जब कोई नया संक्रामक रोग उभरता है तो प्रारम्भ में मानव शरीर में उससे लड़ने की शक्ति नहीं होती और उस पहले रोग-आक्रमण में कुछ लोग मर जाते हैं, लेकिन जो बचते हैं, उनमें उस रोग से लड़ने की शक्ति आ जाती है।

इस तरह से जो पहले शहर बने, वहाँ नये रोग उठे और धीरे धीरे, उन शहरों और भूमि खँडों में रहने वाले मानव गुटों में उन रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ी। इन शहरों के रहने वाले जब दुनियाँ में नये क्षेत्रों की खोज में निकले तो वह अपनी बीमारियाँ भी अपने साथ ले कर गये। जब उनकी मुलाकात वहाँ पर पहले से रहने वाले ऐसे मानव समूहों से हुई जो कि शिकार और कन्द-मूल पर ही जीवन बिता रहे थे और छोटे छोटे गुटों में रहते थे, उनमें यह नयी बीमारियाँ फ़ैलायीं जो उनके लिए बहुत घातक हुईं क्योंकि उनमें इन रोगों से लड़ने की शक्ति नहीं थी। सोलहवीं-सतरहवीं शताब्दी में यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों के अमरीका और आस्ट्रेलिया महाद्वीपों पर विजय पाने में इन रोगों का बहुत बड़ा हाथ था। अमरीका के प्रो. जेरोड डायमँड ने इस विषय में शोध किया है, उनके अनुसार जब स्पेन के जहाज़, भारत को खोजते हुए, केरेबियन क्षेत्र और अमरीकी महाद्वीप में पँहुचे तो वहाँ के मूल निवासियों की लगभग ९५ प्रतिशत जनसंख्या इन्हीं रोगों की वजह से नष्ट हो गयी।

बीसवीं शताब्दी की बीमारियों में बदलाव

अठाहरवीं शताब्दी में हॉलैंड में लिवनहोक ने माईक्रोस्कोप का आविष्कार किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्थ में फ्राँस में लूई पॉस्तोर ने वातावरण में रहने वाले, आँखों से न दिखने वाले, बीमारी फ़ैलाने वाले सूक्ष्म किटाणुओं की परिकल्पना की। ईंग्लैंड में जोसफ लिस्टर ने उसी से प्रभावित हो कर शल्य चिकित्सा में स्वच्छ औज़ारों के प्रयोग और सफ़ाई की बात कही। नोरवे में कुष्ठ रोगी के शरीर में कुष्ठ रोग फ़ैलाने वाले किटाणुओं को माईक्रोस्कोप में देख कर सिद्ध कर दिया कि उन्हीं किटाणुओं से कुष्ठ रोग होता था। उसके बाद से एक के बाद एक संक्रामक बिमारी के किटाणु को पहचाना गया। पॉस्तोर ने ही पश्चिमी देशों में पहली बार शरीर की किटाणुओं से लड़ने के लिए मरे हुए किटाणुओं से वेक्सीन बनाने का प्रयोग किये।

आयर्वेद में किटाणुओं से होने वाली बीमारियों की बात नहीं थी, लेकिन चेचक की महामारी को फ़ैलने से रोकने के लिए बीमार रोगियों की पस के अंश से स्वस्थ्य लोगों को टीका लगाने का इलाज था जिसे पश्चिम में "वेरिओलेशन" (variolation) का नाम दिया गया था। रोग रोकने की भारत की इस परम्परा का समाचार १७२१ में मेरी वोर्टली मोन्टागू नाम की महिला की एक रिपोर्ट के माध्यम से यूरोप पहुँचा था। पॉस्तोर की वेक्सीन की खोज में भारत के इस प्राचीन ज्ञान ने क्या भाग निभाया आज यह कहना कठिन है।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्रथम विश्व महायुद्ध के दौरान फ्लेमिन्ग ने पैन्सिलिन की खोज की और दिखाया कि इससे बीमारी फ़ैलाने वाले किटाणु मर जाते हैं। द्वितीय विश्व महायुद्ध के बाद से माईक्रोस्कोप से दिखने वाले सूक्ष्म किटाणुओं की पहचान और उनको मारने वाली दवाओं की खोज में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई। इन दवाओं को एन्टीबॉयटिक कहा गया। कुष्ठ रोग, टाईफाईड, हैजा, क्षय रोग, मलेरिया जैसी बीमारियों का इलाज करने के लिए एन्टीबॉयटिक दवाओं की खोज हुई। दवाओं के साथ साथ, शौचालय बनवाने, स्वच्छ जल पीने और हाथ धोने जैसी सुविधाओं को सभी नागरिकों तक पहुँचाने के महत्व को समझा गया, जिनसे बीमारियाँ कम हुईं और लोगों की औसत अपेक्षित आयु में वृद्धि आयी। उदाहरण के लिए, १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ था, उस समय भारत में औसत अपेक्षित आयु केवल ३१ वर्ष थी, आज यह उससे दुगने से भी अधिक है।

