अपनी देखभाल अपने हाथ

डा. सुनील दीपक, 16 फरवरी 2022

दुनिया भर में मानव के औसत जीवन की आयु बढ़ रही है। ७० वर्ष पहले जब भारत स्वतंत्र हुआ था उस समय हमारी औसत जीवन आयु ३३ वर्ष की थी, आज वह सत्तर के करीब पहुँच रही है। इसका अर्थ है कि अधिक व्यक्ति लम्बे समय तक जीते हैं। बढ़ती औसत आयु के साथ, हम लोगों के लिए अपने शरीर का ध्यान रखने का महत्व बढ़ रहा है ताकि बढ़ी आयु में भी हम आत्मनिर्भर रह सकें और जीवन की गतिविधियों में जीवंत हो कर भाग लेते रहें।

अपनी देखभाल खुद करने का महत्व - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

बढ़ती औसत आयु के महत्व की बात को छोड़ भी दिया जाये, तब भी मेरे विचार में हमें यह जानकारी होना कि हमारे शरीर के विभिन्न अंग कैसे काम करते हैं और कैसे उनका ख्याल रखा जाये ताकि हम जीवन को पूर्ण रूप से जीयें, महत्वपूर्ण बात है। यह आलेख, अपना ध्यान हम खुद कैसे और क्यों रखें के विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं से सम्बंधित है।

राजू की कहानी

१९८० के दशक में कुछ समय के लिए दिल्ली के नये राजेन्द्रनगर में मैं एक डॉक्टर का क्लीनिक चलाता था और उस समय भी मेरी विकलाँगता के विषय में दिलचस्पी थी। अक्सर लोग अपने विकलाँग बच्चों को मेरे पास लाते थे। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि क्लिनिक का इतना काम होता था कि हर एक बच्चे को समय देना और हर दिन उनकी मालिश करना, उन्हें अलग अलग तरह के व्यायाम कराना, मेरे लिए मुमकिन नहीं था। तब मैंने कहा कि सब काम मैं नहीं करूँगा, बच्चे के साथ उसके परिवार का कोई सदस्य होना चाहिये जिसे मैं दिखा व समझा सकता हूँ कि क्या और कैसे करना चाहिये, उनको स्वयं बच्चे की मालिश, व्यायाम, वर्जिश आदि हर दिन कराने होंगे। उसके बाद मैं पंद्रह दिन या महीने में एक बार उस बच्चे की जाँच करूँगा।

उन्हीं दिनों में एक दिन एक औरत एक तीन या चार साल के बच्चे को ले कर आयी। उसका नाम था राजू। जन्म से ही बच्चे की पीठ के निचले हिस्से पर एक छाला जैसा था, जिसका राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आपरेशन हुआ था लेकिन उसके बाद उस जगह पर रीढ़ की हड्डी में किटाणुओं की वजह से इन्फेक्शन हो रहा था। वह स्त्री उस घाव की पट्टी करवाने आयी थी क्यों कि हर रोज उसके लिए अस्पताल जाना संभव नहीं था। तब मैंने देखा कि बच्चा हमेशा लेटा रहता था, उसकी टाँगे कमज़ोर हो गयीं थीं और वह खड़ा नहीं हो पाता था। तो मैंने सोचा कि घाव जाने कब भरेगा, मालूम नहीं कि भरेगा या नहीं, लेकिन सारी उम्र यह बच्चा क्या लेटा रहेगा? यह स्कूल नहीं जायेगा या जीवन के अन्य काम नहीं करेगा? तो मैंने कहा कि राजू को हर रोज ले कर आओ, इसकी टाँगो को मज़बूत करना है ताकि यह चल फ़िर सके। उसकी टाँगों को सीधा करने के लिए पहले मालिश से शुरु किया। उसे दर्द होता था और वह इतना रोता था कि साथ साथ उसकी माँ भी रोने लग जाती थी। अंत में यह फैसला किया कि उसे दोपहर में लाया जाये जब क्लिनिक बन्द होता है और उसके इलाज के समय उसकी माँ वहाँ नहीं रुके। करीब दो महीनों में राजू मेरा हाथ पकड़ कर आँगन में चलने लगा था, रोता तब भी बहुत था लेकिन वह कितना भी रो ले, हर दिन हम वर्जिश पूरी अवश्य करते थे। हम दोनों को साथ देख कर मेरी माँ कहती कि मैं बहुत पत्थर दिल था जो उसके रोने पर मेरा दिल नहीं पसीजता था।

