प्रतिध्वनित भावनाओं के नाटक

डा. सुनील दीपक, 18 सितम्बर 2020

कुछ दिन पहले एक नाटक को देखने गया तो उसमें एक नया अनुभव हुआ। नाटक निर्देशक ने कहा कि उनके नाटक में कोई कथा कहानी नहीं है, बल्कि वह उस नाटक में हम दर्शकों की कहानियों को ही अभिनीत करेंगे। बाद में मालूम हुआ कि इस नाटक शैली को "प्लेबैक नाटक" (Playback Theatre) कहते हैं, जिसमें अभिनेता नाटक देखने आये हुए दर्शकों की कहानियों या यादों की भावनाओं को अपने अभिनय से प्रतिध्वनित करते हैं।

प्लेबैक नाटक,स्किओ,इटली - तस्वीरकार सुनील दीपक

यह आलेख उसी प्लेबैक नाटक शैली के बारे में है।

मेरा प्लेबैक नाटक का अनुभव

उत्तरपूर्वी इटली में हमारा छोटा सा शहर स्कियो (Schio) संस्कृति, कला तथा नाटक जैसी गतिविधियों में बहुत सक्रिय है। एक ज़माने में यह शहर अपनी ऊन मिलों के लिए इटली ही नहीं पूरे यूरोप में प्रसिद्ध था और यहाँ की बढ़िया ऊन की बहुत धाक थी। आज कई पुरानी ऊन मिलों को बदल कर साँस्कृतिक केन्द्र बना दिये गये हैं जहाँ नृत्य समारोह, नाटक, गोष्ठियाँ, कला तथा फोटो प्रदर्शनियाँ आयोजित होती रहती हैं।

पिछले सप्ताह अंत में यहाँ एक साँस्कृतिक समारोह में बहुत सारी साहित्यिक गोष्ठियाँ थीं और साथ ही दो नाटक भी थे। मैं दोनो नाटकों को देखने गया। पहला नाटक प्रसिद्ध फ्राँसिसी नाटककार ज़ाँ पॉल सार्त्र (Jean Paul Sartre) के लिखे नाटक "कोई रास्ता नहीं" पर था, जिसमें नर्क में साथ साथ के कमरों में कैद तीन व्यक्तियों का चित्रण था। यह एक मनोवैज्ञानिक नाटक था और बहुत सुन्दर था, लेकिन सामान्य शैली का नाटक था जैसे कि पहले कई बार देख चुका था।

दूसरा नाटक करने वाले गुट का नाम था "ई कामिनान्तेस" (I Caminantes) यानि "यात्रिक" और उसके निर्देशक अंद्रेआ पिक्को (Andrea Picco) थे। नाटक के प्रारम्भ में उन्होंने कहा कि यह सामान्य नाटक नहीं है बल्कि यह अभिनेताओं और दर्शकों के सहयोग से बना नाटक होगा। चूँकि हर जगह के दर्शक और उनकी कहानियाँ, यादें और भावनाएँ सब भिन्न होती हैं, हर बार का नाटक अपने आप में अनूठा बन जाता है, जिसे कभी दोबारा नहीं मंचित किया जा सकता।

फ़िर उन्होंने दर्शकों को आसपास बैठे किसी व्यक्ति को अपना साथी चुनने के लिए कहा और आपस में एक ऐसे अनुभव के बारे में बात करने के लिए कहा जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा हो। मुझे इस वार्तालाप के लिए एक अपने हम उम्र अभिनेता मिले, हम दोनो ने आपस में अपनी कुछ यात्राओं के अनुभव बाँटे। इस चार या पाँच मिनट के वार्तालाप के बाद नाटक का प्रारम्भ हुआ। निर्देशक महोदय इस नाटक के सूत्रधार थे, वह एक एक करके विभिन्न दर्शकों से अपने या अपने साथी के अनुभव के बारे में बताने के लिए कहते, फ़िर इस बात पर थोड़ी सी चर्चा होती कि उस अनुभव में कौन कौन सी मानव भावनाएँ अभिव्यक्त होती थीं। तब वह अपनी नाटक मँडली के कुछ सदस्यों को मिल कर उन भावनाओं को नाटकीय रूप में अभिव्यक्त करने के लिए कहते थे।

