एक प्रेमकथा का किस्सा

डॉ. सुनील दीपक, 27 फरवरी 2020

कुछ वर्ष पहले रोमियो जूलियट की कहानी की पृष्ठभूमि पर बनी एक अंग्रेजी फ़िल्म देखी थी जिसका नाम था, "Letters to Juliet" (जूलियट को पत्र)। इस फिल्म में एक वृद्ध अंग्रेज़ी महिला (वेनेसा रेडग्रेव) की कहानी थी जो उत्तरपूर्वी इटली के वेरोना शहर में अपनी जवानी के पुराने प्रेमी को खोजने आती है। इस फ़िल्म में दिखाया गया था कि कैसे दुनिया भर के निराश प्रेमी, रोमियो और जूलियट की प्रेम कहानी से प्रेरित हो कर, उन्हें चिट्ठियाँ लिखते हैं जो कि वेरोना में बने जूलियट के घर पहुँचती हैं। वेरोना में वहाँ की सरकार ने इन पत्रों के उत्तर देने के लिए युवतियों को लगाया है जोकि उन पत्रों के लिखने वालों को पत्र लिखती हैं और अपने प्रेम में कैसे सफल हों, इसकी सलाह देती हैं।

वेरोना शहर का विहँगम दृष्य

यह आलेख रोमियो जूलियट की कहानी के भिन्न रूपों और उत्तरी इटली में बसे उनके शहर वेरोना के बारे में है।

शेक्सपियर का नाटक

रोमियो और जूलियट इतालवी नामों का अंग्रेजीकरण है, उनके इतालवी नाम थे रोमेओ कपूलेती तथा जूलिएत्ता मोनतेक्की. उनकी कहानी को अधिकतर लोग अंग्रेज़ी नाटककार और लेखक विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) की रचना के रूप में जानते हैं, जिसे उन्होंने 1594-96 के आसपास लिखा था.

भारत में शरतचन्द्र की "देवदास" की तरह, "रोमियो और जूलियट" की कहानी पर भी बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। इस कहानी पर बनी सब फ़िल्मों में से मेरी सबसे प्रिय फ़िल्म इतालवी निर्देशक फ्राँको ज़ाफीरेल्ली (Franco Zeffirelli) ने 1968 में बनायी थी, जिसके कलाकार थे लियोनार्ड व्हिटिंग और ओलिविया हस्सी. कुछ वर्ष पहले, इस कथा का भारतीयकरण करके इस पर संजय लीला भँसाली ने "गोलियों की रासलीला - रामलीला" फ़िल्म बनायी थी।

शेक्सपियर की यह कहानी उत्तरी इटली के शहर वेरोना में घटती है. कथा की नायिका है जूलियट, जोकि एक रईस परिवार की नवयुवती हैं. दूसरी ओर रोमियो भी अमीर परिवार के हैं. दोनो परिवारों के बीच में पुरानी खानदानी दुश्मनी है। जूलियट के घर में कार्निवाल के नृत्य में लोग चेहरों पर नकाब लगा कर आते हैं, उनमें छिप कर अपने मित्रों के रोमियो भी आता है, तभी उसकी जूलियट से पहली मुलाकात होती है। इस तरह रोमियो को जूलियट से प्रेम हो जाता है।

एक दिन नवयुवकों के एक झगड़े में, रोमियो की लड़ाई जूलियट के परिवार के एक युवक से होती है और लड़ाई में वह युवक मारा जाता है। इस घटना की वजह से जूलियट के परिवार में रोमियो के प्रति नफरत और भी बढ़ जाती है। जूलियट को उसका एक पादरी मित्र भागने की चाल बताता है। जूलियट एक दवा खा कर सो जाती है, जिससे लगता है कि वह मर गयी है। उसके शरीर को चर्च में लाया जाता है। रोमियो जो कहीं दूसरे शहर गया है, समय से पहले लौट आता है और समाचार सुनता है कि जूलियट मर गयी। चर्च में सोयी जूलियट को देख कर सोचता है कि वह सचमुच मर गयी है और दुख से आत्महत्या कर लेता है। दवा का असर समाप्त होने पर जूलियट जागती है, पास में मृत रोमियो के शरीर को देख कर वह भी आत्महत्या कर लेती है।