खैर मैंने राजू की माँ से कहा कि जितना मैं कर सकता था वह मैं कर चुका था। मैंने उसे छोटे बच्चों को चलना सिखाने वाले वाकर की तस्वीर दिखायीं, कहा कि ऐसा कुछ हो जिससे राजू को सहारा मिलता रहे तो इसका चला फिरना बेहतर हो सकता है। उसके बाद राजू मेरे पास नहीं लौटा। सात आठ महीनों के बाद आर ब्लाक के बस स्टाप के पास से गुजर रहा था तो अचानक वह दिखा। लकड़ी की दो पहियों वाली गाड़ी को पकड़ कर फुर्ती से भाग रहा था। उसकी माँ ने कहा कि उसका पीठ का घाव भी भर गया था। वह बोली कि राजू स्कूल जाने की कहता है। मुझे बहुत अच्छा लगा।

समुदायिक विकलाँग विकास कार्यक्रम

राजेन्द्र नगर के क्लीनिक के बाद मुझे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इटली की एक संस्था में काम करने का मौका मिला जोकि विश्व स्वास्थ्य संस्थान के साथ एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमरीका के कम विकसित देशों में विकलाँग पुनर्निवासन यानि रिहेबिलिटेशन कार्यकमों (disability rehabilitation) को आयोजित करती थी। इन कार्यक्रमों में वह लोग एक नये तरीके से काम करने की सोच रहे थे जिसे "सामुदायिक विकलाँग विकास" (सा.वि.वि.) या क्मयुनिटी बेस्ड रिहेबिलिटेशन (सी.बी.आर. - Community-based Rehabilitation - CBR) का नाम दिया गया था। यह नया तरीका असल में वही पुराना तरीका था जिसे मैं दिल्ली में राजु और अन्य विकलाँग बच्चों पर पहले से आजमा चुका था।

साविवि कार्यक्रमों की सोच का पहला बिन्दु था कि कम विकसित देशों में, विषेशकर उनके छोटे शहरों, जिलों, तहसीलों तथा गाँवों में, विभिन्न विकलाँगताओं को समझने और जानने वाले डॉक्टर, नर्सें, फिजियोथेरेपिस्ट, ओकूपेशनल थैरेपिस्ट, स्पीच थैरेपिस्ट, आदि कम होते हैं या नहीं होते।

दूसरी बात थी कि वे परिवार अपने विकलाँग बच्चों से भी प्यार करते हैं, वह चाहते हैं कि उनके बच्चों का सही विकास हो, लेकिन उनके पास इसकी जानकारी नहीं होती। इसलिए साविवि कार्यक्रमों का ध्येय था कि समुदायों में एक व्यक्ति को विभिन्न विकलाँताओं के बारे में जानकारी होनी चाहिये और उस व्यक्ति की जिम्मेदारी होगी कि वह जिन घरों में विकलाँग बच्चे या बड़े होंगे उनको यह जानकारी देगा कि वह अपने घर में ही अपने विकास के लिए स्वयं क्या क्या और कैसे कर सकते हैं।

अपनी देखभाल खुद करने का महत्व - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

