हर जगह और हर वक्त चलती लड़ाई

ओम प्रकाश दीपक

टिप्पणीः मेरे पिता ओमप्रकाश दीपक, डा. लोहिया के साथ समाजवादी पार्टी से जुड़े थे, कई वर्षों तक वह समाजवादी पत्रिका "जन" के सम्पादक थे, साथ ही उन्होंने कुछ स्वतंत्र लेखन भी किया। उनकी मृत्यु 25 मार्च 1975 में हुई जब वह 48 वर्ष के थे। अगर वह आज जीवित होते तो 94 वर्ष के होते। उनकी स्मृति में उनका एक आलेख प्रस्तुत है जोकि शायद उन्होंने 1967 के अंत में या 1968 के प्रारम्भ में लिखा था, जब हम लोग दिल्ली में करोलबाग में रहते थे।

इस आलेख में भारत के स्वतंत्रता संग्राम और 1962 के चीन से युद्ध की पराजय की प्रतिध्वनि है, लेकिन यह अधिकाँश वर्ण-भेद के विषय पर केन्द्रित है, जिसमें अमरीकी अश्वेत लड़ाई से उसकी तुलना की गयी है। आलेख की भाषा, शायद आज के मापदँड के अनुसार सही नहीं मानी जायेगी - जैसे कि अश्वेतों के लिए नीग्रो शब्द का प्रयोग किया गया है और भारत के जाति विमर्ष से दलित शब्द लुप्त है। इसमें कई बातें हैं जो आज के भारत में बदल चुकी हैं, लेकिन साथ ही कई बातें हैं जो नहीं बदली। उन्होंने सवर्णों के लिए द्विज शब्द का प्रयोग किया है, जोकि शायद आज सवर्णों के लिए कम और ब्राहमणों के लिए अधिक प्रयोग किया जाता है। उनके बचपन के समाज की जो बातें इस आलेख में हैं, वह 1930 के दशक से संबधित हैं। लेकिन मेरे विचार में इसमें बहुत बातें केवल वर्णभेद से संबधित नहीं हैं, बल्कि उसमें वर्गभेद और गरीबी का विमर्श है। मैं उनकी हर बात से सहमत नहीं, लेकिन फ़िर भी मेरे विचार में इसमें आज भी बहुत कुछ है जो सोचनीय है।

आलेख के साथ उपयोग की गयी तस्वीरें आज के इलाहाबाद से हैं। सुनील दीपक, 25 मार्च 2021

व्यक्ति, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश, भारत - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

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पिछले दिनों मैं जेम्स बाल्डविन की एक किताब पढ़ रहा था - "दि फायर नेक्स्ट टाईम"। पढ़ते पढ़ते कई बार मेरे मन में खयाल आया कि हिन्दुस्तान में वर्ण-भेद के बारे में कोई इस तरह क्यों नहीं लिखता। एक बार यह भी खयाल आया कि मैं खुद लिखूँ। लेकिन खयाल आया और चला गया। मैं द्विज हूँ। बहुत कोशिश करूँ, तो भी उस तरह नहीं लिख सकता। वह चीज़ झूठी होगी। लेकिन मैं दूसरी तरह लिख सकता हूँ, शायद।

बाल्डविन की पुस्तक पढ़ते समय मन में एक अज़ीब सी जलन उठी थी - बाल्डविन के मन की जलन, जो शब्दों के माध्यम से उसने मुझ तक पहुँचा दी थी। कुछ देर मुझे भ्रम रहा कि मेरे अपने मन की जलन है - लेकिन थी नहीं। लिखने बैठा, और मन पीछे को मुड़ा, चलता चला गया उन दिनों को जब इलाहाबाद के गाड़ीवान टोला मुहल्ले में बिजली नहीं आयी थी, और कमीज़ के नीचे धोती बाँधे एक छोटा सा लड़का गलियों में कम ही निकलता था। उसकी विधवा माँ और दो बहनों को बहुत डर था उसके बिगड़ जाने का (और सारे एहतियात के बावज़ूद वह बिगड़ ही गया)। उसके घर की एक बिल्कुल नकली दुनिया थी, जो नाकाम कोशिश करती थी कि उस लड़के के साथ साथ बाहर की दुनिया में जाये, और बाहर की असलियत थी कि हर दम इस दुनिया की दीवारों को चीर कर इसमें घुसी आती थी। लेकिन उसके लिए दोनों ही संसार सच थे - एक में वह रहता था और दूसरे में उसे जाना पड़ता था। (उन दिनों को तीस पैंतीस साल बीत गये हैं और अब एक तीसरी दुनिया भी है, उस लड़के के मन की, और इन तीनों में अब भी मेल नहीं है, शायद कभी नहीं होगा)। और वापस मुड़ कर जाते हुए, अगल बगल देखते हुए, मेरे मन में कोई जलन नहीं उठी, एक बहुत गहरी उदासी मन में घर कर गयी। "अगली बार आग", अग्नी प्रलय, जिसमें कुछ नहीं बचता। पानी कितना भी अधिक हो, उस पर कुछ चीज़ें तैरती रहती हैं, जल में स्वयं भी प्राणी रहते हैं। ठण्ड कितनी भी अधिक हो, बर्फ जब पिघलती है तो कोंपलें फ़िर फ़ूट निकलती हैं। बर्फ जमारती है। पानी गलाता है, सड़ाता है, लेकिन आग जलाती है, झुलसाती है जिससे एक हद के बाद कोई नहीं बचता, कुछ नहीं बचता, केवल वह चीज़ बचती है जिसे वैज्ञानिकों नें "ब्रह्म धूलि" का नाम दिया है। अगली बार आग, अग्नी प्रलय।

