नदिया किनारे

डा. सुनील दीपक, 26 अगस्त 2021

हमारा छोटा सा शहर स्किओ पहाड़ों से घिरा है। शहर के बीच में भी कुछ पहाड़ियाँ हैं। आसपास में पहले कुछ छोटे पहाड़ हैं - मग्रे, रागा, नोवेन्यो और सूम्मानो। इनके पीछे बड़े पहाड़ हैं जिन्हें छोटे दोलोमाईट कहते हैं और जिनमें सबसे भव्य है पाजूबिओ पर्वत जिसकी बर्फ से ढकी चोटियाँ बादलों के पीछे से शहर को निहारती रहती हैं। यह सभी इटली के उत्तरपूर्वी एल्प पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं।

स्किओ की लेओग्रा नदी - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

घर के पीछे एक बरसाती नदी बहती है लेओग्रा, सड़क की सतह से करीब छः-सात मीटर नीचे। नदी के शहर में घुसने से कुछ पहले ही इससे एक नहर निकाली गयी है, इसलिए अगर कुछ सप्ताहों तक बारिश नहीं आती तो वह नदी से नाला बन जाती है। नगरपालिका वाले सतर्क हैं, नदी में किसी तरह का प्रदूषण नहीं होने देते, इसलिए उसका पानी हमेशा स्वच्छ निर्मल दिखता है।

नदी का एक पुल भी घर के करीब है, जिसे नगरनिगम वाले सारा साल रंग बिरंगे फूलों के गमलों से सजा कर रखते हैं। शाम को जब सूरज पाजूबिओ की चोटियों के पीछे जाता है, तो अक्सर लोग पुल पर खड़े हो कर संध्या के रंगीन क्षितिज को नदी के जल में प्रतिबिम्बित देखने को रुक जाते हैं।

स्किओ की लेओग्रा नदी - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

पुल के पार, नदी के किनारे पर द्वितीय विश्वयुद्ध में मरने वाले जलसैना के नाविकों की स्मृति में एक पार्क बना है जहाँ नाव की पाल की आकृति वाला एक स्मारक बना है। गर्मियों में, जून से सितम्बर के प्रारम्भ तक, इस पार्क में एक रेस्टोरैंट चलता है। वहाँ कभी कभी गायक व संगीतकार भी अपना कार्यक्रम करने आते हैं और कोई फुटबॉल का मैच हो तो उसे बड़े परदे पर देख सकते हैं। वहाँ छोटे बच्चों के खेलने की जगह भी है। इस सब की वजह से सप्ताहअंत में पार्क में बहुत भीड़ होती है।

मेरी पोती बुलबुल जब आती है तो मैं उसे पार्क में खेलाने अवश्य ले कर जाता हूँ। पिछले साल हम दोनों पुल पर से जा रहे थे तो उसने मेरा ध्यान आकर्षित किया कि नीचे नदी में दो बतखें तैर रहीं थीं, कुछ सफेद बगुले भी थे और एक सलेटी रंग वाला सुन्दर बगुला भी था। उनको देख कर हैरानी भी हुई और खुशी भी। बहुत साल पहले नदी में बहुत से बतखें, हँस, बगुले आदि होते थे लेकिन फिर वे सब जाने कहाँ चला गये थे, बस कभी कभार एक-दो बगुले ही दिखते थे।

तब से हर बार जब मैं और बुलबुल पार्क जाते तो हमेशा पुल पर रुक कर उन बतखों के जोड़े को खोजते और बुलबुल उनको देर तक मंत्रमुग्ध हो कर निहारती रहती। दो सप्ताह पहले बुलबुल लौटी तो हम लोग फिर पार्क गये, बहुत खोजा लेकिन इस बार बतखें नहीं दिखीं, तो वह मायूस हो गयी। मैंने उसे बताया कि जब सर्दियाँ आती हैं तो पक्षी ठँडी जगह छोड़ कर दक्षिण में किसी गर्म जगह की खोज में चले जाते हैं, फिर बसंत में वापस लौट आते हैं, तो उसकी मायूसी कुछ कम हुई। अभी छोटी है, शायद इसलिए उसने पूछा नहीं कि पिछली सर्दियों में वह बतखें यहाँ क्यों रुकी थीं, किसी गर्म देश में क्यों नहीं गयी थीं।