अस्सी और नब्बे के दशकों में विश्व स्वास्थ्य संस्थान की मदद से बहुत सी विकलाँगताओं की चिकित्सा तथा पुनर्वासन की किताबों का सरलीकरण करके प्रकाशित किया गया था ताकि वे व्यक्ति तथा उनके परिवार जहाँ तक हो सके, अपना ध्यान रखें तथा अपने विकास को बढ़ायें। मैंने भी इस काम में योगदान दिया। करीब पैंतीस वर्षों तक एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका में मैंने साविवि के कार्यक्रम प्रारम्भ करने के लिए सामुदायिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया था।

लम्बी स्वास्थ्य समस्याएँ

बीमारियों को दो गुटों में बाँटा जा सकता है -

- कुछ छोटे समय की तीव्र बीमारियाँ (Acute illness) होती हैं जैसे कि फ्लू का बुखार, न्यूमोनिया, मलेरिया, दस्त, आदि जो कि सही इलाज से कुछ समय में पूरी ठीक हो जाती हैं।

- दूसरी ओर वह बीमारियाँ होती है जो कि लम्बे समय तक चलती हैं (Chronic illness)। इसमें कुछ इन्फेक्शन यानि रोगी-किटाणुओं से जुड़े रोग (chronic infectious diseases) हैं जैसे कि टीबी, कुष्ठ रोग, फाईलेरिएसिज, आदि, जिनके होने से कुछ महीने या कई साल तक दवा लेनी पड़ती है। इनमें वह अन्य शारीरिक रोग भी (chronic non-infectious diseases) हैं जैसे कि रक्तचाप का बढ़ना, हृदयरोग, मधुमेह या डायबिटीज, अस्थमा, आदि, जिनका इलाज अधिकतर सारा जीवन चलता है।

जो बीमारियाँ लम्बी या जीवन भर चलती हैं, उनमें हम चाहें या न चाहें, हमें अपनी देखभाल की कुछ न कुछ जिम्मेदारी तो लेनी ही पड़ती है। चाहे ब्लड प्रेशर बढ़ा हो या रक्त में मधुमेह की वजह से चीनी की मात्रा अधिक हो, हर बात के लिए डॉक्टर के पास या अस्पताल में जाना संभव नहीं है।

सन् २००१ में विश्व स्वास्थ्य संस्थान ने मरीजों का अपनी देखभाल के महत्व के विषय पर एक दस्तावेज निकाला था जिसका मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा था। इस दस्तावेज का नाम था "इन्नोवेटिव केयर फॉर क्रोनिक कँडीशनज" (Innovative Care for Chronic Conditions) यानि "लम्बी बीमारियों की देखभाल का नया तरीका"। इस दस्तावेज के मुख्य बिन्दु थे -

१. आधुनिक चिकित्सा की हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ अठाहरवीं शताब्दी में स्थापित की गयी थीं जब यूरोप में उद्योगीकरण का प्रारम्भ हुआ था। उस समय छोटे समय की तीव्र बीमारियों का समय था और अधिकतर लोग विभिन्न बुखार, न्योमोनिया, उल्टी और दस्त, हैजा, टाईफाईड जैसी बीमारियों से मरते थे। तब न तो एन्टीबायेटिक दवाएँ थीं, न वैक्सीन, और औसत जीवन की अवधि तीस या चालिस वर्ष के बीच में थी। उस समय अस्पतालों का काम था लोगों की जान बचाना और जब वह ठीक हो जायें, उन्हें घर वापस भेज देना। उन बीमारियों के लिए डाक्टरों, नर्सों के पास रोगनिदारन की सब जानकारी होती थी, जबकि मरीजों को कुछ नहीं मालूम होता था कि क्या करना चाहये।

