तारों की खोज में

डा. सुनील दीपक, 02 अक्टूबर 2021

उस समय शायद छः या सात वर्ष का था, हम लोग नाना नानी के साथ पुरानी दिल्ली में रहते थे। वहाँ सब घरों की छतें जुड़ी हुईं थीं और एक छत से दूसरी छत पर जाना बहुत आसान था, आप ऊपर ही ऊपर से सारी गली का चक्कर लगा सकते थे। तब तक घर में बिजली नहीं आयी थी, राशन में मिले मिट्टी के तेल की लालटेन की रोशनी में मिट्टी के तेल वाले स्टोव पर ही रात का खाना पकता था जिसे लालटेन की थिरथिराती लौ वाली रोशनी में खाते थे। रात के आठ बजते बजते हमारे बिस्तर लग जाते थे। गर्मियों में अक्सर छत पर दरी बिछायी जाती थी और मौसियों के साथ एक कतार में हम बच्चे भी सोते थे। अँधेरे में देर तक बातें करते और ऊपर खुले आसमान में तारों को निहारते थे।

आकाशगंगा और तारों भरा आकाश

रात के अँधेरे में तारे देखना जीवन का सामान्य हिस्सा था क्योंकि तब शहर में बत्तियाँ कम ही थीं। सप्त ऋषि को छोड़ कर उन तारों के नाम नहीं मालूम थे लेकिन तारों से बनी बहुत सारी आकृतियों को पहचानता था। ध्रुव तारे का नाम तो सुना था पर उसे कैसे पहचाना जाये यह नहीं मालूम था।

उन्हीं तारों में एक छोटे छोटे तारों का एक छोटा सा घना गोलाकार झुँड होता है, जिसका हिंदी का नाम नहीं मालूम। उन दिनों में, मेरी छोटी मौसी का कहना था कि अगर एक वर्ष तक हर रोज शाम होते ही सबसे पहले आप उस तारों के झुँड को देख लो तो आप को मनचाही वस्तु मिल जायेगी, शर्त यह थी कि एक भी दिन आपको यह करना नहीं भूलना। अगर एक दिन भी भूल गये तो वर्ष की गिनती दोबारा से प्रारम्भ करनी पड़ती थी। कौन सी मनचाही वस्तु माँगूगा यह तो नहीं सोचा था लेकिन कई महीनों तक, हर रोज शाम को मैं उस तारा झुँड को आसमान में खोजता था। फिर जाने क्या बात हुई कि कुछ दिन उसे नहीं देख पाया तो हार मान ली, धीरे धीरे उसके बारे में भूल गया। बहुत साल बाद मालूम चला कि वह तारों का झुँड सामान्य तारे नहीं हैं बल्कि एक अन्य आकाशगँगा है, जिसका नाम एँड्रोमेडा गेलेक्सी है।

पापा तब कुछ पत्रिकाओं के लिए नयी किताबों की आलोचना लिखते थे, इसलिए घर में हर माह एक-दो नयी किताबें आ ही जाती थीं और एक अलमारी उन किताबों से भरी थी। नौ दस साल का होते होते मैंने उनको पढ़ना शुरु कर दिया था। चतुर सेन, राँगेय राघव और पँजाबी लेखक नानक सिंह मुझे बहुत प्रिय थे। एक किताब थी "जब खेत जागे", उसके लेखक कौन थे यह याद नहीं लेकिन उस किताब का मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा था और मैंने उसे कई बार पढ़ा था। उनमें एक अन्य किताब थी जिसे मैंने बहुत बार पढ़ा था, किशन चन्दर की "सितारों से आगे"। उसे वैज्ञानिक उपन्यास और फैन्तेसी उपन्यास के बीच का कह सकते थे, जिस विधा की किताबें हिन्दी में बहुत कम लिखी गयी थीं। मुझे नहीं मालूम की किशन चन्दर ने उसे व्यंग की तरह से लिखा था या बच्चों के लिए, लेकिन उसमें अंतरिक्ष में जाने वाले एक जहाज की कहानी थी जिसमें बैठ कर एक वैज्ञानिक के बच्चे विभिन्न लोकों में घूमने जाते हैं। उन लोकों में एक उल्टी दुनिया भी थी, जहाँ सब कुछ उल्टा होता था। एक अन्य दुनिया में व्यक्ति खड़े रहते थे और सड़कें चलती थीं।