महामारियों पर नियंत्रण

पिछले दशकों में बहुत सी महामारियों पर काबू किया गया। वेक्सीनों की सहायता से चेचक, पोलियो, खसरा, और काली खाँसी करीब करीब लुप्त ही हो गयीं। विभिन्न एन्टीबॉयटिक के प्रयोग से हैजा, प्लेग, डिसेन्ट्री जैसी बीमारियों का उपचार होने लगा। सोचा जाने लगा कि मानवता इन सब बीमारियों पर जल्दी ही विजय प्राप्त कर लेगी।

लेकिन मानव तथा रोगों की इस लड़ाई में तीन बाधाएँ आयीं हैं -

१. एन्टीबॉयटिक का उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया, जहाँ आवश्यकता नहीं होती थी, वहाँ भी इनको दिया जाने लगा। बहुत से लोग एन्टीबॉयटिक से इलाज शुरु तो कर लेते थे, लेकिन दो दिन ले कर उसे अधूरा छोड़ देते थे, या दवा बदल लेते थे। साथ ही, पशु पक्षियों को भी एन्टीबॉयटिक दिये जाने लगे। जैसे कि गाय का दूध बढ़ाने के लिए और ब्रायलर चिकन को जल्दी मोटा करने के लिए एन्टीबॉयटिक दिये जाते हैं, और दूध व माँस के साथ यह एँटीबायेटिक वापस मानव शरीर में आ जाते हैं। इस सब की वजह से किटाणुओं को बदलने का मौका मिल गया है और उन पर एन्टीबॉयटिक का असर होना बन्द होने लगा है।

२. दूसरी बात है कि बीमारियाँ कराने वाले सूक्ष्म किटाणु जीव कई तरह के होते हैं, जिनमें दो प्रमुख प्रकार हैं बैक्टीरया और वायरस। हमारे एन्टीबॉयटिक केवल बैक्टीरिया को मार सकते हैं, इनका असर वायरस पर नहीं होता। पिछले २५ सालों में एडस् की बीमारी के इलाज के लिए वायरस को रोकने वाली कुछ दवाएँ खोजी गयीं हैं, लेकिन अभी हम वायरस से फ़ैलने वाली बीमारियों के उपचार में उतने सक्षम नहीं हुए हैं। इन्हें रोकने का एक ही रामबाण इलाज है कि वायरस के विरुद्ध वेक्सीन बनायी जाये। चेचक और पोलियो जैसी बीमारियाँ भी वायरस से होती हैं और इन्हें रोकने के लिए सक्षम वेक्सीन हैं। एडस् की बीमारी भी वायरस से होती है, लेकिन पिछले तीस सालों की विभिन्न कोशिशों के बावजूद अभी तक इसे रोकने वाली कारगर वेक्सीन नहीं बन पायी है।

इसी तरह से कोविड-१९ को रोकने के लिए वेक्सीन को खोजने के प्रयास सारे विश्व में हो रहे हैं, इनमें कितनी सफलता मिलेगी यह तो भविष्य ही बतायेगा, हालाँकि कुछ प्रारम्भिक परिणामों ने इसकी आशा जगायी है कि अगले वर्ष के प्रारम्भ से दो या तीन तरह की वैक्सीन उपलब्ध होने लगेंगीं।