तब से आज तक की बीमारियों की स्थिति एकदम बदल गयी है। सभी देशों में आज बुखार, हैजे, उल्टी, दस्तों से मरने वाले कम होते जा रहे हैं, और लम्बी शारीरिक बीमारियाँ जैसे कि डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, मोटापा, जोड़ों के दर्द, विभिन्न एलर्जियाँ, साँस की तकलीफ़, हृदय रोग आदि बढ़ती जा रही हैं। लेकिन हमारे अस्पताल अभी भी पुराने तरीके से चलते हैं, वह समय के साथ नहीं बदले। आजकल मरीज अस्पताल जाते हैं लेकिन बिल्कुल ठीक कभी नहीं होते, बल्कि घर वापस आ कर भी दवा लेते रहते हैं। इन बीमारियों को जीवन शैली की बीमारियाँ कहते हैं, क्योंकि मरीजों का काम केवल दवा से नहीं चलता, उन्हें अपनी पूरी जीवन शैली ही बदलनी होती है।

बीमारियों के साथ रहते रहते, मरीज अपनी बीमारियों के बारे में बहुत कुछ जान जाते हैं और अन्य मरीजों को भी सलाह दे सकते हैं। कभी कभी अपनी बीमारियों के बारे में मरीजों को अधिक मालूम होता है और पढ़ायी पूरी करके आने वाले नये डॉक्टरों और नर्सों को कम जानकारी होती है।

२. जब मरीजों को लम्बी बीमारी हो तो डॉक्टर का काम बदलना चाहिये। उसका काम केवल दवा देने तक सीमित नहीं रहना चाहिये, बल्कि उसे मरीजों से जीवन शैली में क्या बदलाव लाने चाहिये, कैसे वह बदलाव आ सकते हैं, घर में मरीज स्वयं बीमारी को काबू में रखने के लिए क्या कर सकते हैं, जैसे विषयों पर जानकारी देनी चाहिये। इस काम को करने के लिए डाक्टरों और नर्सों को सही शिक्षा मिलनी चाहिये और उनके काम के आयोजन में इसके लिए पर्याप्त समय होना चाहिये।

नयी तकनीकी का प्रभाव

हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संस्थान के दस्तावेज को आये बीस साल से भी अधिक हो गये, इस दिशा में, विषेशकर अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं की आयोजन पद्धती में विषेश बदलाव नहीं हुए हैं। डॉक्टरों का अधिकतर समय मरीजों को देखने व दवा लिखने में जाता है, उनके पास मरीजों से बात करने और जानकारी देने का समय कम होता है।

लेकिन इन बीस सालों में नयी तकनीकी ने, विषेशकर इंटरनेट ने, बीमारियों के बारे में जानने और समझने तथा हमें अपनी जीवन शैली में क्या परिवर्तन करने चाहिये और कैसे करना चाहिये, यह सब बातें हम इंटरनेट पर खोज सकते हैं। विकलाँग व्यक्ति और उनके परिवार भी इंटरनेट के माध्यम से वीडियो बना कर अपने अनुभव और उनसे सीखे पाठों को अन्य विकलाँग व्यक्तियों के साथ बाँटते हैं।

अपनी देखभाल खुद करने का महत्व - तस्वीर श्रेय सुनील दीपक

इससे कभी कभी विपरीत कठिनाईयाँ भी बन रही हैं। कुछ लोग अनुभव या विचार बाँटने के नाम पर ऊल जलूल इलाज या अँधविश्वासों का प्रचार करने लगे हैं। भविष्य में तकनीकी ही इस कठिनाई से निकलने का रास्ता दिखायेगी।

संदर्भ

1. विश्व स्वास्थ्य संस्थान का २००१ का दस्तावेज - Innovative Care for Chronic Health Conditions

2. स्वयं की देखभाल पर विश्व स्वास्थ्य संस्थान का नया दस्तावेज, २०२१ से - WHO Guidelines on Self-Care Interventions for Health and Well-Being

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टिप्पणीः इस आलेख के साथ मैंने पश्चिमी बँगाल में सिलीगुड़ी के आसपास के इलाकों से सामुदायिक विकलाँग विकास कार्यक्रम की तस्वीरों का प्रयोग किया है। यह कार्यक्रम एक भारतीय संस्था मोबिलिटी इँडिया द्वारा आयोजित था जिसके एक निरीक्षण में मैंने भी भाग लिया था।

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