वेनिस के मुखौटे और वैश्वीकरण

डा. सुनील दीपक, 16 फरवरी 2020

पिछले दो तीन दशकों में सतही तौर से देखें तो दुनिया का नक्क्षा नहीं बदला, लेकिन भीतर ही भीतर से दुनिया इतनी बदल गयी है कि तीस वर्ष पहले मरे कोई व्यक्ति अगर आज लौट कर आ जायें तो उन्हें विश्वास ही न हो।

एक बड़ा बदलाव आया है तकनीकी विकास से जिससे मोबाईल टेलीफोन, इंटरनेट तथा व्हाटअप और नेटफ्लिक्स जैसे प्रोग्रामों ने यह संभव कर दिया है कि आप दुनियाँ में कहीं भी रहें, दुनिया के किसी अन्य कोने में रहने वालों से बात कर सकते हैं, उन्हें वीडियो के माध्यम से देख सकते हैं, उनके समाचार पढ़ सकते हैं, वह जो फिल्म या टीवी कार्यक्रम देख रहें हों, वह सब देख सकते हैं।

वेनिस के मुखौटे

इस वैश्वीकरण का एक अन्य हिस्सा है कुछ देशों का औद्योगिक विकास, जिससे वह सारे विश्व पर अपनी धाक जमा रहे हैं। यह आलेख वैश्वीकरण के उसी हिस्से के बारे में है।

वेनिस के कार्नीवाल के मुखौटे

आजकल मैं और मेरी पत्नी इटली के उत्तरीपूर्व क्षेत्र में एल्पस पहाड़ों से घिरे एक छोटे से शहर स्कियो में एक करीब 140 वर्ष पुराने घर में रहते हैं। यह घर 1884 में यहाँ की एक ऊन की मिल में काम करनेवालों के लिए बना था। उस ऊन मिल के मालिक उदारवादी विचारों के थे, उन्होंने सोचा कि मिल में काम करने वालों के बीच में ऊँच नीच का भेदभाव नहीं होना चाहिये, इसलिए उन्होंने खुली सड़कें बनवायीं और उन पर विभिन्न तरह के घर साथ साथ बनवाये. इस तरह से एक घर मिल में काम करने वाले मजदूर का था तो साथ वाला घर, बड़े अफसर का था, और उसके साथ वाला घर बीच के कामगर का। इटली में इस तरह से सोच समझ कर अमीर और गरीब लोगों के मिले जुले घर बनाने का यह सबसे पहला उदाहरण था।

इस घर में मेरी पत्नी के परनाना रहने आये. इसी घर में मेरी पत्नी, उसके पिता और उसके दादा पैदा हुए. 1942-43 में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, कुछ समय इस घर के एक कमरे में एक जर्मन नाज़ी अफसर भी रहा. ऊन मिल के लिए बने इन सब घरों को हमारे शहर ने औद्योगिक पुरात्तव धरोहर माना है, और यहाँ के घरों में भीतर से कितना ही बदल लीजिये, उनको बाहर से बदलना मना है। यहाँ तक कि आप बाहर से उसका रंग भी नहीं बदल सकते.

खैर बात चल रही थी वैश्वीकरण की, तो आप को बताऊँ कि किस बात से इसका विचार आज मुझे आया.

हमारे यहाँ से वेनिस शहर बहुत दूर नहीं. अगर कार में जायें तो एक घँटे से कम समय लगता है, और अगर यहाँ की लोकल रेल से जायें तो करीब दो घँटे लगते हैं. आजकल यहाँ कार्निवाल का त्योहार चल रहा है. वेनिस के कर्निवाल में लोग रँगबिरंगे मुखौटे पहनते हैं और विशिष्ठ पौशाकें बनवाते हैं. उसी को देखने कल दिन भर वेनिस में घूमा और वापस लौटते समय वहाँ से दो मुखौटे खरीद लाया. आज सुबह उन्हें घर की दीवार पर लगाने लगा तो बहुत दिन बाद अपनी पुरानी हथोड़ी खोजी. यह हथोड़ी मेरी पत्नी के दादा की थी, पर शायद उनसे भी पुरानी है। इसमें कोई जोड़ नहीं है, ठोकने वाला एक लोहे का भाग है जिसमें एक चकोर छेद है है जिसमें उसका लकड़ी का हत्था फँसा हुआ है।