अगली बार! लेकिन कोई "अगली बार" आती है क्या? मन में एक बहुत, बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है - हम सब तो जले हुए, झलसे हुए लोग हैं। शम्बूक का वध करने की राम को आवश्यकता नहीं थी, शम्बूक की तपस्या ही उसकी मृत्यु थी। उसे जीवन तो तब मिलता जब राम तपस्या करते, शम्बूक बनने के लिए, लेकिन वैसा हुआ नहीं और शिव के हाथों सृष्टि का सबसे बड़ा पाप हुआ - कितना बड़ा व्यंग है कि अन्यथा जो पाप रहित था, अर्धनारीश्वर था, नर नारी के प्रेम का सर्वोत्तम प्रतीक था, उसी ने प्रेम के देवता को जला कर राख कर दिया।

प्रेम का देवता जल कर राख हो गया और हमारे झुलसे हुए हृदयों पर प्रेम की वर्ष करने की तपस्याएँ विफल हो गयीं। बुद्ध की तपस्या विफल हो गयी और अब लगता है कि गाँधी की तपस्या भी विफल हो गयी। रति है, प्रेम नहीं है। संयम करो बुद्ध ने सिखाया, गाँधी ने भी सिखाया। रति में संयम और अनंग, अशरीरी प्रेम। गाँधी स्वयं मन में शंका लिए हुए ही शहीद हो गये। प्रेम और रति का संयोग - कोई है जो सिखाये। लेकिन झुलसा हुआ मन प्रेम कैसे करे? प्रेम का देवता तो जल कर राख हो गया।

स्त्रियाँ किसी जगह सब एक जैसी होती हैं। अपनी शत्रु स्वंय होने भी एक जैसी होती हैं। और इसीलिए, एक दूसरे के सामने अपना दुखड़ा रोने में भी एक जैसी होती हैं। लेकिन मैंने अपनी माँ को अपना दुखड़ा किसी के आगे रोते नहीं देखा। वह अब साठ साल की है और अब भी सुन्दर है! तैरह चौदह साल पहले मेरी शादी में कुछ लोगों ने दीदी को बड़ी बहन समझा था और माँ को छोटी।

पैंतिस साल पहले कैसी रही होगी? मैं कभी कभी उसे देखता हूँ और सोचता हूँ कि अगर वह डेढ़ सौ साल पहले हुई होती, तो पच्चीस वर्ष की आयु में ज़िंदा ही जला दी गयी होती। लेकिन अब भी, कभी भी वह अपना दुखड़ा नहीं रोती, क्योंकि उसका दुखड़ा तो इतना व्यक्त है, इतना साफ दिखाई देता है कि उसका रोना क्या।

