भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय

डा. सुनील दीपक, 31 मई 2021

कुछ दिन पहले अंग्रेज़ी अखबार फर्स्टपोस्ट पर रश्मि दासगुप्ता का एक आलेख पढ़ा जिसका शीर्षक था "राष्ट्रीय संग्रहालय को बदलाव की आवश्यकता है"। इस आलेख की पृष्ठभूमि में मोदी सरकार का दिल्ली के राजपथ पर नये भवनों का निर्माण है जिनमें राष्ट्रीय संग्रहालय भवन भी आता है - आज जहाँ यह संग्रहालय है वहाँ कोई अन्य भवन बनेगा और राजपथ के उत्तर में जहाँ अभी नॉर्थ तथा साउथ ब्लाक में मंत्रालय हैं वहाँ पर यह नया संग्रहालय बनाया जायेगा।

अपने आलेख में रश्मि दासगुप्ता ने राष्ट्रीय संग्रहालय के इतिहास के बारे में कुछ बातें बतायीं, जो मुझे रोचक लगीं। साथ ही उन्होंने इसके संग्रह को प्रस्तुत करने वाली वीथियों की आलोचना भी की, जिनसे मैं पूरा सहमत नहीं था। उनके अनुसार, इस संग्रहालय के पास जितनी वस्तुएँ जमा हैं उनमें से केवल चार प्रतिशत दर्शकों के लिए प्रदर्शित है, बाकि सब वस्तुएँ संग्रहालय के स्टोर में बन्द पड़ी हैं। जो समान स्टोर में बन्द है उन्हें ठीक से केटालॉग नहीं किया है जिससे उनके खोने या चोरी होने का खतरा है। इसलिए उनकी यह बात मुझे सही लगी कि नये भवन में संग्रहालय को अधिक स्थान मिलेगा, यह अच्छी बात है लेकिन साथ ही संग्रहालय में संचित हर वस्तु का केटालॉग होना चाहिये। उनके अनुसार संग्रहालय में जो वस्तुएँ प्रदर्शित हैं, वह अँधेरी गैलरियों में रुचिहीन तरीके से रखी गयी हैं - मुझे यह बात सही नहीं लगी, दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय मेरे मनपसंद संग्रहालयों में से है।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - भोपाल - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

इस आलेख में मैंने अपने कुछ मनपसंद भारतीय संग्रहालयों के बारे में लिखा है।

संग्रहालयों की उपयोगिता

सतरहवीं से बीसवीं शताब्दियों में युरोप के कुछ देशों ने एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका महाद्वीपों के विभिन्न देशों पर कब्ज़ा कर लिया। इन देशों से उनकी कला व साँस्कृतिक धरौहरों को उठा कर वे उन्हें अपने देशों में ले गये जहाँ उन्होंने इनके लिए संग्रहालय बनाये, जिनमें विभिन्न देशों से लायी वस्तुओं को अपने देशवासियों को दिखाया। इसके पीछे एक कारण था यह दिखाना कि देखो यह सब देश कितने पिछड़े और संस्कृतिविहीन थे। क्योंकि उन देशों में ईसाई धर्म नहीं था और उनकी भाषाएँ, वेषभूषाएँ, परम्पराएँ यूरोप से भिन्न थीं, इसलिए उनकी संस्कृतियों को नीचा माना जाता था। उन "नीची" तथा "पिछड़ी" संस्कृति वाली सभ्यताओं के बारे में ज्ञान एकत्रित करने के लिए "मानव सभ्यता विज्ञान" यानि एन्थ्रोपोलोजी (anthropology) का आविष्कार किया गया और उसके विषेशज्ञ तैयार किये गये जो उन उपनिवेशक देशों में जा कर वहाँ के "जँगली" लोगों के बीच में रह कर उनके रहने, खाने, रीति रिवाज़, आदि विषयों का अध्ययन करते थे। उन देशों से लायी कीमती वस्तुएँ, जिनमें सोना, चाँदी, हीरे, मोती आदि के गहने थे, वह सब भी यूरोप पहुँच गये।