कील खोजे तो पैकेट पर "मेड इन वियतनाम" लिखा था. सोचा कि एक ओर तो कम से कम सौ साल पुरानी हमारी पुश्तैनी हथौड़ी थी, दूसरी ओर दुनिया के दूसरे कोने से आये नये नवेले कील. विदेश से आये कीलों को देख कर मुझे बुरा नहीं लगा।

दीवार पर कील लगाये तो मुखौटे दीवार पर लटकाने से पहले उनके पीछे देखा। वहाँ लिखा था, "मेड इन चाईना", पढ़ा तो तुरंत विश्वास नहीं हुआ, बहुत बुरा लगा। देखने में वह सुंदर लग रहे हैं, बिल्कुल यहाँ के बने परम्परागत मुखौटों जैसे। मन को बहुत धक्का लगा। खुद को कोसा कि सस्ता खरीदने के चक्कर में यह गलती हुई।

वेनिस में इस तरह के मुखौटे यहाँ के कलाकार बनाते हैं. पेपर मेशे तकनीक से बने मुखौटों को कलाकार हाथों से रंगते है। यह यहाँ की पुरानी हस्तकला है। लेकिन अब चीन से बने मुखौटे आने लगे हैं, जो देखने में सुन्दर हैं और उनकी कीमत यहाँ के कलाकारों के बनाये मुखौटों से दो या तीन गुना कम है। अगर ऐसे ही चलेगा तो कुछ वर्षों में यहाँ पाराम्परिक मुखौटे बनने बन्द हो जायेंगे, सब मुखौटे बाहर से आयात किये जायेंगे और यहाँ के कलाकारों को कुछ नया काम खोजना पड़ेगा।

बुरानों की लेस

जो हाल वेनिस के मुखौटों को होने वाला है, वही हाल वेनिस के करीब एक छोटा सा द्वीप है बोरानों, उसका पहले ही हो चुका है। बुरानों अपनी पराम्परागत तरीके से बुनी हुई लेस के लिए प्रसिद्ध था. उस लेस को बनाने में समय के साथ साथ बहुत मेहनत लगती थी और उसकी कीमत भी बहुत होती थी।

बुरानो की लेस की दुकान

कुछ मास पहले बुरानो गया था तो वहाँ देखा था कि 90 प्रतिशत दुकानों में पराम्परागत लेस की जगह पर चीन से आयातित लेस थी, हाथों से बुनी गयी थी या मशीन से यह नहीं कह सकता।

भारतीय भगवान

जो हाल वेनिस की हस्तकलाओं का हो रहा है, वह भारत में होली, दीवाली जैसे त्योंहारों में बिकने वाले सामान का पहले ही हो चुका है। रंग, दीये, पटाखे और सब देवी देवताओं की मूर्तियाँ, बहुत सा सामान चीन से आयातित ही होता है।

भारत की देवी देवताओं की मूर्तियाँ

मेरे विचार में अभी तक गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा और सरस्वती पूजा की मुर्तियाँ स्थानीय जगहों पर वहीं के शिल्पी और हस्तकला के कलाकार ही बनाते हैं लेकिन शायद वह भी अधिक दिन नहीं चलेंगे। मुझे लगता है कि भविष्य में वह दिन दूर नहीं जब हस्तकला का केवल नाम ही रह जायेगा, सब कुछ जो आज विभिन्न देशों के कलाकार अपने हाथों से बनाते हैं, वह सब कुछ मशीनों से बनेगा, न किसी को कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ेगी और सब कुछ सस्ता ही बिकेगा।

अंत में

शायद मेरे जैसे सफेद बालों वाले लोग, हस्तकला की इस लुप्त होती परम्परा का दुख मनायेंगे पर अधिकतर लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बल्कि वह तो खुश ही होंगे कि सब कुछ सस्ता हो रहा है, और सब कुछ कहीं न कहीं से आयात किया जा रहा है। सदियों पुरानी हस्तकलाएँ और परम्पराएँ, उनके बारे में चिंता करना पुरातनपंथी है, नये समय के साथ स्वयं को भी नया बनाने का समय है???

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