तारों से मेरा असली परिचय तब हुआ, जब मैं मेडिकल कॉलेज की डिग्री ले कर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में सर्जरी विभाग में हाउजसर्जन लगा था। मेरे साथ कलकत्ता के श्रीरुप चैटर्जी थे जो उस समय सर्जरी में स्पेलिस्ट की पढ़ायी कर रहे थे। उसे तारों के बारे में बहुत जानकारी थी। रात की ड्यूटी में जब हम दोनों अस्पताल के गेट के बाहर चाय पीने जाते तो श्रीरुप आसमान की ओर उँगली उठा कर अलग अलग तारों को दिखाता और उनके नाम बताता। उसने मुझे अलग अलग राशियों के तारों को पहचानना सिखाया और आकाश में ध्रुव तारे को कैसे खोजें यह बताया। तारों की बहुत सी कहानियाँ भी उससे सुनी थीं जैसे कि एक पंक्ति में तीन तारों वाला ओरियोन का शिकारी कैसे अपने दो कुत्ते, कानिस माईनर और कानिस मेजर ले कर शिकार को जाता है और उन तीन तारों में से बीच वाला तारा असल में दो तारे हैं और बीटलग्यूज का लाल सितारा बौना है, मर रहा है। उन कहानियों से ही तारों के नाम याद रखना आसान हो जाता था।

श्रीरूप की सुनायी कहानियाँ मेरे मन में गहरी समा गयीं, अभी तक कुछ कहानियाँ याद हैं। जब मेरा बेटा छोटा था तो वह कहानियाँ मैंने उसे भी सुनायी थीं और एक बार हम दोनों दिल्ली के नेहरु प्लेनेटोरियम में सितारों के बारे में जानने भी गये थे। फ़िर समय के साथ मुझे धीरे धीरे तारे दिखना बन्द हो गया। शहर बड़े होते गये और बिजली की बत्तियाँ बढ़ती गयीं, साथ ही वातावरण का प्रदूषण भी बढ़ता गया, तो बाहर आसमान में कोई इक्का दुक्का तारा ही दिखता था। जबसे मोबाईल फोन आये हैं तो हमारे सिर भी झुके रहने लगे, आसमान की ओर देखना भी कम हो गया। यूरोप में तो सड़कों पर हर ओर बत्तियाँ लगी हैं जो शाम होती ही जल जाती हैं जो सुबह तक जलती रहती हैं, और यहाँ बिजली भी नहीं जाती इसलिए घना अँधेरा तो कहीं दिखता ही नहीं।

करीब बीस-पच्चीस साल पहले, जब हम लोग बोलोनिया शहर में रहते थे तो एक बार वहाँ की एस्ट्रोनोमी एसोसिएशन द्वारा आयोजित रात को तारों को देखने के कार्यक्रम में गया था। हम सबके पास अपनी दरियाँ और तकिये थे और एक बाग में हम लोग घास पर लेटे थे। इस कार्यक्रम के लिए बाग के आसपास की सब सड़कों की बत्तियाँ बुझा दी गयीं थीं, तो कुछ अच्छा अँधेरा बना था। एसोसिएशन का एक युवक लेसर की टार्च आसमान में विभिन्न तारों को दिखा कर उनके बारे में बताता था। उस शाम को जिस तरह से तारे देखे वैसे किसी शहर में दोबारा कभी नहीं देख पाया।

अभी उत्तरपूर्वी इटली में जहाँ रहता हूँ, यहाँ आसपास पहाड़ हैं और करीब के एक पहाड़ पर नक्षत्र देखने की लेबोरेटरी है जहाँ पर बड़ा टेलीस्कोप भी है। जब आकाश में कोई विषेश तारा या धूमकेतू हो तो वह लोग भी हमारे लिए विषेश कार्यक्रम आयोजित करते हैं ताकि आप उनके टेलीस्कोप से उस तारे या धूमकेतू को देख सकते हैं। एक बार वहाँ चाँद को देखने गया था, लेकिन रात को पहाड़ के ऊपर जाने में अब डर लगता है क्योंकि करीब आधा रास्ता कच्चा है और उस पर गाड़ी चलाना आसान नहीं।