शेक्सपियर के समय में इटली का महत्व

जिस समय शेक्सपियर ने यह नाटक लिखा, उस समय यूरोप के सबसे पुराने विश्वविद्यालय इटली में पादोवा और बोलोनिया जैसे शहरों में थे और इतालवी कला व संस्कृति को यूरोप में सबसे ऊँचा माना जाता था। उस समय में यूरोप में रईस और राजकीय परिवारों के युवकों, तथा कवियों, लेखकों तथा चित्रकारों, सभी के लिए इटली की यात्रा करना और कुछ वर्ष वहाँ रहना, उनकी पढ़ाई का आवश्यक हिस्सा माना जाता था। कुछ वैसे ही जैसे आज के नवयुवकों के लिए अमरीका या ईंग्लैंड से एमबीए जैसी डिग्री लेने का सपना होता है, वैसा ही मध्ययुगीन यूरोप में इटली में रह कर यूरोपीय सभ्यता को समझने की आकाँक्षा होती थी।

उस समय विभिन्न यूरोपीय देशों के बीच बातचीत की भाषा लेटिन थी, जिसकी पढ़ाई इटली में होती थी. कला के बड़े विद्यालय, शिक्षा के विश्वविद्यालय, सभी इटली में थे. शेक्सपियर स्वयं कभी इटली नहीं आये, लेकिन "रोमियो जूलियट" के अतिरिक्त, उन्होंने कई अन्य प्रसिद्ध नाटक व कहानियाँ इटली की पृष्ठभूमि पर लिखीं जैसे कि - बाहरवीं रात, ओथेल्लो तथा वेनिस का सौदागर।

वेरोना शहर में रोमियो जूलियट

शेक्सपियर की रोमियो और जूलियट की दुखभरी प्रेमकथा को दुनिया में बहुत प्रसिद्धी मिली और दूर दूर से लोग उनकी कहानी के पात्रों को खोजते हुए वेरोना शहर आने लगे, जोकि वेनिस शहर से करीब सौ किलोमीटर पर गार्दा की झील के किनारे बसा है।

वेरोना शहर का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ पर एक दो हज़ार वर्ष पुराना गोलाकार रोमन थियेटर बना है, जहाँ आज भी हर वर्ष ओपेरा अभिनीत होते हैं, जिन्हें देखने के लिए यूरोप के कोने कोने से ओपेरा प्रेमी आते हैं। पहले इटली अलग अलग राज्यों में बँटा था, उस दौरान ईस्वी 1405 से ले कर अठाहरवीं शताब्दी के अंत तक, यह शहर वेनिस गणतंत्र का हिस्सा था, जिसकी वजह से यह शहर सुन्दर भवनों और मूर्तियों से भरा है। उसके बाद वेरोना कुछ समय के लिए फ्राँस साम्राज्य का और फ़िर आस्ट्रियो-हँगेरियन साम्राज्य का हिस्सा बना। अंत में 1866 में यह इटली का हिस्सा बन गया।

वेरोना शहर में रोमन थियेटर के भग्नावषेश

रोमियो जूलियट की कथा पढ़ कर यहाँ दूर दूर से आने वाले पर्यटक उनके घर खोजते थे, तो उनके लिए शहर की नगरपालिका ने एक सुन्दर मध्ययुगीन घर खोज कर उसे "जूलियट का घर" बना दिया। इस घर में एक सुन्दर छज्जा है (ऊपर वाले बैनर की तस्वीर में) जहाँ आप शेक्सपियर के नाटक के उस दृश्य की कल्पना कर सकते हैं जिसमें बालकनी के नीचे खड़ा हो कर रोमियो अपनी प्रेमिका को अपना प्रणयगान सुनाता है। इसके आँगन में जूलियट की मूर्ति बनी है, जहाँ बहुत से युवक उसके वक्ष को छूते हैं क्योंकि उनका कहना है कि इससे प्यार में सफलता मिलती है। यहाँ पर एक जूलियट का क्लब भी है और उसकी दीवारों पर प्रेमी अपने प्रेम के सँदेश लिख कर छोड़ जाते हैं, जैसे कि भारत में पीर या सूफ़ी संत की दरगाहों में होता है, जहाँ लोग मन्नत का धागा बाँधते हैं।