दिल्ली के अजमलखां पार्क में सारा साल लोग शाम को जमा होते हैं। कथाएं होती है, भजन कीर्तन और प्रवचन होते हैं। एक जगह कुछ लोग बैठ कर राजनीतिक सामाजिक प्रश्नों की चर्चा भी करते हैं। उस चर्चा में एक दिन मैंने सुना एक सज्जन कह रहे थे कि सति प्रथा इसलिए थी कि स्त्रियाँ अपने पतियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, ठीक से खिलायें पिलायें, कहीं जहर न दे दें। मेरे जी में आया कि पूछूँ, फ़िर पत्नी के साथ पति को जलाने की व्यवस्था क्यों न शुरु कर दी जाये, ताकि पति लोग अपनी पत्नियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, उन्हें बेमौत न मारें। और, एक बार मैंने अपनी पत्नी को एक पत्र में लिख दिया कि अगर मैं आज मर जाऊँ तो मुझे ज़रा भी रंज नहीं होगा। मेरी मंशा थी कि मैंने जिन्दगी को भरपूर जिया है। इसलिए जब भी मौत आयेगी, मुझे अफसोस नहीं होगा (गो, अब कभी कभी लगता है कि पाँव उतने मजबूत नहीं रहे)। बहरहाल, पत्नी ने उत्तर दिया कि हां, तुमको क्यों रंज होगा, तुम्हें तो छुट्टी मिल जायेगी, बिलखना तो होगा मेरे बच्चों को। स्वाभिमानिनी है, इसलिए अपनी बात नहीं कही। लेकिन हिन्दुस्तानी औरत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है। पति के अमंगल का भय बूत की तरह उसके सर पर चढ़ा रहता है। और इस भय ने हिन्दुस्तानी औरत को तो भीरू बनाया ही है - गो, अब भी, समान स्थितियों में, हिन्दुस्तानी औरत शायद हिन्दुस्तानी मर्द से अधिक साहस का परिचय देती है - लेकिन इससे भी अधिक, उसने सारी कौम को नपुंसक बना दिया है। जिजीविषा का अर्थ हो गया है किसी भी तरह, किसी तरह की हालत में शरीर से चिपके रहना।

मैं जानता हूँ कि लोग राष्ट्रीय आंदोलन का हवाला देंगे।मैंने पंद्रह साल की उम्र में हथकड़ी पहनी थी और बीस साल तक मैंभी दृष्टिभ्रम का शिकार रहा। दिन्दुस्तान के राष्ट्रीय आन्दोलन का एक बड़ा हिस्सा केवल एक दृष्टिभ्रम था। हमारे आंदोलन जब दिखावे से आगे बढ़ते थे तो आत्मपीड़न बन जाते थे। गाँधी जी के बावजूद, हिन्दुस्तान ने अहिंसा को स्वेच्छा से नहीं, मजबूरी में स्वीकार किया था। और मुझे अब इसमें ज़रा भी संदेह नहीं रह गया है कि मजबूरी की अहिंसा बहुत गन्दी चीज़ है। मजबूरी की अहिंसा अगर कायरता नहीं होती, तो आत्मपीड़न होती है। और राष्ट्रीय आंदोलन की परिणति हुई हत्या, लूट, बलात्कार और आगजनी में, ऐसी जो इतिहास में अभूतपूर्व थी। गाँधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के तीस वर्ष बाद हिंदुस्तानी आदमी ने लड़ना नहीं सीखा - सीखा अकेले आदमी के पेट में छुरा भोक देना। गाँधी स्वयं खोटा सिक्का हो गये। मजबूरी की अहिंसा वाले राष्ट्रीय आंदोलन के "चौधरी" ज्यादा अक्लमंद थे। उन्होंने मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। डेढ़ सौ साल बाद जूआ उतरा जो पिछले अठारह सालों से बधिया बैल फ़िर पसरा हुआ जुगाली करता रहा है। कभी कभी जोर से सिर हिला कर झौंकारना और निरीह बच्चों को सींगे मार कर अपने पुसत्व का प्रमाण देता रहा है, और जब भी किसी सांड ने आ कर सींग अड़ाये हैं, तो जनखों की तरह गुहार लगाता रहा है - हाय, देखो यह मुझे छेड़ता है। और दुनिया हँसती रही है, क्योंकि बधिया बैल और बधिया कौम की हरकतों पर हँसा ही आ सकता है।

मैं अपनी मां को देखता हूँ जिसकी आँखों का सबसे बड़ा भय है कि पति की मृत्यु देखने वाली उसकी आँखों को कहीं बेटे की मृत्यु भी न देखनी पड़े। अपनी पत्नी को देखता हूँ - पति चाहे जैसा भी हो, पति है, उसका सहारा न छूटे। यह भी देखता हूँ कि वह अपने बेटे को किस तरह बाँधे रखना चाहती है, हर खतरे से दूर रखना चाहती है। खीझता हूँ कभी कभी, बहुत खीझता हूँ। लेकिन उनकी कितनी पुरखिनों को जिंदा जला दिया गया होगा - और जलाने वाले उनके बेटे, भाई, बाप और ससुर रहे होंगे। मेरे मन में क्रोध नहीं उठता, जलन नहीं होती, एक बहुत गहरी उदासी घर की जाती है।