उस नाटक मँडली में आठ सदस्य थे। जब चार व्यक्ति मँच पर अभिनय करते थे, तो बाकी के चार सदस्य एक ओर बैठ कर गीत और संगीत से उस मंचन में सहयोग देते थे। हर एक अनुभव पर छोटा सा नाटक बनता था, पाँच या दस मिनट लम्बा। इस तरह से करीब दो घँटों तक निर्देशक, अभिनेताओं और दर्शकों के बीच में वार्तालाप चला, जिसके बीच बीच में छोटे छोटे नाटक किये गये जिनमें अभिनेताओं ने उस वार्तालाप की प्रमुख भावनाओं को अपने अभिनय से प्रतिध्वनित किया।

प्लेबैक नाटक,स्किओ,इटली - तस्वीरकार सुनील दीपक

जब वार्तालाप में मेरी बारी आयी तो हम लोग वृद्धावस्था और सारे जीवन के काम के बाद रिटायर होने में क्या महसूस होता है, इसकी बात कर रहे थे और मैंने अपने रिटायर होने के अनुभव के बारे में बताया। अभिनेताओं ने रंग बिरंगे रुमाल और एक रस्सी के सहारे से कार्यरत जीवन की जकड़न और रिटायर होने की खुशी को व्यक्त किया, कि कैसे हम रिटायर होने की प्रतीक्षा करते हैं और सपने देखते हैं कि रिटायर हो कर क्या क्या करेंगे, और यह भी दिखाया कि रिटयर होने के जीवन में बुढ़ापा, अकेलापन, काम से जुड़ी अपनी पहचान को खोना जैसी अन्य भावनाएँ भी हैं।

मुझे इस प्लेबैक नाटक का अनुभव बहुत अच्छा लगा, शायद इसलिए भी कि यह नया अनुभव था।

प्रयोगात्मक नाटक शैलियाँ

पारम्परिक नाटक, लोक नाटक, नुक्कण नाटक जैसी कई नाटक शैलियाँ हैं जिन सब में एक कथानक होता है और अभिनेताओं को मालूम होता है कि उस नाटक में उन्हें क्या भाग निभाना है। इनके विपरीत कुछ प्रयोगात्मक नाटक शैलियाँ हैं जिनमें कथानक नहीं होता और अभिनेताओं को नाटक करते करते स्वयं ही उसकी कहानी बनानी होती है। इसे अंग्रेजी में इमप्रोवाईज़ेशन नाटक (Improvisation theatre) भी कहते हैं जिनमें लिखित कथा के दायरे के बाहर नाटक में भाग लेने वाले लोग ही उसकी कथा लिखते हैं, उसे बदलते हैं। प्लेबैक नाटक उस प्रयोगात्मक नाटक शैली को और आगे ले जाता है और उसमें दर्शकों को भी शामिल कर लेता है।

मेरे विचार में इस तरह से नाटक करना सामान्य नाटक करने से अधिक कठिन है क्योंकि अभिनेता के पास डायलॉग नहीं होते हैं, न ही उसने अपने भाग का पहले कोई अभ्यास किया होता है। इसे अच्छा करने के लिए अभिनेताओं को विभिन्न भावनाओं और जीवन के अनुभवों को व्यक्त करने के लिए बहुत अभ्यास चाहिये। जो नाटक मैंने देखा, उनमें से कुछ लोग अच्छे और अनुभवी अभिनेता थे, वह हर नाटक में खुल कर अभिव्यक्ति करते थे जबकि कुछ लोगों में झिझक थी और उनकी अभिव्यक्ति में सतहीपन था।

चूँकि इस शैली में आप के पास लिखित डायलॉग नहीं होते, इसलिए कुछ लोग भावनाओं को अच्छी तरह से शब्दों में व्यक्त कर पा रहे थे, जबकि अधिकतर लोगों को इसमें कठिनाई हो रही थी।