बाईबल के अनुसार भगवान ने दुनिया को तीन या चार हज़ार वर्ष पहले बनाया था, इसलिए प्रारम्भ की पश्चिमी सोच में उस समय से पुराने इतिहास का विचार नहीं था। "जँगलियों की सभ्यता" की प्रारम्भिक सोच से संग्रहालय बनाने की आधुनिक समझ धीरे धीरे बनी, जब उन्हें समझ आने लगा कि मानव इतिहास समय के साथ बदलता रहता है और समय के साथ प्राचीन इतिहास के लुप्त होने का खतरा है। भग्नावषेशों को जाँच कर उन्हें समझना, तथा धरती खोद कर उसकी परतों से बीते समय की वस्तुओं को खोजने की कोशिशों से उन साम्रज्यवादी सदियों में ही इतिहास, पुरातत्वविज्ञान तथा खगोलविज्ञान जैसे नये विषयों की समझ,पढ़ाई तथा तकनीकी विकसित हुई जिसकी वजह से धीरे धीरे धर्म के स्थान पर विज्ञान को अधिक महत्व दिया जाने लगा।

आज भी एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका के विभिन्न देशों की बहुत सी साँस्कृतिक धरौहरें लँदन, पैरिस और एमस्टरडैम के संग्रहालयों में मिलती हैं। समय के साथ, नये स्वतंत्र हुए विकासशील देशों ने धीरे धीरे अपने संग्रहालय बनाने शुरु किये हैं। पहले जहाँ संग्रहालयों में वस्तुओं को अधिकतर कौतुहल का विषय मान कर रखा जाता था, उसमें बदलाव आया - धीरे धीरे यह समझ बनी कि हर वस्तु को उसके साँस्कृतिक तथा सामाजिक अर्थ, इतिहास व परिवेश की पृष्ठभूमि के साथ ही समझा जा सकता है। इससे संग्रहालयों में इतिहास व सँस्कृति के जानकार गाईड तैयार किये जाने लगे और उनके संग्रहों के बारे में किताबें व केटालॉग बनाये जाने लगे ताकि दर्शक संग्रहालय में घूमते समय हर वस्तु के बारे में अधिक जानकारी पा सकें। डिजिटल तकनीकी के विकास ने संग्रहालयों को इंटरएक्टिव बना दिया जिससे दर्शकों को हर प्रदर्शित वस्तु के बारे में जानकारी पाने का एक नया माध्यम मिला।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - राष्ट्रीय - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

स्वतंत्रता के बाद धीरे धीरे भारत के लोगों में अपनी प्राचीन सभ्यता के विषय में जानने की इच्छा बनी है, पुरात्तव विभाग ने कई जगहों पर काम किये हैं। हालाँकि अभी भी हमारे पुरात्तव विभागों को राष्ट्रीय तथा राज्य बजटों में अधिक पैसा नहीं मिलता और हमारी अधिकतर पुरात्तव की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान खुदाई व अन्वेषण की प्रतीक्षा में हैं। हमारे अधिकतर संग्रहालय पुरानी, धूल से भरी जगहें हैं, जो बिना समझ वाले बाबू लोगों द्वारा संचालित हैं। लेकिन साथ ही सुन्दर संग्रहालय बनाने के कुछ प्रयास हुए हैं। आईये, मैं आप का अपने कुछ प्रिय भारतीय संग्रहालयों से परिचय करवाता हूँ।

दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय

भारत की स्वतंत्रता के उपलक्ष्य में लँदन में सन् 1947-48 में एक भारतीय कला प्रदर्शनी लगायी गयी थी, उस कला प्रदर्शनी के समाप्त होने के बाद उन सब वस्तुओं से दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय की शुरुआत की गयी थी। जब तक राष्ट्रीय संग्रहालय का भवन बन कर तैयार नहीं हुआ था, सब सामान राष्ट्रपति भवन में रखा गया था।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - राष्ट्रीय - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