गाड़ीवान टोला की उस गली को कैथाना कहते थे। गली में कैथा का एक पेड़ था और बचपन में मैं कैथाना की व्युत्पत्ति कैथा से हुई समझता था - कायस्थ और कैथाना का सम्बंध मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ। कायस्थ, बनिये, ब्राह्मण, एक दो परिवार ठाकुरों के, एक नाई और एक कहार - बस। मेरे देखते देखते भी द्विज परिवारों का धन बढ़ा। एक दो परिवारों की हालत अगर कुछ बिगड़ी भी, तो कायस्थ की जगह बनिये ने ले ली। सारी गली में पक्के मकान केवल द्विजों के पास थे (गो कुछ द्विज कच्चे घरों में भी थे), और जब बिजली आयी तो उन्हीं घरों में, जब रेडियो आये तो उन्हीं घरों में।

कहार का नाम था महादेव और कहारिन का नाम मुझे नहीं मालूम। बरसों तक वह औरत मेरे घर काम करने दिन में दो बार आती रही, और उसका नाम मुझे नहीं मालूम। बहुत ही व्यवहारिक, आती, काम करती (बल्कि सारा परिवार काम करता, कभी इक्ट्ठे, कभी सभी घरों में बंट कर) और चली जाती। उसे खुलते हुए मैंने एक बार ही देखा। घर में कोई शादी थी और लड़कियां बिना किसे बाजे के ही बैठ कर गा रहीं थीं। दबे दबे गले से गाने वाली शहरी, द्विज लड़कियां। कहारिन आयी, तो काम खतम करके अचानक बोली, "जरा खुल के गाओ।" और स्वयं स्टूल खींच कर उस पर ढोलक की थाप देने लगी, "किन्ने लियो री गोरी, तिहारो रस।" "अरे कहारिन तो छिपी रुस्तम है" किसी ने कहा। और कहारिन उठ गयी। बस। न उसके पहले कुछ, न बाद में।

व्यक्ति, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश, भारत - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

उसका एक लड़का था, मेरी ही उम्र का, छोटेलाल। माँ बाप से ले कर गली के सभी लोग उसे "छोटईया" कहते थे। छोटे हर बात में मुझसे तेज था, सिवाय पढ़ाई के। उसके स्कूल जाने की नौबत ही नहीं आयी, परिवार में किसी भी बच्चे के स्कूल जाने की नौबत नहीं आयी। दौड़ना, कबड्डी, या गेंद बल्ला खेलना, पेड़ पर चढ़ना, कुश्ती लड़ना या तालाब के उस पार पत्थर फैंकना। आस पास का कोई भी लड़का इन सब में छोटे का मुकाबला नहीं कर सकता था। सत्रह साल की उम्र में, जब दुनिया के साथ ज़ोर आज़माने के लिए मैंने घर और शहर छोड़ा, तो वह एक मुसलमान युवक रफ़ीक खां का नौकर-मुसाहब बन गया था। रफ़ीक का बाप काफ़ी संपत्ति छोड़ गया था, और रफ़ीक का एक ही काम था - आसपड़ोस की तमाम नौजवान लड़कियों से इश्क लड़ाना। छोटे मुहल्ले के सभी घरों में आता जाता था (कहारिन का लड़का था) और इसलिए इन प्रेम प्रसंगों के लिए उससे अच्छा दूत कोई और नहीं मिल सकता था। रफ़ीक 1947 में पाकिस्तान चला गया। और छोटे?

छोटे कहीं बरतन मांजता होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता। लेकिन फ़िर करता क्या होगा? जेबें काटता हो, यह मुमकिन है, क्योंकि उसके लिए कौशल की ज़रूरत होती है, और शिकार को बेवकूफ बनाने का एहसास भी होता है। यह भी संभव है कि रात बिरात किसी अकेले आदमी की साईकल-घड़ी छीन लेने वाले किसी गिरोह में शामिल हो गया हो। तब वह शराब नहीं पीता था लेकिन अब मुमकिन है कि अब भट्ठी लगा कर, शराब बेचता भी हो, पीता भी हो।