इस नाटक शैली का प्रयोग लोगों में अपनी समस्याओं को समझने, उनके सशक्तिकरण जगाने और मानसिक तनाव का निदान खोजने जैसी समस्याओं के लिए किया गया है। जब आपकी कहानी को अभिनेता आप के सामने अभिनीत करते हैं तो वे आप को अपने जीवन को एक बाहरवाले की दृष्टि से देखने और समझने का मौका देते हैं, इसी बात में इस नाटक शैली का मनोवैज्ञानिक चिकित्सा वाले प्रभाव का बीज छुपा है। वह इस उद्देश्य में कितना सफल होते हैं यह शायद निर्देशक और अभिनेताओं की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है।

भारत में प्लेबैक नाटक

इंटरनेट पर खोजा तो पाया कि तमिलनाडू में चैनाई में स्टर्लिंग थियेटर मँडली है जो कि करीब बीस सालों से प्लेबैक नाटक करती है और हर वर्ष प्लेबैक नाटकों का एक फैस्टिवल भी संयोजित करती है। इन्होंने 2013 से इस शैली के नाटक के प्रशिक्षण का एक ट्रेनिन्ग कोर्स भी शुरु किया है। बँगालूरु में फर्स्ट ड्रोप नाम का गुट तथा श्री प. ई. राजेश के नेतृत्व में एक्टरस कोलेक्टिव नाम का गुट भी है जोकि बहुत सालों से इस नाटकशैली का प्रयोग कर रहे हैं।

इनके अतिरिक्त अन्य भी नाटक मँडलियाँ होंगी जो इस नाटक शैली का प्रयोग करती होंगी जिनके बारे में इँटरनेट पर समाचार नहीं हैं।

अंत में

आज से बारह-तेरह वर्ष पहले मैंने एक सृजनात्मक लेखन (Creative writing) का कोर्स किया था, इस प्लेबैक नाटक को देख कर मुझे उस कोर्स की याद आ गयी। उस कोर्स में हम दस-बारह विद्यार्थी थे। हर बार हमारे शिक्षक हमें एक नयी स्थिति में ले जा कर उसकी कल्पना करने के लिए कहते थे और फ़िर हमें उस कल्पना के बारे में लिखना होता था। उस कोर्स का ध्येय था कि हम विभिन्न स्थितियों में नये तरीकों से सोचना सीखें। कभी कहते कि मानो कि तुम्हारे सामने एक बन्द डिब्बा है, तुम उसे खोलते हो तो स्तब्ध रह जाते हो - सोचो कि उस डिब्बे में ऐसा क्या था जिससे तुम्हें इतना धक्का लगा और उस पर आलेख लिखो। कभी कहते कि मानो कि तुम एक ऊँची एड़ी वाली सैडिल हो, तुम्हें पहन कर एक सुन्दर लड़की पार्टी पर जा रही है, तो सोचो कि तुम्हारा जीवन कैसा होगा और उस पर आलेख लिखो।

प्लेबैक नाटक को देख कर मुझे लगा कि अभिनेताओं के लिए यह नाटक शैली एक सृजनात्मक लेखन के कोर्स में हिस्सा लेने जैसे है, दर्शकों की हर कहानी के बाद आप को स्वयं को किसी नयी स्थिति में होने की कल्पना करनी होती है। अंतर केवल इतना है कि बजाय उसके बारे में आलेख लिखने के, आप को उसे अभिनीत करके दिखाना होता है।

प्लेबैक नाटक,स्किओ,इटली - तस्वीरकार सुनील दीपक

नाटक समाप्त हुआ तो मेरी एक रूसी मित्र ने मुझे बताया कि वह भी इस नाटक मँडली से जुड़ी है और उसने मुझे मँडली का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया। चूँकि इसकी कक्षा और रिहर्सल रात को देर से होती हैं, मैंने मना कर दिया। लेकिन सच कहूँ तो मुझमें अभिनेता बनने की इच्छा नहीं, मुझे लिखना अधिक अच्छा लगता है!

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