मुझे हमारा राष्ट्रीय संग्रहालय बहुत अच्छा लगता है। मैंने यूरोप में कई संग्रहालय देखे हैं, मुझे यहाँ की प्रदर्शनी विदेशों के किसी भी संग्रहालय से कम नहीं लगती। दिल्ली में जब भी मौका मिलता है मैं राष्ट्रीय संग्रहालय में अवश्य एक चक्कर लगा लेता हूँ। अगर यह सोचा जाये कि संग्रहालय की गैलरियों में प्रदर्शित शिल्प, कला तथा आम जीवन की वस्तुओं में भारत के दो हज़ार वर्षों से अधिक इतिहास को देखा जा सकता है तो यह अवश्य लगता है कि उसकी जगह बहुत कम है। उत्तरी, पूर्वी, पक्षिमी, और दक्षिण भारत के भिन्न हिस्सों के विभिन्न युगों के इतिहासों को एक जगह पर ठीक से दिखाना चाहें तो आज के राष्ट्रीय संग्रहालय से दस गुना जगह भी शायद कम पड़ेगी। लेकिन इन कमियों के बावज़ूद, उसकी प्रदर्शित वस्तुएँ इतनी सुन्दर हैं कि मैं हर बार वहाँ कई घँटों तक घूमता रहता हूँ।

मेरे विचार में हर सप्ताह-अंत में, शनिवार व रविवार को, राष्ट्रीय संग्रहालय में इतिहास, संगीत, धर्म, संस्कृति आदि के विषेशज्ञयों द्वारा संचालित गाईडिड टूर होने चाहिये ताकि लोगों को हमारे इतिहास के बारे में किताबी समझ के दायरे से बाहर का ज्ञान मिले। उन्हें जनता के लिए फ़िल्मों तथा वार्ताओं के कार्यक्रम भी नियमित रूप से आयोजित करने चाहिये, जिनमें संग्रहालय में प्रदर्शित वस्तुओं के बारे में गहराई से जाना जा सके।

सहपीडिया का डिजिटल संग्रहालय

इंटरनेट तथा डिजिटल तकनीकी ने साईबरलोक में नई तरह के संग्रहालय बनाने का मौका दिया है। भारत में इसका सबसे बढ़िया नमूना है सहपीडिया में जिनके आरकाईव में भारत के राज्यों, लोगों के जीवन, धर्म, रीति रिवाज़ों, और साँस्कृतिक धरौहरों के बारे में आप को बहुत सी जानकारी मिल सकती है जिसे किसी एक संग्रहालय में एकत्रित करना असंभव है।

मैंने उनके दिल्ली के दफ्तर में कई दिलचस्प वार्ताओं व सम्मेलनों में हिस्सा लिया है। इस सब के साथ वह वर्कशॉप, तथा देश के विभिन्न शहरों में साँस्कृतिक महत्व की जगहों पर "हेरीटेज वॉक" का आयोजन भी करते रहते हैं।

बहुत से शहरों में सहपीडिया ने उनके साँस्कृतिक नक्शे बनाये हैं जिनसे उन शहरों के इतिहासों को एक नयी दृष्टि से देखा व समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए केरल में एक बार मुझे उनके बनाये फोर्ट कोची क्षेत्र में "साँस्कृतिक नक्शे" को देखने का मौका मिला जिससे यह समझ में आया कि प्राचीन समय से ही विभिन्न देशों से भिन्न धर्मों वाले प्रवासी समुदाय यहाँ कहाँ कहाँ आ कर बसे थे और कैसे साथ साथ रहते थे।

उनके कुछ पृष्ठ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में हैं, लेकिन बहुत सी सामग्री केवल अंग्रेज़ी में है। यही सहपीडिया की सबसे बड़ी कमज़ोरी है।