हिंदुस्तान में छोटेलाल जैसे लोगों के सामने विकल्प दो ही होते हैं - अपने मन को मार कर बड़े घरों के बर्तन मांजे, या फ़िर अपराध करे, असमाजिक या समाज-विरोधी बने, क्योंकि उसकी क्षमता के उपयोग का समाज में कोई मार्ग नहीं है। अमरीकी नीग्रो के पास एक तीसरा विकल्प भी है। गोरों ने उसके लिए जो स्थान निर्धारित किया है उसे अस्वीकार करके, आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए जीना। लेकिन हिंदुस्तान के शूद्र के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है - उसने हज़ारों साल पहले अपने समाज में अपनी हीन स्थिति को स्वीकार कर लिया था।

गाड़ीवान टोला में मेरे मकान के पिछवाड़े खुली जगह में एक नीम का पेड़ था और पेड़ के नीचे एक घरौंदा था - पाँच-छः फुट चौड़ा, पाँच-छः फुट लम्बा। उस घरौंदे में एक परिवार रहता था। मैं जब बहुत छोटा था तब उस परिवार में छः सदस्य थे। "टेकइया" (मैं अनुमान से ही कह सकता हूँ कि उसका नाम टेकचन्द होगा) और "गिलहरी"। दोनो अंधे थे। गेल्हर का काका बदलू वहीं बूढ़ा होकर मरा था औरउसे बाजे गाजे के साथ ले गये थे। बहुत पहले गेल्हर के भाई भावज भी वहीं रहते थे, पास की खुली ज़मीन पर। भावज का नाम तो खैर मालूम भी क्या होता, भाई का नाम भी मैं भूल गया हूँ। तीस साल तक मैंने उस अंधे दम्पत्ति को उस घरौंदे में रहते देखा। वक्त ने तीनों के ही चेहरों और शरीर पर जो छाप डाली, उसके अलावा तीस साल तक कोई फर्क नहीं पड़ा। गिलहरी के बच्चे होते रहे, मरते रहे। केवल एक लड़की ही जीवित रही - बड़ी बड़ी, रसीली आँखों वाली ललिता। एक बार बचपन में उसकी भावज को एक साफ़ रंगीन साड़ी पहने देख (जो शायद किसी बड़े घर से मिली थी) मैं उसे पहचान ही नहीं सका था। उसके कुछ दिन बाद ही उस खुली जगह में उसे सांप डस गया। उसके मर जाने पर उसका पति भी कहीं चला गया। ललिता का ब्याह हो गया और अंधे पति पत्नी अकेले रह गये।

टेकचंद कम बोलता था, बहुत ही कम। गेल्हर उतनी ही वाचाल थी। औरों की नहीं जानता, मुझे वह चाल से ही पहचान लेती थी। मेरे आश्चरय प्रकट करने पर हँस कर कहती, "हे ल्यो, क्या मैं आंधर हौं कि न पहिचानिहौं!" यह उसका प्रिय मज़ाक था! कभी कहीं खुशी का मौका होता, तो मगन हो कर गाती, "लायो महाराजा हमें छल करके।" यह उसका प्रिय गीत था। कंट्रोल को कंटोर और इंसपेक्टर को निसपिट्टर कहती थी। सावन के महीने में उसके नीम पर झूला पड़ता, और आस पड़ोस की औरतें इक्टठी हो कर झूलतीं और सावन गातीं। मुझे ऐसा याद पड़ता है कि मैं उसे हमेशा काली धोती पहने हुए ही देखा। अब सोचता हूँ कि शायद जहां से भी उसे धोती मिलती होगी, उसे वह काला रंग लेती होगी - साबुन-सज्जी की बचत।

कोई अतीत नहीं, कोई भविष्य नहीं, और कोई वर्तमान भी नहीं। मन के अंदर के न जाने किस कोने से वह अपनी हँसी का बहाव निकालती थी - अब अपने साथ वैसा छल कर पाती होगी क्या?