३. तीसरी बात है कि औसत जीवन के लम्बा होने से शरीर के भीतरी चलन से जुड़े अंगों, पाच्य तंत्र, मस्तिष्क तंत्र, जोड़ तथा माँस पेशियों आदि के काम से जुड़ी नयी बीमारियाँ अधिक होने लगी हैं जिनमें कैंसर, मधुमेह, गठिया, हृद्य रोग, अधिक रक्तचाप, जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, जो संक्रामक बीमारियाँ नहीं हैं और जिनका उपचार आसान नहीं है। एक बार यह बीमारियाँ हो जायें तो अधिकतर लोगों को सारा जीवन इनके साथ जीना और लगातार दवा खाना पड़ता है। इसे क्रोनिक यानि आजीवन रोगों की महामारी कहा गया है। इन बीमारियों के साथ ठीक से जीने के लिए केवल दवाओं व डॉक्टरों से काम नहीं चलता, आप को स्वयं अपनी बीमारी के बारे में समझना पड़ता है और आवश्यकता पड़ने पर अपनी जीवन शैली में अनुकूल बदलाव लाने की ज़िम्मेदारी आप की ही होती है।

कोविड-१९ की महामारी

बीमारी फैलाने वाले वायरस कई तरह के होते हैं, जिनमें से एक कोरोना वायरस है, जिनसे खाँसी,ज़ुकाम, फ्लू, निमोनिया जैसी बीमारियाँ होती हैं। कोविड-१९, जिसकी महामारी इस वर्ष २०२० में फ़ैली है, एक कोरोना वायरस ही है, जोकि आम तौर पर चमगादड़ों में पाये जाते हैं। यह रोग कब चमगादड़ों से इन्सानों में आया, यह पक्का नहीं कहा जा सकता। एक नये रोग के पहले समाचार चीन के वूहान राज्य के हूबेई शहर से अक्टूबर २०१९ में आये। दिसम्बर २०१९ में थाईलैंड की एक वैज्ञानिक ने इस रोग के वायरस के बारे में पहली जानकारी दी। ३० जनवरी २०२० को विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने इस रोग के बारे में खतरे की घँटी बजायी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और वायरस तब तक चीन से आने वाले हवाई जहाज़ों के साथ बाकी विश्व की यात्रा पर निकल चुका था। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने चीनी सरकार के दबाव में आ कर महामारी को रोकने के लिए सही समय पर कदम नहीं उठाये जिससे यह महामारी चीन से निकल कर बाकी विश्व में फ़ैली।

शुरु के दिनों में इस रोग की पूरी जानकारी किसी को नहीं थी और न ही यह समझ में आया था कि इसका उपचार कैसे किया जाये। इसका सबसे चिंताजनक लक्षण साँस की तकलीफ़ है जो निमोनिया की तरह फेफड़ों को जकड़ लेती है और इसके बाद रोगी का बचना कठिन होता है, विषेशकर जब रोगी वृद्ध व्यक्ति हो या उनको अन्य क्रोनिक बीमारियाँ हों। रोग के विश्वव्यापी महामारी बनने के आठ-नौ महीनों में, रोग के बारे में हमारी जानकारी बढ़ी है।

यह समझ में आया है कि केवल कुछ प्रतिशत लोग, रोग होने के बाद एक या दो दिनों के लिए इस वायरस को वातावरण में अधिक मात्रा में छोड़ते हैं और रोग को अधिक लोगों में फैलाते हैं। करीब सत्तर प्रतिशत रोगी, इसको अपने शरीर में ही रोक लेते हैं, इसे फैलाते नहीं। वैज्ञानिक ऐसे टेस्ट की खोज कर रहे हैं जिससे यह पता चल सके कि कौन से व्यक्तियों में रोग का संक्रमण करने का खतरा है।

यह भी समझ में आया है कि यह रोग केवल फेफड़ों को प्रभावित नहीं करता, इससे साँस की तकलीफ़ के अतिरिक्त, कुछ रोगियों को शरीर के अन्य भागों, जैसे हृदय व गुर्दे, में भी तकलीफ़ हो सकती है।