गुरुग्राम का संस्कृति संग्रहालय

दिल्ली के पास गुरुग्राम में, दिल्ली मैट्रो के अंजनगढ़ स्टेशन के पास आनन्दग्राम में एक अन्य सुन्दर संग्रहालय है, संस्कृति संग्रहालय। यह छोटा सा है लेकिन यहाँ भारत के विभिन्न राज्यों से आयी हुई जनजातियों द्वारा बनाई गयी मिट्टी की कला वस्तुओं का संग्रह मुझे बहुत अच्छा लगा। यह एक निजि संग्रहालय है जिसे श्री ओमप्रकाश जैन द्वारा बनवाया गया।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - संस्कृति - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

संग्रहालय के तीन भाग हैं - आम जीवन में प्रयोग आने वाली वस्तुएँ, मिट्टी की कला यानि टेराकोटा (Terracotta) कला तथा बुनकर कला जिसमें भिन्न तरह के करघे पर बुने कपड़े (टेक्टाईल)हैं।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - संस्कृति - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

संग्रहालय पहुँचने के लिए मैट्रोस्टेशन से कुछ किलोमीटर चलना पड़ता है, क्योंकि प्राईवेट टेक्सी के अतिरिक्त वहाँ वाहन मिलना आसान नहीं है। यह कठिनाई केवल इस संग्रहालय की नहीं बल्कि बहुत से संग्रहालयों की है - मेरी दृष्टि में कुछ जगहों पर जनपरिवहन का न होना इनके प्रबँधकों की लापरवाही भी दर्शाता है, जो शायद सोचते हैं कि अगर आप पैसे वाले पर्यटक नहीं हैं या आप के पास अपनी कार या स्कूटर नहीं तो यह जगह आप के लिए नहीं है, यानि उनकी सोच में सामान्य जनता को संग्रहालय में दिलचस्पी नहीं हो सकती। कुछ कमी स्थानीय प्रशासन की भी है जिसे मैट्रो स्टेशनों पर वहाँ के आसपास के संग्रहालय व साँस्कृतिक संस्थानों के बारे में सूचना देनी चाहिये।

केरल में कोची का जनजाति संग्रहालय

केरल में कोची का जनजाति संग्रहालय भी एक निजि संग्रहालय है जोकि केरल प्रदेश के वास्तुशिल्प, कला, सभ्यता व संस्कृति से आप का परिचय कराता है। यह संग्रहालय लकड़ी के एक पारम्पिक तरीके के बने भवन में बनाया गया है। इस संग्रहालय में धार्मिक कला शिल्प के बहुत सुन्दर नमूने देखने को मिलते हैं।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - कोची केरल - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

इसी संग्रहालय में मैंने पहली बार उत्तरी केरल के कन्नूर जिले के आसपास की प्रचलित थैयम परम्परा के नमूने देखे जिनमें कुछ जनजातियों के लोग पाराम्परिक श्रृंगार और वस्त्र पहन कर देवी देवताओं को अपने शरीर में उतारते हैं। इनको देखने के बाद ही मुझमें कन्नूर जा कर वहाँ के गाँवों में थैयम पूजा को देखने की जिज्ञासा जागी, जोकि मेरे जीवन का बहुत रोमांचक अनुभव था।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - कोची केरल - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

नागालैंड में किसामा का हेरीटेज गाँव

नागालैंड के गाँवों में अधिकाँश जगहों पर ईसाई धर्म और आधुनिकता के साथ पाराम्परिक सँस्कृति, पुराने तरीके का रहन सहन, रीति रिवाज़ आदि लुप्त से हो रहे हैं। प्राचीन समय में विभिन्न नागा जातियों की, हर एक की अपनी विशिष्ठ परम्पराएँ, वास्तुशिल्प, पौशाकें होती थीं। नागालैंड की राजधानी कोहिमा से थोड़ी दूर किसामा साँस्कृतिक धरौहर गाँव है जहाँ नागा जनजातियों के घरों, पौशाकों तथा कलाओं को दिखाया गया है।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - किसामा - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