इतना भी मुझे याद पड़ता है मुझे कि उसकी भावज जब ज़िन्दा थी तो कभी कभी घर आ कर रोती थी - उसका पतिदिन भर जो कमाता था, शाम को ताड़ी पी लेता था, ऊपर कर्ज कर लेता था। रात को घर (!) आ कर उसे पीटता था, पैसे छीन लेता था।

और अब भी मां के पास अक्सर औरतें आती हैं, हरिजन औरतें, शूद्र औरतें, और सबका एक ही किस्सा है, सबका एक ही दुश्मन है - दारू। अपनी सारी ज़िंदगी में मेरी दो ही हरिजन डाक्टरों से भेंट हुई है। एक होमयोपैथी करते हैं, दूसरे के पास भी कोई डिगरी नहीं है, पुराने किसी नियम के अंतर्गत डाक्टरी करने का या कम से कम दवाईयां बेचने का लैसन मिला हुआ है। उनकी दुकान पर औषधि निर्माताओं की प्राचार सामग्री प्रचुर मात्रा में देखी जा सकती है - रंग बिरंगे फोल्डर, कार्ड, सोख्ते, लेकिन सिर दर्द की भी दवा नहीं मिलती। मरीज़ आते हैं, डाक्टर कोदिखाये बिना ही अंदर चले जाते हैं। एक बार कुछ परेशान से दिखे, इलाके में नया मजिस्टर आया था जिसके बारे में प्रसिद्ध था कि वह बड़ा सख्त है। लेकिन दूसरे दिन उनका चेहर फ़िर खिला हुआ था, थानेदार की मार्फत सारा मामला तय हो गया था।

डाक्टर साहब इलाके के हरिजनों के नेता हैं, पिछली बार चुनाव भी लड़े थे, काफ़ी वोट मिले थे, लेकिन हार गये, कयोंकि कांग्रेस का उम्मीदवार उनसे बड़ा और ज्यादा दबदबे वाला चौधरी था। डाक्टर साहब को द्विजों से कोई लगाव नहीं है, लेकिन बस ज़िंदगी ही ऐसी है।

अमरीकी नीग्रो को शकल से पहचाना जा सकता है! लेकिन इसमें नीग्रो की मुक्ति भी निहित है - उसे गोरा बनने की चेष्ठा करने का लोभ नहीं होता। वह अपने पुरखों की गुलामी को स्वीकार कर सकता है, अपनी वर्तमान स्थिति के तथ्य को स्वीकार कर सकता है, और गोरों से कह सकता है कि हमें अपने को नहीं सुधारना, तुम्हें अपने को शिक्षित करना है, तुम्हें नैतिक बनना है! सवाल यह नहीं है कि तुम इसे स्वीकार करो, सवाल यह है कि हम नीग्रो लोग तुम्हें स्वीकार करें।

लेकिन हिंदुस्तानी शूद्र के साथ ऐसा नहीं है। गोरे लोग समाज में नीग्रो को जो स्थान देना चाहते हैं या देते हैं, उसे वह स्वीकार नहीं करता। पिछले दिनों मुझे यह जान कर निजि क्षति का अनुभव हुआ कि अमरीकी नीग्रो लेखिका लोरायन होसबरी की कैंसर से मृत्यु हो गयी। कई वर्ष पहले मैंने उनका एक वाक्य पढ़ा था जिसे मैं पहले भी एक-आध बार उद्धत कर चुका हूँ और यहाँ फ़िर करना चाहता हूँ - "यह सच है कि साहित्य मात्र का उद्देश्य मानव जाति में समाहित होना है, लेकिन इसके पहले ज़रूरी है कि दुनिया के दबे हुए लोग अपने को पहचानें।"

यह पहचान ही ऐसा काम है जो भारतीय शूद्र के लिए लगभग असंभव जैसा कठिन है। हज़ारों साल पहले ही उसने द्विजों द्वारा अपने लिए निर्धारित स्थान को स्वीकार कर लिया था। भरी दुपहरिया में मेरी जमादारनी प्यासी रह गयी, लेकिन उसने अपने हाथ से मेरे गिलास में पानी ले कर पीना स्वीकार नहीं किया। वह अब भी जमादारनी है जिसका काम है पाखाने साफ़ करना और कूड़ा उठाना। अस्पृश्यता निवारण कानून! उसके विरासत में उसे यह ज़िम्मेदारी मिली है कि दूसरों की गन्दगी साफ़ करे। उसके बाद यही काम उसके बेटे, बेटियों, बहुओं को। इस सिलसिले के चलते क्या अस्पृश्यता निवारण कानून जैसे हज़ारों कानूनों का भी कोई मतलब हो सकता है?

लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हिंदुस्तान का शूद्र सिर उठा कर यह नहीं कह सकता कि हां मैं शूद्र हूँ और तुमसे किसी तरह कम नहीं हूँ, किसी तरह छोटा नहीं हूँ। वह अपनी स्थिति को बदलना भी चाहता है तो द्विज बनने की चेष्ठा करता है, द्विज वह बन नहीं सकता इसलिए अंततः आत्मसम्मान भी प्राप्त नहीं कर सकता। मन ही मन उसके अंदर जलन और हीन भावना बनी रहती है, बढ़ती जाती है। मेरे एक मित्र ने बताया जो शूद्र हैं और साम्यवादी नहीं हैं कि चीनी आक्रमण के समय बहुसंख्यक शूद्र मन ही मन खुश हुए थे कि चलो अच्छा है, द्विजों की सत्ता समाप्त होगी। लेकिन इस बात के अलावा कि आज के चीनी आक्रमण और दो सदी पहले के अंग्रेज़ी आक्रमण में कोई विषेश अंतर नहीं है और अगर दुर्भाग्यवश भारत फ़िर अगर कभी गुलाम हुआ तो नये शासक भी द्विजों के माध्यम से ही शासन करेंगे, यह तथ्य उससे भी बड़ा है कि शूद्रों में देशद्रोह की भी क्षमता नहीं है, देशद्रोह भी द्विज ही करते हैं। हिंदुस्तान का शूद्र तो बिल्कुल ही झुलस गया है, स्वतंत्र रूप से कोई भी काम करने की क्षमता उसमें नहीं है।

इन्हीं मित्र ने पिछले दिनों एक खँड-काव्य लिखा। कोई ऐसी असाधारण रचना नहीं फ़िर भी ऐसी रचनाएँ द्विज लेखक लिखते रहते हैं और वह छपती रहती हैं। लेकिन मेरे इन मित्र की कविता नहीं छप रही है।

मेरी नज़र में इससे बड़ा एक सवाल और है। कविता के कुछ अंश उन्होंने मुझे सुनाये। मैंने जब उनसे सीधा सवाल किया कि जो आप का प्रत्यक्ष अनुभव है, जो कुछ आप ने भोगा है, उसे ले कर क्या आप ने कभी कुछ लिखा है, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। नहीं लिखा, क्यों कि शूद्र होने का जो अर्थ है उसे शारीरिक स्तर पर स्वीकार और नैतिक स्तर पर अस्वीकार करने के बजाय, वे मूलतः उसे नैतिक स्तर पर स्वीकार और शारीरिक स्तर पर अस्वीकार करने की चेष्ठा करते हैं।

जले हुए, झुलसे हुए लोग, बिगड़ती नस्ल। लेकिन दिल्ली में युगोस्लाविया के एक भूतपूर्व राजदूत ने, जो कला-मर्मज्ञ भी हैं, कहा कि हिंदुस्तान में उन्हें किसान मज़दूर औरतें दिखाई ही नहीं दीं, हर हिंदुस्तानी औरत की चाल रानियों जैसी होती है। आग में झुलसे हुए लोग - तपा हुआ सोना। मुश्किल यह है कि आदमी तो असंख्य धातुओं का बना है। जब वह स्वयं अपनी शुद्धि करता है, तब भी अक्सर बात बिगड़ जाती है। जब वह शुद्ध किया जाता है, तो हर हालत में, अनिवार्य ही, इसका एक ही परिणाम होता है - आदमी का झुलस जाना। संस्कारों में हमेशा ही एक पीड़ा निहित होती है, और पीड़ा सहने की सामर्थ्य आ जाये, तो मनुष्य को ऐसी भंगिमा प्रदान करता है, जो बड़ी ही गरिमामयी प्रतीत होती है। लेकिन निरपेक्षता और जड़ता का अंतर बहुधा बड़ा बारीक होता है। निरपेक्ष बनते बनते हिंदुस्तानी आदमी जड़ हो गया है, ब्रह्मचारी तो नहीं बन सका, नपुंसक बन गया। हज़ारों साल के संस्कारों ने हिंदुस्तानी औरत को गजब की चाल ढाल प्रदान की है, किसी हद तक हिंदुस्तानी मर्द को भी। लेकिन अंदर से मर्द-औरत दोनों ही झुलसे हुए हैं, और यह झुलसे हुए मन बिल्कुल सड़ गये हैं।

व्यक्ति, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश, भारत - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