प्रारम्भ में लगता था कि जिनकी हालत बिगड़ जाती है, उनको बचाने का कोई साधन नहीं, जिससे बीमारी के प्रति बहुत भय फैला था। समय के साथ, इसके इलाज में भी सुधार हुए हैं, और जिनकी हालत बहुत बिगड़ जाती है, उनमें से भी अब तीस प्रतिशत से अधिक लोगों को बचा लिया जाता है।

कोविड-१९ को रोकने के लिए वेक्सीनों की खोज पूरे विश्व में जोर शोर से चल रही है। अमरीका की दो कम्पनियों ने दिखाया है कि उनकी वैक्सीन से इस रोग में नब्बे प्रतिशत से अधिक सुरक्षा मिलेगी, जबकि ईंग्लैंड की एक कम्पनी की वैक्सीन के परिणाम भी अच्छे हैं। चीन और रूस ने एलान कर दिया है कि उन्होंने रोग रोकने वाली वैक्सीनें खोजी हैं लेकिन क्योंकि उनके वैक्सीन-शोध की खुली जानकारी नहीं दी जा रही, उनके बारे में कुछ संशय हैं। आशा है कि जनवरी में वैक्सीन उपलब्ध होना शुरु होजायेगी, हालाँकि उसे सारी दुनिया के लोगों तक पँहुचाने में कम से कम एक वर्ष लगेगा। लेकिन वेक्सीनों के उपयोगों के कई महीनों के बाद ही वैज्ञानिक बता सकेंगे कि उससे बीमारी का संक्रमण सचमुच रुका या नहीं, कितने प्रतिशत लोगों में वह असरदार है और उसके शरीर पर कोई दुष्प्रभाव तो नहीं, आदि। यह सब जानकारी जल्दबाजी में नहीं मिलती।

भारत में कोविड-१९ का असर

३० जनवरी २०२० को जिस दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-१९ के खतरे की घँटी बजायी, उसी दिन भारत में इसका पहला रोगी भी पाया गया। प्रारम्भ में रोग धीरे से बढ़ा। साढ़े तीन महीने बाद, १९ मई को, कुल सँक्रमित व्यक्तियों की संख्या बढ़ कर एक लाख हो चुकी थी। गत ३० सितम्बर को कुल संक्रमित रोगियों की संख्या ९ लाख ३८ हज़ार से कुछ अधिक थी।

अब तक (२६ नवम्बर २०२० तक) भारत में लगभग ९३ लाख व्यक्तियों को यह रोग हो चुका है, तथा उनमें से एक लाख पैंतीस हज़ार व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है। यानि भारत में करीब १.५ प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हुई है।

पूरे विश्व में अब तक करीब छः करोड़ लोगों को यह रोग हो चुका है, तथा उनमें से करीब चौदह लाख सैंतीस हज़ार व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। यानि विश्व स्तर पर करीब २.३ प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हुई है। विभिन्न भूखँडों में रोग से मत्यु होने की दरों में बहुत अंतर हैं। उदाहरण के लिए अक्टूबर के प्रारम्भ में यूरोप में कोविड-१९ की मृत्यु दर ३.९ प्रतिशत थी, जबकि अफ्रीका में यह २.२ प्रतिशत थी।

इस तरह से देखा जाये तो लगता है कि भारत में यह रोग कम घातक हो रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत में इससे पहले कई बार कोरोना वायरस की बीमारियाँ होती रहीं हैं, जिनसे भारत में बहुत से लोगों के शरीरों में इस रोग से लड़ने की शक्ति विकसित थी, इसलिए यह भारत में कम घातक है। कुछ अन्य कहते हैं कि भारत में बहुत से लोगों में रोग है लकिन उनके टेस्ट ही नहीं किये जा रहे हैं। साथ में यह भी कहा गया है कि बहुत से कोविड-१९ से मरने वाले लोग अस्पतालों के बाहर गाँवों व घरों में मर रहे हैं जिनकी गिनती नहीं हो रही, जिससे लगता है कि भारत में यह रोग कम घातक है।