वेरोना शहर में जूलियट का क्लब

रोमियो जूलियट की पुरानी कहानी

लेकिन सच में रोमियो और जूलियट की मूल कथा शेक्सपियर की नहीं थी, बल्कि यह एक पुरानी इतालवी कथा थी। सबसे पहले इसे तेहरवीं शताब्दी में एक इतालवी लेखक बार्तोलोमेओ देल्ला स्काला (Bartolomeo della Scala) ने लिखा। फ़िर 1524 में लुईजी द पोर्तो (Luigi da Porto) नाम के उपन्यासकार ने लिखा। 1539 में "ला जूलिएत्ता" नाम से कुछ सँशोधन करके इस कथा को एक नये रूप में छापा गया। 1550 के आसपास मातेओ बान्देल्लो (Matteo Bandello) नाम के उपन्यासकार ने "दो दुखी प्रेमियों की दर्दभरी दास्तान" के नाम से इसी कहानी को फ़िर से लिखा। 1559 में बान्देल्लो की किताब को फ्राँस के अनुवादक तथा लेखक पिएर बोइस्तो (Pier Boisteau) ने फ्राँसिसी भाषा में छपवाया। फ्राँससी अनुवाद से प्रेरित हो कर अंग्रेज़ी कवि आर्थर ब्रूक ने 1562 में "रोमियो और जूलियट की दुखभरी कथा" नाम की कविता लिखी। कहते हैं कि शेक्सपियर ने भी इस कहानी को फ्राँसिसी भाषा में पढ़ कर उस पर अपना प्रसिद्ध नाटक 1594-96 में लिखा।

मूल कथा के अनुसार, रोमियो और जूलियट की कहानी वेरोना में नहीं घटी थी, बल्कि वहाँ से करीब बीस किलोमीटर दूर मोनतेक्कियो नाम के छोटे से पहाड़ी शहर में घटी थी। मूल कथा के अनुसार जूलियट के पिता मोनतेक्कियो के राजा थे जबकि रोमियो का कापूलेत्ती परिवार वहीं का रईस परिवार था। मोनतेक्कियो की पहाड़ी पर एक ओर जूलियट के परिवार का किला है और दूसरी ओर रोमियो के परिवार का किला है। इतालवी भाषा में "रोमियो" को "रोमेओ" कहते हैं और "जूलियट" को "जूलिएत्ता" (Giulietta). जूलिएत्ता का अर्थ है "छोटी जूलिया", यानि उस लड़की का नाम था जूलिया, पर प्यार से उनके परिवार वाले उन्हें "छोटी जूलिया" कहते थे। मोनतेक्कियो को शेक्सपियर ने मोनटाग बना दिया, और कपूलेत्ती को कपूलेट।

मोनतेक्कियो में दूर से दिखते रोमियो और जूलियट के किले

इस तरह से पुराने इतालवी उपन्यासों की दृष्टि से देखें तो रोमियो और जूलियट की असली प्रेम कथा मोनतेक्कियो नाम के शहर में है। ऊपर व नीचे की दो तस्वीरों में आप मोनतेक्कियो के आमने सामने बने दो किलों को देख सकते हैं जिन्हें वहाँ के लोग रोमियो और जूलियट के घर मानते हैं।

मोनतेक्कियो में जूलियट का किला

जब हम कुछ वर्ष पहले मोनतेक्कियो के इन किलों को देखने गये थे, तब इनमें अन्दर जाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन पहाड़ी से आसपास का अच्छा दृश्य दिखता था।

कौन सा सच?

इतिहासकारों और पुरातत्व विषेशज्ञों के अनुसार, मोनतेक्कियो शहर के यह दो किले भी बाद के बने हैं। शायद जैसे शेक्सपियर की किताब को पढ़ कर आने वाले पर्यटकों के लिए वेरोना सरकार ने जूलियट का घर बना दिया, वैसे ही, स्थानीय लोगों ने मोनतेक्कियो के दो किलों के इस कथा से जोड़ दिया। शोधकर्ताओं के अनुसार रोमियो और जूलियट की कहानी किलों के बनने से पुरानी है। वे मानते हैं कि यह किसी उपन्यासकार की कल्पना का नतीजा है, सचमुच की कहानी नहीं है।

सारी दुनिया में प्रेमियों की दुखभरी दास्ताने हमेशा से ही बहुत लोकप्रिय रही हैं - लैला मजनू, शीरीं फरहाद, मिर्ज़ा साहिबाँ, हीर राँझा आदि। रोमियो जूलियट की कहानी भी उसी परम्परा का हिस्सा है। इस कहानी में बाकी कथाओं से फर्क केवल इतना है कि लोगों ने इस कहानी को इतिहास का हिस्सा मान कर, उससे वेरोना या मोनतेक्कियो जैसे शहरों के नाम जोड़ दिये हैं।

वेरोना शहर का पुराना केन्द्र

अगर आप का प्रेम असफ़ल रहा हो, आप अपने प्रेमी या प्रेमिका के विरह में परेशान हों तो आप भी इटली के वेरोना शहर में जुलियट के घर पर अपना पत्र भेज सकते हैं। क्या जाने रोमियो और जूलियट की आत्माएँ आप को अपना प्रेम पाने में सफल कर सकें!

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इस आलेख को मैंने 2013 में अपने पुराने ब्लोग "जो न कह सके" में पहली बार लिखा था, इस बार उसमें कुछ बदलाव किया और कुछ नया जोड़ा है।

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