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मुझे यूरोप में रहते हुए एक जमाना बीत गया। जब इंटरनेट नहीं था तो भारत से, परिवार से, दोस्तों से बिलकुल कट गया था। शुरु में तो टेलीफोन करना भी एवरेस्ट चढ़ने से कम नहीं लगता था, बस चिट्ठियाँ थीं जिनसे समाचार मिलते थे और रिश्ते बने रहते थे। इंटरनेट ने और डिजिटल तकनीकी ने सबसे बातचीत करना, समाचार पत्रिका पढ़ना,संगीत सुनना सब कुछ को बहुत आसान बना दिया। कभी कोई मुझसे पूछता कि अब मुझे यहाँ कोई कमी है तो मैं कहता कि यारों मित्रों से गप्प मारना, बातें करना, गाने सुनना सुनाना, बस इन्हीं बातों की कमी मुझे खलती है।

भारत के रेडियो की कमी भी लगती है। यहाँ ईंग्लैंड, ग्याना, फिजी आदि के हिंदी रेडियो तो सुनाई देते हैं लेकिन कभी कभी मन करता है कि किसी तरह से दिल्ली के एफएम रेडिओ सुनने का मौका मिल जाये - "निजामुद्दीन और आश्रम वाला सारे रास्ते का ट्रैफिक ब्लाक हो रहा है ... लाजपत नगर में एक एक्सिडैंट की वजह से मैट्रो सर्विस रोक दी गयी है ... झुमरी तलैया से हमारे एक श्रोता ने माँग की है कि ...", जैसी साधारण बातें सुनने का मन करता है, जिनमें जीता जागता रोजमर्रा का जीवन मिले। लेकिन भारत सरकार के नियम इंटरनेट से इस तरह के लाईव रेडियो प्रसारण की अनुमति नहीं देते।

हर रोज, शाम को सैर करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। सैर के लिए घर के आसपास तीन-चार जगहें हैं, जिनमें मेरी सबसे प्रिय जगह है नदी के किनारे। पुल के पास से करीब एक या डेढ़ किलोमीटर का हिस्सा है जहाँ पैदल रास्ता है और मेपल के पेड़ कतार में लगे हैं। सड़क साथ में है लेकिन उस पर कोई इक्का दुक्का कारें ही गुजरती हैं। बस कुछ साईकल वाले होते हैं और कुछ सैर करने वाले। अगर ऊँचे नीचे रास्ते और पत्थरों पर चलने में कठिनाई नहीं हो तो नीचे नदी के स्तर पर जा कर भी सैर की जा सकती है।

शाम को सैर के समय मुझे हिंदी फिल्मों के गाने सुनना अच्छा लगता है। मैंने गानो की अपनी कुछ प्ले लिस्ट बनाई हुईं हैं, इसलिए हर रोज यह निर्णय लेना होता है कि आज कौन सी प्ले लिस्ट को सुना जाये। अगर आप ने प्ले लिस्ट बनायी हों तो मालूम ही होगा कि पहले से जानना कि कौन सा गाना आयेगा, इसमें उसका कुछ आनंद कम हो जाता है। जब उस प्ले लिस्ट को दस पंद्रह बारी सुन चुके हों तो वह आनंद और भी कम हो जाता है।

खैर, पिछले महीने से इंटरनेट के माध्यम से मुझे भी भारतीय संगीत और लोगों की बातों को रेडियो की तरह सुनने का मौका मिलने लगा है। एक नया एप्प आया है जिसका नाम है "क्लब हाउज"। इस पर लोग अपने "कमरे" खोलते हैं और वहाँ आपस में मिल कर बातें करते हैं, गाने गाते या बजाते और सुनाते हैं, कुछ कमरों में कहानियाँ पढ़ी जाती हैं, कुछ लोग शेरो शायरी करते हैं। अन्य तरह के कमरे भी हैं जहाँ लोग राजनीति या अन्य विषयों पर भी बातें करते हैं। मेरी दिलचस्पी तो गानों, फ़िल्मों, शेरो शायरी में ही है, मैं अन्य तरह के कमरों में नहीं रुकता।