विश्व के विभिन्न भागों से आने वाले आँकणे दिखा रहे हैं कि कोविड-१९ की घातकता सारे विश्व में कम हो रही है। प्रारम्भ में यह करीब ५ प्रतिशत थी, मई में ७ प्रतिशत पहुँच गयी थी और अब करीब २.३ प्रतिशत है। भारत में भी अप्रैल से जून की बीच में यह रोग अधिक घातक था, जब मृत्यु दर करीब ३.५ प्रतिशत पहुँच गयी थी, उसके बाद से मृत्यु दर में निरंतर गिराव आ रहा है।

विभिन्न राज्यों में इसकी स्थिति बहुत भिन्न है। अक्टूबर के प्रारम्भ में पिछले तीन महीनों के एकत्रित आँकणों को देखा जाये तो पंजाब, छत्तीसगढ़, असम और उत्तराखँड की स्थिति बाकी राज्यों के अनुपात में अधिक गम्भीर लगी है, हालाँकि इनमें प्रतिदिन के नये रोगियों की संख्या उतनी अधिक नहीं है लेकिन रोगी निरंतर बढ़ रहे हैं।

कुल संक्रमित रोगियों की संख्या को देखा जाये, तो सितम्बर मास के अंत में सबसे गम्भीर स्थिति महाराष्ट्र तथा कर्णाटक की थी और दूसरे स्थान पर थे केरल, तमिलनाडू, आँध्रप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश। अन्य राज्यों के मुकाबले, बिहार में स्थिति बहुत बेहतर है, साथ ही नये दैनिक रोगियों की संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। आज नवम्बर के चौथे सप्ताह के प्रारम्भ में अन्य राज्यों के मुकाबले में महाराष्ट्र, केरल और दिल्ली में इस महामारी की स्थिति सबसे अधिक गम्भीर है।

बहुत से लोग कह रहे हैं कि भारत कुल रोगियों की संख्या और रोग से मरने वालों की संख्या में विश्व में दूसरे स्थान पर है, और स्थिति बहुत बिगड़ रही है। लेकिन कुल जनसंख्या के अनुपात में देखा जाये तो भारत की स्थिति उतनी बुरी नहीं है। उदाहरण के लिए स्पेन की जनसंख्या ४.६ करोड़ है, अब तक वहाँ करीब ७.७ लाख रोगी हुए हैं और करीब ३१ हज़ार रोगियों की मृत्यु हुई है। अगर भारत में स्पेन जैसी बीमारी होती तो अब तक २ करोड़ से अधिक रोगी होते और करीब ८.६ लाख रोगियों की मृत्यु हुई होती।

सितम्बर के अंत में मुम्बई में हुए नये सीरो-सर्वे में शहर के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के रक्त की जाँच की गयी। इसके अनुसार झोपड़पट्टी वाले क्षेत्रों में रहने वाले ५७ प्रतिशत लोगों के रक्त में कोविड-१९ रोग की एँटीबॉडी पायी गयीं, यानि इस रोग के किटाणु उनके शरीर में जा चुके हैं और अब उन्हें इस बीमारी का दोबारा होने की सम्भावना बहुत कम है। मध्यम और उच्च वर्ग के रहने वाले क्षेत्रों में यह एँटीबोडी केवल १८ प्रतिशत लोगों में पायी गयी।

ऐसा ही एक सीरो-सर्वे कुछ सप्ताह पहले दिल्ली में हुआ था जिसके अनुसार ३३ प्रतिशत दिल्लीवासियोंके रक्त में यह एन्टीबॉडी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा सर्वे अगस्त में किया गया था जिसके अनुसार भारत की ७ प्रतिशत जनसंख्या में यह एन्टीबॉडी पायी गयी थी। इसका अर्थ है कि अगले महीने में बीमारी धीरे धीरे बड़े शहरों में कम होगी और छोटे शहरों की ओर बढ़ेगी।

आगे क्या होगा

मुँह, गले और फेफड़ों में फैलने वाली बीमारियाँ सर्दियों में अधिक फैलती हैं, क्योंकि हम लोग सर्दी से बचने के लिए दरवाज़े खिड़कियाँ बन्द कर लेते हैं जिससे बन्द जगहों में किटाणुओं को एक व्यक्ति से दूसरे तक जाने में आसानी हो जाती है। शीत ऋतु में शरीर की रोगों से लड़ने की स्वाभाविक शक्ति भी कम हो जाती है। इसलिए विषेशज्ञों को डर है कि आने वाले महीनों में यह रोग अधिक तेज़ी से फ़ैलेगा, जिसे "कोविड-१९ रोग की दूसरी लहर" का नाम दिया जा रहा है।