एक स्तर पर लगता है कि किसामा गाँव विभिन्न नागा जनजातियों के पाराम्परिक जीवन को दिखाने वाला खोखला ढाँचा सा है जिसमें सचमुच का जीवन नहीं है, लेकिन मेरे विचार में आने वाली नागा पीढ़ियों के यह महत्वपूर्ण है कि उनकी पश्चिमी सभ्यता की नयी पहचान के बीच में उनके सदियों के पुराने जीवन की कुछ यादें भी बची रहें।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - किसामा - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

हर वर्ष दिसम्बर में इस गाँव में एक संगीत तथा साँस्कृतिक समारोह होता है, जो होर्नबिल फेस्टीवल (Hornbill festival) के नाम से जाना जाता है और जिसमें नागा युवक व युवतियाँ अपने प्राचीन वस्त्र, रीति रिवाज़ों तथा परम्पराओं को याद करते हैं। इस समारोह के लिए दूर दूर से पर्यटक नागालैंड आते हैं।

गुवाहाटी का श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र संग्रहालय

गुवाहाटी के छः मील क्षेत्र के पास पँजाबाड़ी में असमिया संगीतकार व कलाप्रेमी भूपेन हज़ारिका द्वारा स्थापित कलाक्षेत्र संग्रहालय में असम की साहित्य, नृत्य, कला, नाटक तथा जनजातियों से जुड़ी परम्पराओं को प्रदर्शित किया गया है। इस तरह कलाक्षेत्र केवल संग्रहालय नहीं है, यह कला, नृत्य और नाटकों से असम की जीवंत सँस्कृति से जुड़ा है। यहाँ केवल प्रदर्शनी देखने की जगह नहीं है, बल्कि वहाँ आप असम की सभ्यता को जी सकते हैं।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - कलाक्षेत्र - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

मेरा सौभाग्य था कि कुछ वर्ष पहले मुझे कलाक्षेत्र से थोड़ी दूर ही रहने का मौका मिला, जिससे कलाक्षेत्र जाने के बहुत मौके मिले। कलाक्षेत्र का जनजाति सभ्यता संग्रहालय छोटा सा है लेकिन बहुत सुन्दर है।

भक्तीकाल में असम में श्रीमंत शंकरदेव तथा अन्य संतो के द्वारा एक जातिविहीन, कृष्ण भक्ति पर आधारित एक नये तरह के हिन्दु धर्म की परिकल्पना की गयी थी, जिसकी नींव सादे जीवन पर टिकी थी। हिंदू धर्म के इस रूप का केन्द्र नामघर तथा सत्रिया होते हैं। कलाक्षेत्र में आप को इस नामघर संस्कृति को जानने और समझने का मौका भी मिलता है।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - कलाक्षेत्र - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

कलाक्षेत्र के साथ ही शिल्पग्राम भी है जहाँ विभिन्न असमियाँ जनजातियों के घरों और गाँवों को दिखाया गया है जोकि किसामा के नागा गाँवों से मिलता है। यहाँ अक्सर प्रदर्शनियाँ लगती रहती हैं जहाँ आप गृहउद्योग तथा पराम्परिक हस्तकला को देख व खरीद सकते हैं।

वहाँ से कुछ दूर पर गुआहाटी का विज्ञान संग्रहालय भी है जोकि बहुत सुंदर है और बच्चों के लिए बहुत दिलचस्प है।

भोपाल के राष्ट्रीय मानस संग्रहालय व जनजाति संग्रहालय

भारत के सभी संग्रहालयों में से मेरे सबसे प्रिय संग्रहालय भोपाल में हैं, वहाँ का मानस संग्रहालय व जनजाति संग्रहालय। दो बार वहाँ जा चुका हूँ लेकिन अगर मौका मिले तो वहाँ अन्य दस बार लौटना चाहूँगा।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - भोपाल - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

मध्यप्रदेश की विभिन्न जनजातियों के आम जीवन की वस्तुएँ, उनके घर, वस्त्र, रीति रिवाज़, विभिन्न कलाओं, आदि से जुड़ी इन संग्रहालयों में इतनी वस्तुएँ हैं कि उनको देखने और समझने के लिए कई महीने चाहिये। सब कुछ इतने सुन्दर तरीके से प्रदर्शित किया गया है कि यहाँ घूम कर महीनों तक यहाँ के सपने आते रहते हैं।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - भोपाल - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

