राख में दबे अँगारे

डा. सुनील दीपक, 28 अगस्त 2020

कुछ दिन पहले नेटफ्लिक्स (Netflix) पर एक डाक्यूमैंटरी फ़िल्म देखी "राइज़िन्ग फीनिक्स" (Rising Phoenix) जो कि पैराओलिम्पक अंतर्राष्ट्रीय खेलों और उनमें भाग लेने वाले विकलाँग खिलाड़ियों के जीवन पर बनी है। इस फ़िल्म ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कहने को तो यह डाक्यूमैंटरी फ़िल्म है, लेकिन उसकी कहानी के उतार चढ़ाव किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं हैं।

मार्क क्विन द्वारा बनायी एलिसन लेप्पर की मूर्ति - Image by Sunil Deepak

जब उसे देखना शुरु किया तो सोचा था कि उस दिन समय कम था इसलिए उसे थोड़ा सा देखूँगा और अगर अच्छी लगेगी तो किसी और दिन फुरसत से उसे पूरा देखा जायेगा। लेकिन एक बार फ़िल्म शुरु हुई तो उसे बीच में मुझसे छोड़ा नहीं गया, पूरी देख कर ही रुका। यह आलेख उसी फ़िल्म के बारे में है।

फीनिक्स के मिथक का महत्व

फीनिक्स पक्षी की कहानी पुराने फोनेशियन लोगों की मिथक कथा है जो कि प्राचीन यूरोप में रहते थे। समय के साथ यह कहानी ग्रीक लोककथाओं का हिस्सा बन गयी। फीनिक्स एक आग का पक्षी है जो मरता नहीं। वह आग में जल कर भस्म हो जाता है और फ़िर उसी राख में छुपे अँगारों से नया जन्म लेता है।

फीनिक्स की तरह से इस फ़िल्म के खिलाड़ी भी दुर्घटना या बीमारी से शरीर का एक हिस्सा खो देते हैं, विकलाँग हो जाते हैं। अधिकतर समाजों में प्रचलित सोच है कि विकलाँग होने से आप का जीवन बेकार हो गया, आप कुछ करने के लायक नहीं रहते। इस कहानी के खिलाड़ी नायक भी पहले यही सोचते हैं कि उनका जीवन समाप्त हो गया, अब वे कुछ नहीं कर पायेंगे।

राख के अंगारों में उनका नया जन्म सबसे पहले उनकी मानसिक चेतना के बदलाव की कहानी है जिसमें उनमें अपने जीवन को जीने के लिए लड़ने की भावना का जागरण होता है। फ़िर पैराओलिमप्क खेलों में हिस्सा लेने की इच्छा उन्हें रास्ता दिखाती है कि कैसे स्पर्धा में जीतने के लिए अपने शरीर का विकास किया जाये और कैसे तकनीकी साधनों की सहायता से शरीर की कमी को पूरा किया जाये। मानसिक बल, इच्छा शक्ति, शरीर का विकास और तकनीकी योग, सबके मिलने से ही पैराओलिम्पिक खेलों के चैम्पियन बनते हैं।

राइज़िंग फीनिक्स फ़िल्म

फ़िल्म के निर्देशक हैं इअन बोनहोट (IAN Bonhot) और पीटर एटेडगुई (Peter Ettedgui) और फ़िल्म की अवधि करीब 105 मिनट की है। इसमें एक ओर पैराओलिम्पिक खेलों का इतिहास है जो हिटलर की जर्मनी से ईंग्लैंड भागे हुए एक यहूदी डॉक्टर (Ludwig Guttman) के साथ 1948 में शुरु होता है और फ़िर, 1960 में रोम में पहले पैराओलिम्पिक खेलों से हो कर, बेजिंग (2008), लँदन (2012) और रिओ दी जेनेरो (2016) से गुज़रता है।

दूसरी ओर फ़िल्म में विभिन्न देशों के विकलाँग खिलाड़ियों की कहानियाँ हैं जिनमें इटली की बेबे विओ, आस्ट्रेलिया की एली कोल और राइली बाट, बुरुँडी मूल के फ्राँस के रहने वाले जाँ बाप्तिस्त, ईंग्लैंड के जॉनी पीकॉक आदि हैं। किसी के हाथ नहीं हैं, किसी के पैर नहीं है। हर एक की अपनी कहानी है - कोई दँगों में विकलाँग हुआ, कोई बीमारी से, तो कोई पैदाईश से विकलाँग था। सबकी कहानी में हताशा और निराशा के क्षण हैं और साथ ही, दुनिया से लड़ कर कुछ कर दिखाने की प्रबल इच्छा शक्ति भी है।