अतीत और वर्तमान पर नज़र डालता हूँ, तो एक गहरी उदासी मन में घर कर जाती है। भविष्य की ओर देखने का साहस एकत्र करने में मन एक बार कांप जाता है। हिंदुस्तान में जिजीविषा का अर्थ बदल गया है - किसी भी तरह शरीर से चिपके रहो। बचना फ़िर भी नहीं होता। हर साल लाखों आदमी हैजे में मरते हैं, चेचक से मरते हैं, निरंतर भूखे या अधपेटे रह कर तिल तिल मरते हैं। लेकिन हैज़ा और चेचक और भूख को उन्होंने स्वीकार कर लिया है। चेचक निकली है - शारदा माता आयी है। पानी नहीं बरसा - यज्ञ करो। इन्हें खतम करने की कोशिश में खतरा है, मौत में खतरा है। हिंदुस्तानी आदमी पीठ पर छुरा खाता है, पीठ पर छुरा मारता है, छाती पर नहीं। और कहीं कोई संकल्प नहीं है, निष्ठा नहीं है, निर्णय नहीं है। लेकिन उदासी के इस बहुत गहरे दलदल में फँसे हुए भी हार नहीं मानी जा सकती। हार मान लेने पर तो एक ही मार्ग शेष रहता है - आत्महत्या। किंतु हार न मानने का मतलब होता है ज़िन्दगी को एक स्थायी जोखिम में डाल देना। तमाम झूठे सहारों को छोड़ देना, चाहे वे इतिहास और परम्परा के हों, चाहे आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा के हों। हार न मानने का मतलब है जीवन की तमाम असुरक्षाओं को स्वीकार करना और इन असुरक्षाओं से लड़ते हुए जीवन के अंकुर को उगाना और पोसना। बहुत मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि हर तरफ सुक्षा का आश्वासन है - हमारी शरण में आओ। जाति की सुरक्षा, धर्म की सुरक्षा, समाजिक संगठन की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, अंध विश्वासों की सुरक्षा। न जाने कितने, कैसे कैसे अंध विश्वास हैं।हमारी शरण में आओ! सुरक्षा नहीं है। कहीं किसी में नहीं है। लेकिन दिल बहलाने को जन्नत का खयाल तो अच्छा है ही। और जीवन के साथ जीवन की असुरक्षाओं को स्वीकार करने की तकलीफ़ से आदमी बच जाता है।

पचीस वर्ष की आयु में विधवा हो कर जिस स्त्री ने अपनी संकल्प शक्ति के सहारे ही खुद पढ़ा लिखा और प्राथमिक पाठशाला में नौकरी करके बच्चों को पाला पढ़ाया, उसी का लड़का जब जीवन के परिचित दायरे से बाहर निकल गया, स्वीकृत मान्यताओं के दायरे से बाहर निकल गया, तो उसकी तर्क बुद्धि ने हार मान ली। अब वह नियमित रूप से मासिक "कल्याण" पढ़ती है और ज़िन्दगी के हर सवाल का उसके पास एक ही उत्तर है - जो कुछ करता है, ईश्वर करता है।

लेकिन मैं हार नहीं मान सकता। जिन कटघरों में हम जन्म लेते हैं और पलते हैं, उनसे बाहर निकलने की चेष्ठा करने वाले, उन कटघरों को तोड़ने की चेष्ठा करने वाले, हार नहीं मान सकते। उनके सामने तो एक ही मार्ग है - इन कटघरों को तोड़ना ताकि इनसे बाहर निकल कर जीवन की समस्याओं का, जीवन की असुरक्षाओं का सचमुच सामना कर सकें, उन पर विजय पाने का वास्तविक प्रयास कर सकें।

यह लड़ाई जितनी बाहरी शक्तियों से है, उतनी ही अपने खुद अपने-आप से भी है - अपने संस्कारों से, न जाने कितनी ऐसी बातों से जिन्हें हम मान कर चलते हैं, जिन्हें कसौटी पर कसने का खयाल नहीं आता, लेकिन जो अंध विश्वासों पर आधारित हैं, केवल अंध विश्वासों पर, ऐसे अंध विश्वासों पर जिन्हें सामाजिक मान्यता मिली हुई है। और यह लड़ाई हर वक्त है, हर जगह है, विचारों भावनाओं में, निजि और सार्वजनिक आचरण में, संगठित और स्वतःस्फूर्त व्यवहार में, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंधों में।

हार हो या जीत, यह लड़ाई तो करनी ही है। हर हालत में लगातार करनी है, क्योंकि यह तो जीवन की स्वीकृति का अनिवार्य परिणाम है। हारना मृत्यु नहीं है, हार मानना मृत्यु है, इसलिए लड़ना ही है, जो भी हो लड़ना ही है।

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