अगर आप को भोपाल जाने का मौका मिले तो आप को इन दोनों संग्रहालय को अवश्य देखने जाना चाहिये।

अंत में

रश्मि दासगुप्ता नें अपने आलेख में लिखा है कि भारत में संग्रहालयों में जाने की परम्परा नहीं है। शायद यह बात सच है लेकिन मेरी राय में अगर लोगों को संग्रहालय में आकर्षित करने के लिए वस्तुओं को शीशे के डिब्बे से बाहर निकाल कर रखा जाये और लोगों को वहाँ सैल्फ़ी खींचने आदि से नहीं रोका जाये, तो धीरे धीरे अपनी संस्कृति को जानने समझने के बारे में जिज्ञासा बनायी जा सकती है। अगर संग्रहालय केवल वस्तुओं को दिखाने तक सीमित न रहें, उनमें पारम्परिक कला सीखने, फिल्म, नाटक व नृत्य देखने की सुविधाएँ हों, वहाँ के बारे में दिलचस्प तरीके से समझाने बताने वाले गाईड हों, वहाँ बैठने की जगहें हों जहाँ लोग चाय-कॉफ़ी पी सकें, जहाँ लोग छोटे बच्चों को ले कर आ सकें और जो जनपरिवहन सेवाओं से जुड़े हों, तो नयी पीढ़ी में संग्रहालय जाने की तथा देश की संस्कृति का महत्व समझने की परम्परा भी बन सकती है।

अधिकतर संग्रहालय बाबू लोगों की निजी रियासतें जैसी होती हैं, जहाँ फोटो खींचना मना होता है और न ही उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से कैसे दर्शकों को संग्रहालय से जोड़ा जाये की कोई जानकारी होती है। आज का युग मोबाईल फ़ोन का व सैल्फ़ी का युग है, अगर आप दर्शकों को संग्रहालयों में टिवटर, टिकटॉक, फेसबुक आदि पर सैल्फ़ी नहीं दिखाने देंगे तो बहुत से लोग वहाँ नहीं आयेंगे, विषेशकर नवजवान लोग। यह समझ निज़ी संग्रहालयों में अधिक है, इसलिए वह वस्तुओं को ऐसे रखते हैं ताकि लोग वहाँ फोटो खींचे और संग्रहालय के बारे में अपने मित्रों व जानकारों को दिखा सकें कि संग्रहालय में उन्होंने क्या क्या दिलचस्प चीज़ें देखीं, जिससे अन्य लोग भी वहाँ आना चाहें।

दूसरी बात है कि भारत में पुराने मन्दिर, मस्जिद, किले, राजमहल, भग्नावषेश, बहुत हैं जो कि खुले संग्रहालय जैसे हैं, उनके सामने कमरों में बन्द सँग्रहालय कम दिलचस्प लगते हैं। जैसे कि एक बार हम्पी या महाबलिपुरम के भग्नावषेशों के बीच घूम लें तो उनके संग्रहालयों में वह आनन्द नहीं मिलता। इसलिए यह कहना की लोगों में संग्रहालय जाने की परम्परा नहीं है, शायद संग्रहालयों की कमियों को न देख पाना है।

भारत के सबसे सुन्दर संग्रहालय - राष्ट्रीय - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

आशा है कि आप को मेरे प्रिय भारतीय संग्रहालयों का यह टूर अच्छा लगा होगा। क्या आप की दृष्टि में भारत के किसी अन्य राज्य में कोई अन्य संग्रहालय है जो आप को बहुत अच्छा लगता है और जिसे इस सूची का हिस्सा होना चाहिये था? मुझे इसके बारे में फेसबुक या टिवटर या ईमेल से बताईयेगा, तो मैं अगर उस तरफ़ जाऊँ तो उसे अवश्य देखने जाऊँ।

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