अब तारों को देखने का मौका तो अधिकतर विदेश यात्राओं में मिलता है विषेशकर जब कभी गाँवों में रुकते हैं। बचपन में दिखने वाला हजारों तारों से भरा आसमान शायद अंतिम बार दो तीन वर्ष पहले पश्चिमी अफ्रीका में लाईबेरिया के एक गाँव में देखा था। बिजली से प्रज्जवलित शहरों से दूर रहने वाले मानव के लिए तारों का क्या महत्व है इसकी थोड़ी सी समझ मँगोलिया के एक गाँव में एक स्वास्थ्यकर्मी महिला से बात करने में मिली थी। वहाँ लोग कम हैं और मवेशी पशु अधिक और लोगों के घरों के बीच में बीस से पचास किलोमीटर के फासले होते हैं। जब कोई बीमार होता है या जब बच्चों को टीके लगाने का समय आता है तो वहाँ की स्वास्थ्यकर्मी महिलाएँ घोड़े पर बैठ कर घर से निकलती हैं और कुछ सप्ताहों तक अपने इलाके के सब घरों में जाती हैं। वहाँ सड़कें नहीं हैं, बस ऊँची नीची पहाड़ियाँ हैं। गर्मियों में तो फिर भी पहाड़ियों को देख कर रास्ते को पहचाना जा सकता है लेकिन जब सब कुछ बर्फ से ढका होता तब कुछ समझ में नहीं आता। उन्होंने बताया था कि उस समय वह रात को तारों देख कर ही रास्ता पहचानती थीं।

आजकल बहुत वर्षों के बाद मन में तारे देखने की इच्छा जागी है। हमारे शहर में बहुत रोशनी होती है तो उन्हें देखना आसान नहीं। सौभाग्यवश, घर के पीछे जो नदी है उसके दोनों किनारों पर घने पेड़ों की कतारें हैं जिनसे सड़क की रोशनी वहाँ पर कुछ रुक जाती है। नदी भी सड़क की सतह से कुछ मीटर नीची है और उसके ऊपर तो अँधेरा है ही। जब तारें देखने का मन करता है तो कभी कभी रात को फोन की टार्च बना कर नीचे नदी के पास उतर जाता हूँ। वहाँ पत्थर बहुत हैं इसलिए चलना आसान नहीं, लेकिन वहाँ से सिर उठा कर देखूँ तो बहुत से तारे दिखते हैं। हालाँकि वहाँ भी अँधेरा उतना गहरा नहीं होता क्योंकि शहर की कुछ रोशनी तो आसमान में आ ही जाती है, इसलिए तारे उतने नहीं दिखते जितने बचपन में दिखते थे, लेकिन फिर भी उनको देख कर बहुत अच्छा लगता है।

आकाशगंगा और तारों भरा आकाश

कभी कभी उन्हें देखते हुए अचानक पुराना सुना हुआ किसी तारे का नाम याद आ जाता है। जैसे कि कल रात को घूमते समय अल्डेबारान का नाम याद आया। शायद यह वह तारा है जिसकी रोशनी सब तारों से अधिक तीव्र होती है या फिर शायद इसकी रोशनी को मापदँड बना कर सब तारों की रोशनी को मापा जाता है? कुछ ऐसी ही बात थी जो ठीक से याद नहीं आयी, हाँ यह याद था कि आल्डेबारान, वृषभ राषि के तारों का हिस्सा है। यह सोचते हुए श्रीरुप की कहानियाँ याद आ गयीं। सोचा कि जाने वह कहाँ होगा, कैसा होगा।

कभी सोचता हूँ कि जब पोती थोड़ी बड़ी हो जायेगी तो उसे एक दिन तारे दिखाने ले कर आऊँगा और जितने तारों के नाम याद है उनकी कहानियाँ सुनाऊँगा। फिर मन में प्रश्न उठता है कि कौन सी जगह है जहाँ उसे ले कर जा सकता हूँ जहाँ तारे दिखते हों? शायद एक दिन शहरों में बड़े होने वाले बच्चे भूल ही जायेगें कि आसमान में तारे भी होते हैं। वह उन्हें केवल टेलीविजन पर देखेंगे और उन्हें समझ ही नहीं आयेगा कि हमें तारे क्यों इतने अच्छे लगते थे?

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