क्लब हाउस की वजह से शाम को सैर को नया आनंद मिल गया है और प्ले लिस्ट के गाने सुनने से छुट्टी मिली है। प्रतीक्षा रहती है कि शाम आये और लोगों की बातें सुनी जायें। घर से निकलता हूँ तो पहले देखता हूँ कि किस कमरे में कौन सी बातचीत चल रही है। जहाँ गीत, संगीत, कविता, कहानियों की बातें हो रहीं हों, वहाँ रुक जाता हूँ। शहर की पहाड़ी सड़कें ऊपर नीचे जाती हैं, तो सैर में अक्सर साँस फूल जाता है और पसीने से तर हो जाता हूँ, इसलिए मैं स्वयं तो बोलना नहीं चाहता लेकिन लोगों को शालीनता और अदब से एक दूसरे से बातें करते सुनता हूँ तो बहुत अच्छा लगता है। लगता है कि किसी पुराने समय की या मुशायरे में पहुँच गया हूँ। जान पहचान न भी हो तो जिनकी बातें हर दिन सुनी जायें, वह अपने आप ही मित्र से महसूस होने लगते हैं।

स्किओ की लेओग्रा नदी - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

अक्सर इन कमरों में पुराने गानों के प्रेमी मिल जाते हैं। कुछ लोगों को तो पुरानी फिल्मों तथा गानों के बारे में इतनी जानकारी है कि अचरज होता है, उनकी बाते सुनने में मेरी सैर का समय ऐसे बीत जाता है कि मालूम ही नहीं चलता। जैसे कि जयपुर के एक सज्जन हैं पवन झा, पुरानी फिल्मों तथा गानो के बारे में जीते जागते एनसाईक्लोपीडिया हैं। एक अन्य महोदय हैं अनन्त , जो कवि हैं और गाते भी हैं और जिनकी पत्नी वाणी भी बहुत सुन्दर गाती हैं, उनके आयोजित संगीतमय कमरे मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। सुन्दर गाने वाले तो और भी बहुत हैं। इनसे पहले जान पहचान नहीं थी, हरदिन क्लब हाउज पर सुन सुन कर लगता है कि सब पुराने मित्र हैं।

कुछ दिन पहले ज्ञानदत्त पाँडेय जी के ब्लाग से मालूम चला कि क्लब हाउज जैसा काम ट्विटर से भी हो सकता है। इंटरनेट पर खोजा तो पाया कि ऐसे अन्य एप्प भी बन रहे हैं। इस बारे में सोचूँ तो बहुत अचरज होता है कि दो तीन दशकों में दुनिया कितनी बदल गयी, क्या जाने अगले दशकों में अन्य कैसे परिवर्तन आयेंगे।

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बुलबुल को कह तो दिया था कि बतखें किसी गर्म जगह पर चली गयीं होंगी, पर मन में यह प्रश्न घूम रहा था कि वह कहाँ गयी होंगी। जब भी शाम को सैर के लिए नदी की ओर जाता तो उनको खोजता रहता। कुछ दिन पहले आखिरकार उनमें से एक बतख दिखी, तो मन में चैन आया कि चलो ठीकठाक हैं। लेकिन उसके बाद से जब भी देखा तो हमेशा एक ही बतख दिखी, तो फिर से चिंता होने लगी कि दूसरी को क्या हुआ? कल शाम को सैर से लौटा तो पत्नी को बतखों के बारे में बताया। वह बोली कि मादा बतख ने अवश्य अँडे दिये होंगे, इसलिए बारी बारी से माँ और पिता की अँडे सेने की ड्यूटी लगती होगी और दूसरी बतख खाना खाने नदी में अकेली जा रही होगी।

स्किओ की लेओग्रा नदी - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

यानि कुछ दिनों में बतख के छोटे छोटे चूजे देखने को मिलेंगे, यह सोच कर मन गदगद हो गया। बुलबुल को भी बहुत अच्छा लगेगा।

फिर मन में आया कि अगस्त समाप्त होने को है, अभी से रातें ठँडी हो जाती हैं, तापमान बारह-पंद्रह डिग्री तक चला जाता है। तो अब चिंता हो रही है कि इन बतखों ने इतनी देर से क्यों अँडे दिये? अचानक सर्दी आ जायेगी तो बेचारे चूजे ठँड से मर तो नहीं जायेगे? और अगर बेचारे चूजों को कुछ हो गया तो बुलबुल को कितना बुरा लगेगा? यानि पहले केवल बतखों की चिंता करनी पड़ती थी, अब उनके साथ साथ उनके चूजों की चिंता भी करनी पड़ेगी। खैर आगे जो होगा, आप को समाचार देता रहूँगा।

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मैं जब भी सैर के लिए निकलता हूँ, अक्सर नदी की, पहाड़ों की, आसमान की तस्वीरें खींचता रहता हूँ। इस पोस्ट के साथ उनमें से ही कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं।

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