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बहुत से लोग वेक्सीन के आने की प्रतीक्षा में हैं। वृद्ध तथा अन्य बीमारियों से कमज़ोर व्यक्तियों को सलाह दी जा रही कि वह फ्लू की नयी वेक्सीन जो इन्हीं दिनों में बाज़ार में आ रही है, उसे अवश्य लगवायें, क्योंकि उससे उनकी रोग से लड़ने की शक्ति में कुछ बढ़ाव होगा। साथ ही विषेशज्ञों का कहना है कि स्थिति अगले वर्ष मार्च या मई से पहले नहीं सुधरेगी।

इस महामारी का सामान्य जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। अगर आर्थिक बजट की दृष्टि से देखा जाये तो भारत में और बहुत से विकासशील देशों में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा था। पिछले दो दशकों में पूरे विश्व में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को कटोती कर के निजी स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा दिया जा रहा था, क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं को आमदनी के तराजू पर तौल कर केवल खर्च के रूप में देखा जा रहा था। इस महामारी ने उन सब देशों को आईना दिखाया है और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के महत्व की समझ दी है। महामारी बीतने के बाद, इसका पाठ कितनी सरकारें याद रखेंगी और अपनी स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव लायेगी, यह कहना कठिन है।

जब इस महामारी के फ़ैलने के पहले समाचार आये थे, तो कई देशों में प्रमुख नेताओं ने कहा था कि महामारी के खतरे की बातें अतिश्योक्ति थीं, लोगों को डराने के लिए वैज्ञानिक उन्हें बढ़ा चढ़ा कर बता रहे थे। उनमें से कुछ ने तालाबन्दी करने, मास्क पहनने आदि से इन्कार कर दिया था। इनमें ईंग्लैंड के प्रधान मंत्री बोरिस जॉह्नसन, ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोसोनारो और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प थे। उन तीनों को महामारी ने अपने चँगुल में ले कर अपने खतरे की चेतावनी दे दी थी। शायद इससे सभी देशों के नेताओं को समझ मिली हो कि देश की स्वास्थ्य सेवाओं का निजिकरण उचित रास्ता नहीं है।

कुछ वर्ष पहले ईज़राईली इतिहासकार व दर्शनशास्त्री यूवाल नोह हरारी ने एक किताब लिखी थी "सेपिएन्स" (Sapiens), यानि आधुनिक मानव। उनका कहना था कि मानव इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि विश्व में सड़कों पर एक्सीडैंट से मरने वालों की संख्या युद्धों-लड़ाईयों में मरने वालों से कई गुना अधिक थी और मोटापे से जुड़ी बीमारियों से मरने वालों की संख्या भूख से मरने वालों से कई गुना अधिक थी। उन्होंने भविष्य में आने वाले बदलावों में कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence - AI) का तकनीकी विकास और रोबोट आदि की सहायता से होने वाले स्वचलित मशीनों के विकास की बात की थी। उनके विचार में उद्योगिक क्राँति से जिस तरह सारे विश्व के सभी समाजों को बदलना पड़ा था, उसी तरह से कृत्रिम बुद्धि और स्वचलित मशीनों की एक नयी क्राँति होने वाली है, जोकि मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी और जिसके लिए मानवता को तैयार करना है।

ऐसे तकनीकी भविष्य की बातों के बीच में कोविड-१९ जैसी महामारी का आना जैसे प्रकृति का मानवता को यह याद दिलाना है कि जिस अतीत को हम सोचते हैं कि बहुत पीछे छोड़ आये हैं, वह पीछे नहीं है, यहीं किनारे पर वह ताक लगा कर खड़ा है कि कब मानवता कमज़ोर होगी या गलत कदम उठायेगी, और वह अतीत महामारी बन कर या कोई प्राकृतिक विपदा बन कर फ़िर से लौट आयेगा।

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