खिलाड़ियों की इन कहानियों यह स्पष्ट है कि खेलों में हिस्सा लेने और सभी रुकावटों से लड़ने में सबसे पहला कदम एक मानिसक बदलाव का है, उस पल का है जब यह व्यक्ति और उनके परिवार वाले या साथी कहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये, मैं लड़ूँगा, कोई मुझे रोक नहीं सकता। उस मानसिक बदलाव के बिना कुछ नहीं हो सकता और एक बार वह मानसिक बदलाव हो जाता है तो व्यक्ति लड़ने के अन्य साधन खोजता है।

बहुत सारी कहानियों में इन खिलाड़ियों के बचपन की बातें भी हैं, कि उन्होंने किन समस्याओं का सामना किया, किसने उन्हें प्रोत्साहन दिया और कौन रुकावट बना। रुकावटों से लड़ने की बातें भी हैं, और छोटे खेलों में हिस्सा ले कर धीरे धीरे ऊँचे स्तर पर खेलने की यात्रा की बातें भी हैं। फ़िल्म देखते देखते मालूम ही नहीं चलता कब उनकी मानवता के सामने उनकी विकलाँगता छोटी लगने लगती है। फ़िल्म में बहुत से भावनात्मक क्षण हैं जो आप की आँखों को नम कर देंगे और जब उनकी प्रतियोगिता में भाग लेने का समय आयेगा, आप का दिल भी भीतर भीतर से चिल्लायेगा कि रुको मत, कोशिश करो, जान लगा दो, हिम्मत मत हारो। दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी की कहानी के साथ उनके पालतू बाघ की कहानी है जिसके दृश्य बहुत रोमाँचक हैं।

विकलाँगता और तकनीकी

फ़िल्म की लगभग सभी कहानियाँ और व्यक्तित्व विकसित देशों से हैं। जो इक्का दुक्का लोग विकासशील देशों से हैं, वह इसलिए कि उन्हें समय पर ठीक सहारा मिला या किसी ने उन्हें विकसित देशों में बनने वाले आधुनिक तकनीकी उपकरण (assistive technology products) दिलाये।

पिछले दशक में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकलाँग व्यक्तियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली तकनीकी में बहुत विकास हुआ है। कार्बन फाइबर, टिटेनियम जैसी धातुओं से आधुनिक डिज़ाईन के बने उपकरण, या कमप्यूटर से चलने वाली कृत्रिम टाँग या हाथ (artificial limb), या नयी तकनीकी की पहियेवाली कुर्सी (wheelchair), इन सबके बिना आप के विकलाँग खिलाड़ी इन स्पर्धाओं में आसानी से नहीं जीत सकते।

शायद इसीलिए अभी तक पैराओलिम्पिक खेलों में भारत ने अधिक मैडल नहीं जीते - बेजिंग में एक भी मैडल नहीं मिला, लँदन में एक मैडल (गिरीष नागराजेगौड़ा का ऊँची छलाँग के लिए चाँदी का पदक) मिला था और रिओ के खेलों में चार पदक (मरिअप्पन थँगावेलू को ऊँची छलाँग में और देवेन्द्र झाझरिया को जेवलिन फ़ैंकने में स्पर्ण पदक, दीपा मलिक को शोर्टपुट में चँद्र पदक और वरुण सिंह भट्टी को ऊँची छलाँग में काँस्य पदक) मिले थे।

आज तकनीकी बदलाव का समय है। थ्रीडी प्रिँटिन्ग (3D Printing), क्मप्यूटर से बने डिज़ाईन (CAD) आदि से छोटे छोटे उपकरण जैसे कि बैसाखी, से ले कर क्मप्यूटर से चलने वाले कृत्रिम हाथ और पैर, आज इस क्षेत्र में बहुत विकास हो रहा है। भारत इस तकनीकी दौड़ में अभी तक ठीक से हिस्सा नहीं ले पाया है। आशा है कि इस क्षेत्र को सरकार और निजी दोनों क्षेत्रों से सहयोग मिलेगा। जो उपकरण खेलों में भाग लेने के लिए बनाये जायेगे, आने वाले समय में उनका लाभ सामान्य विकलाँग तथा वृद्ध लोगों को भी मिलेगा, उनकी कीमत में गिरावट आयेगी।

अंत में

अगर आप के पास नेटफ्लिक्स देखने की सुविधा है तो राइज़िंग फीनिक्स फ़िल्म को अवश्य देखियेगा। बहुत सुंदर फ़िल्म है, दिल को छूने वाली।

खँडित योद्धा की मूर्ति - Image by Sunil Deepak

साथ में, अगर इसे देखने से आप की विकलाँगता के विषय में जानकारी बढ़ती है और विकलाँग लोगों को किन रुकावटों का सामना करना पड़ता है इसकी समझ भी आयेगी तो और भी बढ़िया बात होगी।

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